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अफसर स्विमिंग न करे, टेनिस न खेले तो धिक्कार है ऐसी अफसरी पर…

प्रदेश पुलिस के मुखिया ‘कैलाश मकवाना’ जी ने पुलिस के तमाम बड़े अधिकारियों से कहा कि उन्हें पता लगा है कि सभी बड़े अधिकारी शाम होते ही या तो स्विमिंग करने निकल जाते हैं, या टेनिस खेलने या फिर क्रिकेट खेलने, उनका कहना था कि ये सब काम छोडक़र आप लोगों को शाम को या रात में ‘गश्त’ करना चाहिए ताकि अपराधियों पर पुलिस का खौफ  बना रहे और जब बड़े अधिकारी गश्त करेंगे तो नीचे के अधिकारियों को भी मजबूरी में गश्त करना पड़ेगी। डीजीपी साहब बहुत बड़े अधिकारी हैं उनका कहना सही हो सकता है लेकिन उन्हें यह भी सोचना होगा कि ये जो बड़े अधिकारी होते हैं एसपी हैं, डीआईजी हैं, आईजी हैं ये बड़े ही ‘हेल्थ कांशस’ होते हैं उन्हें लगता है कि अगर स्विमिंग नहीं करी, टेनिस नहीं खेला, क्रिकेट नहीं खेला तो फिर काहे के अफसर? दूसरी बात वे बड़े अफसर होते हैं उनके पास अधीनस्थ अधिकारियों कर्मचारियों की फौज होती है तो वे गश्त करके अपना टाइम क्यों बर्बाद करें? अफसर का काम तो निर्देश देना होता है। जब चाहे अपने अधीनस्थों को बुला लिया दो-चार से आंकड़े मांग लिए, दो चार को डांट दिया और उनका काम खत्म, छोटे अफसर और कर्मचारियों का आधे से ज्यादा वक्त तो बड़े अफसरों की मीटिंग में ही निकल जाता है, बड़े अफसर भी मीटिंग करके सोचते हैं कि अपन ने अपने कर्तव्यों का पालन कर लिया नीचे के लोगों को निर्देश दे दिए अब अपन स्विमिंग करें उसी में कुछ फायदा है, अपराध तो दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती जब तक समाज है तब तक अपराध होंगे और जब कुछ होना जाना नहीं है तो काहे को अपना टाइम बर्बाद करें। फिर बड़े अफसरों की अपनी एक स्टाइल होती है उन्हें भी लगता है कि वे बड़े अफसर है और अगर अफसर क्रिकेट ना खेले, टेनिस ना खेले, स्विमिंग न करें तो धिक्कार है ऐसी अफसरी पर। डीजीपी साहब ने आदेश तो जारी कर दिए कि स्विमिंग करने से ज्यादा जरूरी गश्त करना है लेकिन अपने को भी मालूम है कि हो सकता है डीजीपी साहब के निर्देश पर एसपी साहब, आईजी साहब, डीआईजी साहब दो-चार दिन गश्त करके मकवाना साहब को बता देंगे देखिए साहब आपके निर्देश पर हम लोगों ने तैरना छोड़ दिया, क्रिकेट खेलना छोड़ दिया, टेनिस खेलना छोड़ दिया, अब हमारे जीवन का एक ही उद्देश्य बचा है और वो है गश्त करना, लेकिन अपने को भी अच्छे से मालूम है कि ये गश्त वाला नाटक दो-चार दिन तक ही चलेगा क्योंकि गश्त करने से हेल्थ नहीं बनती इतना तो डीजीपी साहब को भी मालूम होना चाहिए।

चोटी काटो

भोपाल का कुटुंब न्यायालय इन दोनों भारी परेशान है तरह-तरह के केस उसके सामने आ रहे हैं जिसको लेकर उसे समझ में नहीं आ रहा कि इसमें वो क्या निर्णय करें। अब एक युवक है जो बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता है उसकी पत्नी ने कुटुंब न्यायालय में आवेदन दिया है कि उसका पति ‘चोटी’ रखता है जो उसके स्टेटस के खिलाफ  है पत्नी कहती है चोटी कटा लो, पति कहता है चोटी नहीं कटने दूंगा, इसको लेकर दोनों में भारी बहस हो रही है पत्नी कैंची लेकर घूम रही है कि मौका मिले और वो पति की चोटी काट दे और पति अपनी चोटी बचाए घूम रहा है। इधर एक पति ने ये आवेदन लगाया है कि उसकी पत्नी ना तो मेकअप करती है ना ही ब्यूटी पार्लंर जाती है, वो कई बार उसको ब्यूटी पार्लंर के दरवाजे पर छोड़ कर आया लेकिन वो बिना कुछ कराए पिछले दरवाजे से वापस आ गई। पति का कहना है कि ब्यूटी पार्लंर जाने से उसकी पत्नी का सौंदर्यं बढ़ सकता है जबकि पत्नी कहती है कि नकली चीजों से मेरा कोई दूर तक लेना देना नहीं है मैं जैसी हूं वैसी ही रहूंगी क्योंकि ब्यूटी पार्लंर जाने और खूबसूरत दिखने वाली महिलाओं का जब मेकअप उतरता है तब उनको देखकर उनके पति भी घबरा जाते हैं कि हमने देखा क्या था और मिला क्या? इस मसले को भी लेकर भारी लड़ाई चल रही है। तीसरा एक और मामला आ गया है जिसमें एक महिला ने इसलिए आवेदन लगा दिया कि उसे शादी के पहले ससुराल में सूट पहनने की छूट दी गई थी लेकिन अब जब वो ससुराल आई है तो उसको साड़ी पहनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कुटुंब न्यायालय में बैठे जज भारी चिंता में है कि वे इन छोटी-छोटी बातों पर क्या निर्णय लें। बहुत समझाने की कोशिश कर भी रहे हैं लेकिन सारे आवेदन देने वाले अपनी अपनी मांग पर अड़े  हुए हैं। देखना होगा कि पहले पति चोटी कटवाते हैं या नहीं, दूसरी पत्नी ब्यूटी पार्लर जाती है या नहीं, या फिर तीसरी महिला साड़ी पहनती है या नहीं। जैसे ही कुछ जानकारी लगेगी हम आप तक पहुंचा देंगे

फाइलों से मोहब्बत

केंद्रीय केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी कई बार बड़ी गजब की बात कर जाते हैं इस बार उन्होंने अफसरों की मीटिंग में कहा कि अफसर को पत्नियों से ज्यादा प्यार दफ्तर की फाइलों से होता है और जिस चीज से इंसान को प्यार होता है वो उसे अपने पास रखना चाहता है उससे जुदा होना नहीं चाहता यही कारण है कि अफसर लोग फाइलों को अपने सीने से लगाकर रखते हैं एक बार जो फाइल उनके पास पहुंच गई तो समझ लो फिर उसका वापस आना बहुत ही कठिन है। गडकरी जी भी समझते हैं कि सरकारी विभाग में फाइल का कितना महत्व होता है सारा खेल फाइल के ही दम पर चलता है जो फाइल पास हो गई यानि सौदा हो गया और जो अटक गई यानी सौदा नहीं हो पा रहा। फाइल पर अगर अफसर के दस्तखत हो गए तो जिसकी फाइल है वो भगवान के दरवाजे पर जाकर नारियल चढ़ाता है कि हे भगवान मेरी फाइल वापस आ गई और जिसकी फाइल पर दस्तखत नहीं होते उसकी चप्पलें अफसर के दफ्तर में चक्कर लगा लगा कर घिस जाती हैं लेकिन फाइल अफसर के टेबल पर ही पड़ी पड़ी अपनी किस्मत पर आंसू बहाती रहती है कि काश मेरा मालिक भी अफसर से सेटिंग कर लेता तो आज मुझे इस तरह बंधक बनकर नहीं रहना पड़ता गडकरी जी ने फाइल और पत्नी की जो तुलना की है उसको देखते हुए हो सकता है अब अफसर लोग फाइलों से मोहब्बत थोड़ी कम कर दे लेकिन इस बात की गुंजाइश बहुत कम है क्योंकि फाइल के ही दम पर तो पत्नी की भी सेवा की जाती है फाइल नहीं होगी तो पत्नी के ऐशो आराम की व्यवस्था कहां से होगी।

सुपर हिट ऑफ  द वीक

‘सुनो जी अब उठ जाइए मैं रोटी बना रही हूं’ श्रीमती जी ने श्रीमान जी से कहा
‘तो बना लो ना मैं कौन सा ‘तवा’ पर लेटा  हुआ हूं’ श्रीमान जी ने उत्तर दिया।

 

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं ब्रम्हचारी सुबुद्धानंद जी

Jai Lok
Author: Jai Lok

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