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यदि पुलिस हताश हो गई तो कानून व्यवस्था का क्या होगा?

चैतन्य भट्ट
जबलपुर (जयलोक)। मऊगंज में भीड़ द्वारा एक एएसआई की जघन्य हत्या और इंदौर में वकीलों द्वारा मारपीट की घटनाओं ने पुलिस कर्मियों के मनोबल को हिला कर रख दिया है। वे अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर ब्लैक होल की तस्वीर लगाकर अपनी हताशा बयान कर रहे हैं। हमारे पंजे नोच लिए गए हैं, और तीर भी चलाने हैं और परिंदे भी बचाने हैं जैसे सोशल मीडिया पोस्ट उनके दर्द को बयां कर रहे हैं। मुख्यमंत्री से एक नजर अपनी ओर डालने जैसी अपीलें भी हो रही हैं। वहीं सोशल मीडिया का एक दूसरा चेहरा है जहां बदमाश और अपराधी तत्व न सिर्फ  खुले आम हथियारों के साथ तस्वीरें परोस रहे हैं बल्कि अपने गुनाहों का महिमा मंडन भी कर रहे हैं। नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें पोस्ट कर राजनीतिक ताकत दिखाते हैं। समाज के रक्षकों और भक्षकों के मनोबल की यह विरोधाभासी तस्वीर चिंता जगाती है।
पुलिस कर्मियों से जबरदस्ती की यह घटनाएं नई नहीं हैं। पिछले कुछ सालों पर नजऱ डालें तो अदना कर्मचारी छोडि़ए, आईपीएस अधिकारी तक आपराधिक हिंसा के शिकार हुए हैं। चंबल में खनन माफिया द्वारा एक अधिकारी को कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया था। पिटने की घटनाएं तो आम सी हो गई हैं और पुलिस ही क्यों, जनता से सीधे संपर्क रखने वाले सारे सरकारी अर्धसरकारी कर्मचारी अपने कर्तव्यों के निर्वहन में भीड़ की हिंसा का शिकार होते रहे हैं। इंदौर में एक ताकतवर नेता के विधायक पुत्र द्वारा नगर निगम कर्मचारियों की बेसबाल के बैट से पिटाई ने सुर्खियां बटोरी थीं। बिजली, राजस्व, आबकारी और परिवहन जैसे अमलों के अधिकारियों कर्मचारियों के पिटने की घटनाएं जब तब खबरें बनती रहती हैं।
सवाल उठना लाजिमी है। आखिर इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का कारण क्या है? निर्विवाद तथ्य है कि कानून का तंत्र दंड के भय की बिना पर ही चलता है। दुनिया की कोई भी व्यवस्था हो, हर आदमी के पीछे एक पुलिस वाला लगाने की क्षमता नहीं रखती। ऐसा विचार ही हास्यास्पद है। दंड का भय ही लोगों को अपराध करने से रोकता है। एक जमाना था जब पुलिस पर हाथ उठाना तो छोडि़ए, गिरहबान पर हाथ डालने में भी अपराधी थर-थर कांपते थे। ताज़ा घटनाएं बताती हैं यह भय गायब हो रहा है। इसके पीछे के प्रमुख संभावित कारणों में से एक है राजनीतिक संरक्षण। किसी भी गंभीर कार्यवाही के पहले व्यवस्था नेताओं का मुंह ताकती नजर आती है। संगठित अपराध से कमाया जाने वाला पैसा दूसरी प्रमुख वजह है। अपराधी जानता है, पैसे की दम पर न्याय दंड से बचना कितना सरल है। मुकदमे सालों चलते हैं, पैसे और भय की ताकत पर गवाहों से बयान बदलवाए जाते हैं और अपराधी साफ छूट जाते हैं।
राजनीति का अपराधीकरण एक और महत्वपूर्ण कारण है। प्रतिष्ठित संस्था एसोसिएशन आफ  डेमोके्रटिक रिफॉम्र्स द्वारा 28 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के विश्लेषण से निकला ताजा विश्लेषण बताता है कि देश के कुल 4092 विधायकों में से 45 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें से 1200 से अधिक मामले हत्या अपहरण और महिलाओं के खिलाफ  अपराध जैसे गंभीर मामलों से संबंधित है। नेतागण इसे राजनीतिक प्रतिशोध का बहाना बताते हैं और जब तक साबित नहीं होता तब तक अपराधी नहीं के न्यायिक सिद्धांत के झंडे तले ताकत में बने रहते हैं। कहने को इन मामलों के लिए विशिष्ट अदालतें हैं मगर कानून की पतली गलियों से बचकर निकलने या मामले लटकाए रखने के रास्ते ढूंढ़ लिए जाते हैं। न्याय दंड के भय में कमी से समाज में उच्छृंखलता बढ़ रही है। नेताओं और अपराधियों में ताकत और पैसे का अहंकार चरम पर है। यकीनन सारे नेता ऐसे नहीं हैं, बेदाग और निर्विवाद भी हैं। मगर लगता है कि संख्या बल में कमी के आगे अपनी बात रखने में मजबूर हैं। राजनीति वोट की ताकत पर चलती है और अपराधियों ने भय और राबिनहुडी धर्मात्मा की छवि बनाकर वोट बैंक की ताकत जुटाना सीख लिया है। ऐसे में वे नेताओं की कमजोरी बन गए हैं। तस्वीर भयावह है और जितनी जल्दी हो सके बदलनी चाहिए। अगर पुलिस जैसा ताकतवर महकमा भी गिरते मनोबल का शिकार हो गया तो जन सामान्य की सुरक्षा व्यवस्था का भगवान ही मालिक होगा। शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व जितनी जल्दी पहल करे उतना अच्छा होगा। इस मामले में देर की गुंजाइश खत्म हो गई है।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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