
जबलपुर (जय लोक)। संस्कारधानी में गोंडवानाकाल के दौरान वीरांगना रानी दुर्गावती के द्वारा उनके शासनकाल में निर्मित किया गया मदन महल किला पत्थर पर की गई कलाकारी का एक जीता जागता नमूना है। दो चट्टानों पर बड़ी ही खूबसूरती के साथ तराशे गए इस छोटे से महल को हमेशा से ही उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। कल एक बार फिर यहां पर पर्यटक क्षेत्र में सक्रिय अपराधी किस्म के बदमाश ने एक पर्यटक को लूट लिया। आरोपी उसका मोबाइल लूट कर भाग गया। यह सिर्फ एक अपराधी घटना नहीं है, बल्कि निश्चित रूप से संस्कारधानी की अतिथि देवो भव की रीति पर भी कलंक है। इसके साथ ही पिछले तीन चार दशकों से राजनीतिक प्रशासनिक नजरिया से उपेक्षित इस स्थान पर इसी प्रकार की अवांछित अपराधिक गतिविधियों के कारण संस्कारधानी की पहचान के रूप में स्थापित यह मदन महल किला कभी पर्यटन का केंद्र नहीं बन पाया।

मध्य प्रदेश में ही ऐसे कई अन्य जिले हैं जहां पर अन्य शासको के कार्यकाल में छोटे मोटे निर्माण को वहां की स्थानीय प्रशासन ने पर्यटन के क्षेत्र से जोडऩे के लिए जबरदस्त मार्केटिंग की, सुविधा उपलब्ध कराई। आज हमारे जबलपुर के मौजूदा पर्यटक स्थल और एक से एक बढक़र आकर्षक स्थान बेहतर प्रकार की रणनीति से वंचित हैं। आने वाले समय में मदन महल की पहाडिय़ों में 100 करोड़ रुपए से विकास कार्य होना है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में तो यह स्थिति है कि जबलपुर का स्थानीय व्यक्ति भी अपने परिवार के साथ सुबह हो-दोपहर हो-या शाम हो अकेले मदन महल किले पर घूमने जाने से डरता है।
कल भी छिंदवाड़ा बिछुआ के पास रहने वाले 22 साल के प्रवीण के अभी इंदौर में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। छात्रों के एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जबलपुर आए थे। यहां वे अपनी दोस्त विद्या के साथ मदन महल किला घूमने के लिए पहुंचे। वापस लौटते वक्त वहां पर सुनसान स्थान पर एक अपराधी ने उनका मोबाइल लूट लिया और फरार हो गया। इस घटना से न सिर्फ जबलपुर में नकारात्मक संदेश गया है, बल्कि अब यह नकारात्मकता का संदेश छिंदवाड़ा, इंदौर सहित उनके साथियों के माध्यम से अन्य स्थानों पर भी पहुँचेगा।

मध्य प्रदेश के अन्य जिलों में भी ऐसे ही सुनसान क्षेत्र में मदन महल जैसे किले बने हुए हैं। लेकिन वहां पर इस प्रकार की अपराधिक गतिविधियां नहीं है। यह पहला वाक्या नहीं है जब मदन महल किला और उसे लगी हुई पहाड़ी, चाहे वह शैलपर्ण उद्यान या ओशो आश्रम के पीछे वाले क्षेत्र में भ्रमण करने पहुंचने वाले लोगों को लूटने की घटनाएं पूर्व में भी कई बार प्रकाश में आ चुकी हंै। अन्य स्थानों पर पर्यंटन केंद्र के रूप में विकसित होने के बाद वहां कई प्रकार की दुकानें लग गई, लोगों का आना जाना प्रारंभ हो गया और चहल पहल हो जाने के कारण ऐसी असामाजिक गतिविधियों का घटनाक्रम समाप्त हो गयी। मदन महल किले को पिछले 40 सालों से इस दृष्टि से विकसित करने के बारे में प्रयास नहीं होने के कारण ही आज यह स्थिति है कि वहां घूमने जाने का विचार अकेले नहीं आता अपने साथ डर का भाव भी लाता है।

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Author: Jai Lok






