जबलपुर (जयलोक)। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा की विवादित नियुक्ति का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। सदन में इस विषय पर सरकार की गोलमोल जवाबदेही ने न केवल उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सरकार इस अवैध नियुक्ति को बचाने के लिए जानबूझकर सदन को गुमराह कर रही है। यह कहना है कि विधायक लखन घनघोरिया का। जिन्होंने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए रादुविवि कुलपति की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए।
विधानसभा में विधायक लखन घनघोरिया ने रादुविवि कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा की प्राध्यापक पद पर नियुक्ति में हुई गंभीर अनियमितताओं पर उच्च शिक्षा मंत्री से जवाब मांगा। मंत्री ने सिर्फ औपचारिकता निभाते हुए दावा किया कि नियुक्ति विनियमों के अनुरूप हुई थी। लेकिन जब विधायक घनघोरिया ने इस नियुक्ति से जुड़े ठोस तथ्यों को सदन के समक्ष प्रस्तुत किया और पूछा कि इस पद के लिए कार्यानुभव अनिवार्य था, तो क्या प्रो. राजेश कुमार वर्मा के पास यह अनुभव था?
इस पर मंत्री ने उत्तर दिया कि नहीं यह अनिवार्य नहीं था। सत्य यह है कि यह अनुभव केवल उन पदों पर आवश्यक नहीं था जहाँ पीएचडी उपाधि के उपरांत दस वर्षों का कार्यानुभव हो, परंतु प्रो राजेश कुमार वर्मा के पास पीएचडी उपाधि प्राप्त करने के पश्चात मात्र तीन माह का अनुभव था। उन्होंने विधायक के प्रति प्रश्न का उत्तर भी नहीं प्रदान किया।
सदन में मचा हंगामा – विधायक घनघोरिया ने मंत्री को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि मंत्री खुद सदन को गुमराह कर रहे हैं। विज्ञापन में स्पष्ट रूप से लिखा था कि प्राध्यापक पद के लिए 10 वर्षों का कार्यानुभव आवश्यक है, जिसमें शोध निदेशक के रूप में अनुभव अनिवार्य रूप से शामिल होना चाहिए। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मामले पर क्या कार्रवाई करती है।
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