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आध्यात्मिक विकास की यात्रा के पड़ाव हैं – जन्म और मृत्यु

ओम प्रकाश श्रीवास्तव
आईएएस अधिकारी तथा
धर्म और अध्यात्म के साधक
सृष्टि में न कुछ नया पैदा होता है न नष्ट होता है। बस अव्यक्त से व्यक्त और फिर अव्यक्त होता रहता है। समष्टि के स्तर पर व्यक्त होने को सृष्टि और अव्यक्त होनें को प्रलय कहते हैं। व्यष्टि स्तर पर यही जन्म और मृत्यु है। अव्यक्त होने का अर्थ नाश होना नहीं है। इसका अर्थ है मूल कारण में लीन हो जाना।
आस्तिक हो या नास्तिक, किसी भी धर्म, दर्शन या मत का माननेवाला हो, वह आत्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष आदि के संबंध में पृथक् विचार रख सकता है परंतु जन्म व मृत्यु को कोई भी नकार नहीं सकता। जन्म और मृत्यु की घटनाएँ प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं। जन्म के साथ ही मृत्यु की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। इस विकास क्रम में जीव अनेक योनियों में भटकते हुए जब मनुष्य योनि में आता है तब यह अवसर मिलता है कि वह अपने यथार्थ स्वरूप को जान सके। जब यह अनुभूति हो जाती है कि वह परमात्मा का अंश है तो उसका प्रकृति के साथ माना हुआ संबंध समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह जीते-जी जीवन्मुक्त हो जाता है। मृत्यु के बाद स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर अपने मूल कारण, प्रकृति में विलीन हो जाते हैं और जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। जब तक आध्यात्मिक विकास की यह अवस्था प्राप्त नहीं होती तब तक मृत्यु के बाद नई देह प्राप्त होती रहती है अर्थात् पुनर्जन्म होता रहता है। इस प्रकार जन्म और मृत्यु, आध्यात्मिक विकास की यात्रा के पड़ाव हैं। आध्यात्मिक विकास की इस यात्रा को बताते हुए भगवान् कहते हैं – ‘’वास्तव में जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए इन बातों के लिए, जो अनिवार्य हैं, तुझे शोक नहीं करना चाहिए (गीता 2.27)’’।

जैसे सूर्य उदय होता है व अस्त होता है और फिर उदय होता है, उसे रोका नहीं जा सकता, उसी प्रकार जब तक परम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती है तब तक इस यात्रा को रोकना किसी के वश की बात नहीं है। अर्जुन के स्वजनों, भीष्म, द्रोण आदि ने जन्म लिया है तो मुक्ति प्राप्त होने तक वे मरेंगे और पुन: जन्म लेंगे। यह अटल प्रवाह चलता ही रहेगा। इसे बदला नहीं जा सकता तो उसे सहन करना होगा। ऐसी अपरिहार्य बात के लिए शोक करने का कोई कारण नहीं है। इस श्लोक का मनन, चिंतन, निदिध्यासन करने से जन्म और मृत्यु की यह वास्तविकता हमारे अंतर में दृढ़ हो जाए तो मृत्यु का भय और शोक समाप्त हो जाता है।
इसी क्रम में अब भगवान् शोक न करने के लिए दूसरा तर्क दे रहे हैं। यह तर्क लौकिक दृष्टि पर आधारित है। भगवान् कहते हैं – ‘’हे भारत ! सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त थे और मरने के बाद अव्यक्त हो जाएँगे, केवल बीच में ही व्यक्त दीखते हैं, इसमें शोक करने की बात ही क्या है (गीता 2.28)’’ यह भी सभी का सामान्य अनुभव है कि सभी का अस्तित्व, जन्म और मृत्यु के बीच में ही दिखाई देता है। जन्म से पूर्व व मृत्यु के पश्चात् प्राणी अव्यक्त (अप्रकट) रहता है अर्थात् उसे इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता। वह अव्यक्त से व्यक्त (प्रकट) होता है और फिर अव्यक्त हो जाता है। यह मध्य की स्थिति ही है जिसमें संसार के सारे संबंध बनते हैं।

जन्म से पूर्व जो अव्यक्त है वह भूत है और मृत्यु के बाद जो अव्यक्त होगा वह भविष्य है। वह वर्तमान में ही व्यक्त हुआ है। जब पता ही नहीं कि कहाँ से आते हैं और कहाँ चले जाते हैं, यह अपरिहार्य है और हम इसमें कुछ कर भी नहीं सकते तो फिर चिंता किस बात की इसलिए यह शोक का नहीं अपितु बोध का विषय है।
सृष्टि में न कुछ नया पैदा होता है न नष्ट होता है। बस अव्यक्त से व्यक्त और फिर अव्यक्त होता रहता है। समष्टि के स्तर पर व्यक्त होने को सृष्टि और अव्यक्त होनें को प्रलय कहते हैं। व्यष्टि स्तर पर यही जन्म और मृत्यु है। अव्यक्त होने का अर्थ नाश होना नहीं है। इसका अर्थ है मूल कारण में लीन हो जाना। जैसे स्वर्ण के कंगन को गलाकर उस स्वर्ण से हार बनाया जाए तो हम कहेंगे कि जो स्वर्ण कंगन के रूप में व्यक्त था वह जब गलकर स्वर्ण बना तो कंगन का रूप अव्यक्त हो गया। और जब पुन: वही स्वर्ण, हार बना तो हार के रूप में व्यक्त हो गया। जन्म के पूर्व देह पंचमहाभूतों में विद्यमान थी और मृत्यु पश्चात् उन्हीं पंचमहाभूतों में विलीन हो जाती है।
जन्म के पूर्व जीव का वर्तमान शरीर से संबंध नहीं था और मृत्यु के बाद भी नहीं रहेगा।

एक गरीब व्यक्ति स्वप्न में राजा बन गया। स्वप्न के राजा का अस्तित्व सोने के पूर्व नहीं था और जागने पर भी नहीं रहेगा। अर्थात् जो स्वप्न में व्यक्त था वह उसके पूर्व और बाद में अव्यक्त रहेगा। भला ऐसे स्वप्न का भी कोई शोक करता है जैसे समुद्र में लहरें निरंतर उत्पन्न हो रही हैं और समुद्र में लीन हो रही हैं और उनका आधार है समुद्र। इसी तरह जगत् की उत्पत्ति और लय, जीवन और मृत्यु का चक्र निरंतर चल रहा है और इसका अधिष्ठान है ब्रह्म। इसलिए मृत्यु का शोक करने का कोई कारण नहीं है।
लौकिक दृष्टि से कुछ तर्क देने के बाद भगवान् पुन: आत्मा के महान रहस्य का उद्घाटन आरंभ कर देते हैं। भगवान् कहते हैं – ‘’आश्चर्य के समान कोई इसे देखता है, ऐसे ही कोई दूसरा इसका आश्चर्य जैसा वर्णन करता है।

और, कोई इसे आश्चर्य जैसा सुनता है और सुनकर भी इसे कोई जानता नहीं (गीता 2.29)। आत्मा को उस प्रकार से नहीं जाना जा सकता जिस प्रकार हम इन्द्रियों से संसार की वस्तुओं को जानते हैं। हमारी सारी इन्द्रियाँ शरीर से बाहर की ओर खुलती हैं। अत: संसार की वस्तुओं को देखने के लिए दृष्टा, दृश्य और देखने की शक्ति की त्रिपुटी होनी आवश्यक है। आँख बाहर देख सकती है परंतु वह स्वयं को नहीं देख सकती।
यही बात अन्य इन्द्रियों जैसे सुनने, गंध लेने, स्पर्श करने और रस लेने के लिए भी आवश्यक है। संसार की वस्तुएँ हमसे बाहर हैं अत: इन्द्रियों से उनका अनुभव हो जाता है। परंतु आत्मा तो हमारा स्वरूप है, वह बाहर की वस्तु नहीं है अत: उसका अनुभव करने के लिए किसी आँख, कान, नाक आदि की आवश्यकता नहीं होती। अपने भीतर के ‘मैं’ का अनुभव अपने आप में होता है।  इसलिए आत्मा का देखा जाना आश्चर्यमय होता है क्योंकि संसार में ऐसा कभी देखा-सुना नहीं गया।
वाणी से वही संप्रेषित किया जा सकता है जिसका श्रोता को अनुभव हो। जैसे कोई कहे कि उसने ‘कल-कल’ बहता झरना देखा । यदि श्रोता ने झरने की आवाज सुनी होगी तो ‘कल-कल’ शब्द उसे वह स्मृति करा देगा और वह समझ जाएगा।
परंतु यदि उसने झरना ही नहीं देखा तो ‘कल-कल’ शब्द उसके लिए निरर्थक ही होगा।

आत्मतत्त्व अद्भुत है, उसका कोई अनुभव श्रोता को नहीं होता अत: जब कोई आत्मवेत्ता वाणी से उसके वर्णन का प्रयास करता है तो उसे शब्द नहीं मिलते। फिर भी उसके द्वारा आत्मा का वर्णन किया जाना आश्चर्य है। (क्रमश:)

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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