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एआई-आधारित टूल्स के बढ़ते इस्तेमाल से स्कूलों के बच्चों की प्राइवेसी खतरे में?

बच्चों के डेटा के संभावित दुरुपयोग को लेकर संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने जताई चिंता
नई दिल्ली। शिक्षा के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का प्रसार जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी ही तेजी से इससे जुड़े जोखिम भी सामने आ रहे हैं। अब चर्चा बच्चों की सुरक्षा, उनकी निजता और अधिकारों पर मंडरा रहे खतरों तक होने लगी है। दुनिया भर में एआई-आधारित टूल्स के बढ़ते इस्तेमाल के बीच स्कूलों में बच्चों के डेटा के संभावित दुरुपयोग को लेकर संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों ने चिंता जताई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यूएनआरसी, यूनेस्को, यूएनआईसीआरआई और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय समेत विभिन्न यूएन विभागों ने एक संयुक्त बयान जारी कर बच्चों के डेटा की सुरक्षा और प्राइवेसी पर कड़े नियमों की जरुरत पर जोर दिया है। एआई के इस्तेमाल से डेटा लीक के गंभीर खतरे पहले ही कई बार उजागर हो चुके हैं। 2025 में अमेरिका के टेक्सास में स्थित एक स्कूल पर बड़े साइबर हमले और डेटा ब्रीच को लेकर मुकदमा दायर किया गया था। आरोप है कि इस घटना में 6 करोड़ से ज्यादा छात्रों और एक करोड़ शिक्षकों की संवेदनशील जानकारियां लीक हो गईं, जिनमें सोशल सिक्योरिटी नंबर जैसे बेहद निजी विवरण भी शामिल थे। यह स्कूल एक प्रमुख स्टूडेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम है, जो व्यापक पैमाने पर स्कूली डेटा संभालता है।
भारत में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। हाल ही में की गई एक पायलट स्टडी के मुताबिक भारतीय शैक्षणिक संस्थानों को सिर्फ नौ महीनों में दो लाख से ज्यादा साइबर हमलों और लगभग चार लाख डेटा ब्रीच की घटनाओं का सामना करना पड़ा। यह आंकड़ा बताता है कि देश में स्कूली डेटा कितनी बड़ी मात्रा में साइबर अपराधियों के निशाने पर है। फरवरी 2026 में जारी किया गया उनका पहला प्रोडक्ट ‘एनीटाइम टेस्टिंग मशीन (एटीएम)’ इसी तकनीक से संचालित है। यह टूल करिकुलम आधारित टेस्ट बनाता है, बच्चों के हस्तलिखित उत्तरों को डिजिटाइज करता है, क्लॉड की मदद से ग्रेडिंग करता है और द्विभाषी पर्सनलाइज्ड फीडबैक प्रदान करता है।
बता दें भारत का डेटा संरक्षण कानून डीपीडीपी अधिनियम बच्चों के डेटा पर विशेष सुरक्षा लागू करता है। इसके तहत किसी भी बच्चे का व्यक्तिगत डेटा प्रोसेस करने से पहले माता-पिता की सत्यापन सहमति जरुरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि एटीएम जैसे टूल्स के मामले में माता-पिता शायद पूरी तरह यह नहीं समझ पाते कि उनके बच्चे के हाथ से लिखे उत्तरों की तस्वीरें ली जा रही हैं, उन्हें विदेशी सर्वरों पर अपलोड किया जा रहा है और एआई मॉडल द्वारा विश्लेषित किया जा रहा है। यही अस्पष्टता भविष्य में डेटा प्राइवेसी के गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए इस दिशा में पारदर्शिता, नियमों का पालन और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अब एआई अपनाने से भी ज्यादा अहम चुनौती बन चुकी है।

 

 

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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