स्वशासी संस्थाएँ फीस देकर ले सकती हैं वकीलों की सेवाएँ
जबलपुर (जयलोक)। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय द्विवेदी व न्यायमूर्ति अचल कुमार पालीवाल की विशेष युगलपीठ ने मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के विरुद्ध जाँच के निर्देश जारी किए जाने की माँग संबंधी अंतरिम आवेदन अनुचित पाकर निरस्त कर दिया। अंतरिम आवेदन में नर्सिंग कालेज मान्यता फर्जीवाड़ा में नियम विरुद्ध तरीके से मनमानी फीस लेने का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि स्वशासी संस्थाएं फीस देकर वकीलों की सेवाएं ले सकती हैं। इसलिए महाधिवक्ता द्वारा नर्सिंग काउंसिल की ओर से पैरवी के लिए फीस लिए जाने को किसी भी सूरत में गलत नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि महाधिवक्ता की नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद-165 के तहत की जाती है तथा वह राज्यपाल की इच्छा पर्यन्त पद धारण करता है तथा राज्यपाल द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक प्राप्त करता है। ऐसा कहीं भी निर्धारित नहीं है कि महाधिवक्ता राज्य के किसी स्वायत्त निकाय/निगम का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है या स्वतंत्र व्यावसायिक फीस नहीं ले सकता है।
कोर्ट ने कहा कि महाधिवक्ता के विरुद्ध आरोपों की जाँच करने की आवश्यकता नहीं है और न ही ऐसे आरोपों से इस न्यायालय के मन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे पहले से शुरू की गई कार्यवाही में कोई आशंका उत्पन्न हो सकती है। बिना किसी आधार के महाधिवक्ता को अत्यधिक पेशेवर फीस का भुगतान करने के सबूत के बिना इस तरह के आरोपों पर हाई कोर्ट द्वारा विचार नहीं किया जा सकता है। स्वायत्त निकाय द्वारा वकीलों को नियुक्त करने और उनके मानदंडों के अनुसार पेशेवर फीस का भुगतान करने के मामले में प्रथमदृष्टया कोई अवैधता नहीं दिखती है।
दरअसल, प्रदेश के बहुचर्चित नर्सिंग घोटाले को लेकर एक जनहित याचिका ला स्टूडेंट एसोसिएशन द्वारा वर्ष 2022 में दायर की गई थी। इसी की सुनवाई के साथ एक अंतरिम आवेदन दायर कर महाधिवक्ता को फीस भुगतान प्रकरण में जांच के निर्देश पर बल दिया गया था।
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