
नरसिंहपुर (जयलोक) ।

जिसको पकड़ रखा है उसे छोडऩा होगा कौन छुडायेगा वो हैं गुरु, सद्गुरु ही युक्ति करेंगे । आप संसार के रिश्तों में जकड़े हुये हैं क्योकि आपने भी सब क्षेत्र पकड़ रखा है । संसार के प्राणी दु:ख छोडऩा चाहते हैं सुख भोगना चाहते हैं सुख की प्राप्ति के लिए नौकरी व्यापार आदि करते हैं । संसार के सभी प्राणी सुख चाहते हैं उपाय करते हैं पर सुख नहीं मिलता, मैत्रेय जी कहते हैं विदुर अधर्म से, विपरीत कार्य से सुख नहीं मिलेगा शिवपुराण, समस्त पुराणों में सुख है जिसके श्रवण से सुख मिलता है ।
हम अंधविश्वास में बंधे हैं जाल में सहजता से पड जाते हैं जैंसे मकडी के जाल में मनुष्य फंसा है जाल तोड़ सकता है पर नहीं तोड़ता उसी में आनंद पाते हैं । वाल्मीकि जी ने कहा मैं चोरी करके लाता हूँ तुम सब पाप के भागीदार हो सबने मना कर दिया वाल्मीकि जी को वैराग्य आ गया । घर घर में जो विलास करता है उसे जान लिया पढ़ लिया तो संसार में ही सब कुछ पा जायेगा । अलौकिक सुख बिना सामग्री के मिलता है जो आपने पकड़ा है उन्हें छोड़ दो सब छोड़ देंगे जिस तरह गज को छोडक़र सभी परिवार वाले चले गये उन्होंने देखा की अब गज बलहीन हो गया है तो छोड़ दिया स्वार्थ के सब रिश्ते हैं ।
शिव शक्ति से सम्पन्न होकर ही संसार का कल्याण करते हैं । कामदेव का प्रसंग सुनाया कामदेव को भगवान् शिव ने तीसरे नेत्र से भष्म कर दिया, रति को वरदान दिया -पति मिलेगा द्वापर में कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न के रूप में । शक्ति ही सब कुछ है । विश्वामित्र जी ने कहा मेरे सब शस्त्र वशिष्ठ मुनि के ब्रह्मदंड के प्रभाव से निष्क्रिय हो गये तो पुन: तप करने लगे। पूज्य गुरुदेव ने राजा सत्यवृत के पुत्र त्रिशंकु का वृतांत सुनाया त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाने का विचार किया वशिष्ठ जी को बुलाया और अपनी इक्षा बतायी तो वशिष्ठ जी ने कहा ये संभव नहीं। गुरु वाही जो तत्त्व दर्शन आत्म ज्ञान करा देते हैं। गुरु ने समझाया पर त्रिशंकु नहीं माना वशिष्ठ जी के पुत्रों ने भी आचार्यत्व नहीं लिया कहा राजन तुम लौट जाओ गुरु आदेश मानो नहीं माना तो गुरु पुत्रों ने चांडाल होने का श्राप दिया । चांडाल होने पर प्रजा ने त्रिशंकु को छोड़ दिया तब विश्वामित्र जी के पास गये क्योंकि हठ पकड़ लिया कि स्वर्ग जाउंगा श्राप से चांडाल हो गया गुरु पुत्रों ने श्राप दिया विश्वामित्र जी ग्यानी एवं तपस्वी थे अहम् के कारण विवेकशून्य हो गये। नित्य अनित्य का विवेक होना चाहिये। तरल पदार्थ से अग्नि शांत होती है पर विवेक करने पर जल और पेट्रोल का विचार करेगा।

आग जल से शांत होगी न की पेट्रोल से। विश्वामित्र जी ने श्राप देकर वशिष्ठ जी के सौ पुत्र नष्ट कर दिये वशिष्ठ जी को निशाद होने का श्राप दिया। विश्वामित्र जी ने अपने तप के बल पर सशरीर स्वर्ग भेज दिया पर इंद्र जी ने त्रिशंकु को नीचे गिरा दिया। विश्वामित्र जी ने कहा वही ठहर। विश्वामित्र जी ने दक्षिण दिशा में नया स्वर्ग बना दिया । विघ्नों के आने के बाद भी विश्वामित्र जी ने एक हजार वर्ष तक तप किया देवों ने ब्रह्मा जी से कहा महाराज विश्वामित्र जी को ब्रह्म पद दे दीजिये।
विश्वामित्र जी ने कहा वशिष्ठ जी मुझे ब्रह्मर्षि कहें । वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी को ब्रह्मर्षि मान लिया ये सब प्रसंग सतानंद जी राम और लक्ष्मण जी को सुना रहे हैं । आगे की कथा में महाराजश्री जी ने शिव धनुष का प्रसंग बताया – हल चलाते सीता प्राप्त हुयी मेरी बेटी का विवाह पराक्रमी से ही करूंगा । योग्य व्यक्ति से ही विवाह करूंगा । मैंने प्रतिज्ञा की है जो धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ायेगा उसी के साथ विवाह करूंगा। पर बड़े बड़े राजा इस धनुष को हिला भी नहीं पाये।
अब जनि कोउ माखै भट मानी । वीर विहीन मही मैं जानी ।।
तजहु आस निज निज गृह जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ।।
समझ गये की मेरी पुत्री के योग्य कोई नहीं है। रावण की भुजाओं में भी शक्ति नहीं है कि धनुष उठा सके। गुरु की आज्ञा से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी उसी समय धनुष टूट गया-
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।।
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ।।
जनक जी ने कहा मुनिवर मुझे सीता राम विवाह की आज्ञा दीजिये ।
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Author: Jai Lok







