
रायपुर (जयलोक)
शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए श्री शिव पुराण की कथा के प्रसंग में शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ.स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ जी महाराज ने बताया कि भगवान शिव विवेक और मोह दोनों के प्रेरक हैं।

भगवान शंकर अपने भक्तों का मोह दूर भी करते हैं, और मोह देते भी है और विवेक भी प्रदान करते हैं। जिन भक्तों के मन में अभिमान होता है भगवान शिव की माया उनको मोहित कर देती है और जो पूर्ण रूप से भगवान शिव पर समर्पित हो जाते हैं उनको ही सब कुछ समझते हैं तो भगवान उनके मोह को दूर करके विवेक प्रदान करते हैं नारद मोह के प्रसंग की चर्चा में बताया कि भगवान अपने भक्त के प्रियवादी नहीं अपितु हितकारी होते हैं। जो अपने भक्त के लिए हित में हो वही काम भगवान करते हैं श्री भगवान का संकल्प है कि अपने भक्त के अभिमान को वह स्थिर नहीं होने देते है।
भगवान की प्रतिज्ञा है कि जन अभिमान न राखहु काऊ । अभिमान व्यक्ति के पतन का कारण बनता है अभिमान के वशीभूत होकर के प्राणी बड़े से बड़ा अपराध कर देता है, श्रेष्ठ से श्रेष्ठ व्यक्तियों का अपमान कर देता है, परिणामस्वरुप उसका शीघ्रपतन हो जाता है। नारद जी ने भी मोह के वशीभूत होकर भगवान नारायण का अपमान कर दिया उनको शाप दे दिया जब भगवान की माया नारद जी से दूर हुई तो नारद जी को पश्चाताप होने लगा उन्होंने भगवान के चरण पकड़ और विनती करने लगे दीनदयाल मेरा शाप मिथ्या हो जाए मैंने आपको बहुत दुर्वचन कहे हैं।

इस पाप से मेरी आप रक्षा कीजिए भगवान नारायण ने कहा कि तुम शीघ्र भगवान शंकर के अष्टोत्तर शतनाम का जप करो भगवान शिव की कृपा से ही तुम्हारा ह्रदय का असंतुष दूर हो जाएगा और सीख रही तुम्हें शांति लाभ प्राप्त होगा। इस प्रकार से नारद जी का अभिमान भगवान शंकर के सतनाम स्त्रोत से दूर हुआ। सारांश यही है की अभिमान सभी का शत्रु है, इससे बचना चाहिए।कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वान तथा जगद्गुरुकुलम् के वृक्ष वालकों ने मंगलाचरण पूर्वक आरती की तत्पश्चात स्वामी जी महाराज ने भगवान शिव की दिव्य अमृतमयी कथा उपस्थित भक्त समुदाय को सुनाई।
Author: Jai Lok







