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तीर्थों के दर्शन से चित्त शुद्ध होता है – डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ जी

रायपुर (जयलोक)
शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला रायपुर में चातुर्मास प्रवचन माला के अंतर्गत शिव कथा की व्याख्या करते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द  तीर्थ ने बताया कि तीर्थ के दर्शन करने से अंत:करण की शुद्धि होती है तथा चित्त शुद्ध हो जाता है। चित्त के निर्मल होने से साधक को परमात्म तत्त्व की प्राप्ति हो जाती है। तीर्थ के दर्शन करने से तीन अर्थो की प्राप्ति होती है।

धर्म, अर्थ, काम। ये तीनों ही अर्थ तीर्थ में स्नान, दान एवं पुण्य करने से प्राप्त हो जाते हैं, वास्तव में तीर्थ में किया गया दान, पुण्य व सद्कर्म निष्काम होता है, जो मुक्ति का सीधा  कारण बनता है इस दृष्टि से यदि विचार किया जाए तो चारों पदार्थ भी तीर्थ यात्रा से प्राप्त हो जाते हैं, परंतु तीर्थ यात्रा के नियमों के पालन न करने से पाप भी प्राप्त हो जाते हैं अत: तीर्थ में कैसे रहना है? कैसे स्नान करना है?

यह सब शास्त्रों से प्राप्त होता है। तीर्थ को कभी गंदा नहीं करना चाहिए तीर्थ में मुसल स्नान करने की विधि है अर्थात् केवल डुबकी लगाकर के बाहर निकलना है कपड़े धोने या,शरीर धोने का, गंदगी फैलाने का आपको अधिकार नहीं यदि आप ऐसा करेंगे तो तीर्थ दूषण का एक आपको पाप लगेगा जो आपके पुण्य को नष्ट कर देगा अत: तीर्थ में तीर्थ के नियमों के अनुसार या शास्त्र के नियमों के अनुसार ही स्नान दान करना चाहिए। आजकल लोग तीर्थ यात्रा को पर्यटन स्थल बना रहे हैं जो आध्यात्मिक एवं भौतिक दृष्टि से भी उत्तम नहीं है तीर्थ यात्रा एक तपस्या है अत: है  तपस्या के भाव से ही तीर्थ जाना चाहिए तभी आपको तीर्थ यात्रा का पूरा पुण्य प्राप्त होगा तथा चित्त की भी शुद्धि होगी।

सुधि वक्ता ने नारद मोह की कथा के प्रसंग में बताया कि नारद जी ने जब भगवान नारायण को श्राप दे दिया तो उनके मन में ग्लानि उत्पन्न हुई, हाथ जोडक़र प्रार्थना करने लगे तब भगवान नारायण ने समझाया कि तुम अपने मन की ग्लानि यदि दूर करना चाहते हो तो तीर्थों का भ्रमण करो, और शिव नाम का जप करो इससे तुम्हारे ह्रदय की पवित्रता  तुमको पुन: प्राप्त हो जाएगी।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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