
नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची के मसौदे की समीक्षा प्रक्रिया को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि मतदाता सूची से संबंधित दावों और आपत्तियों पर होने वाली सुनवाई के दौरान किसी भी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि या बूथ-स्तरीय एजेंट (बीएलए) का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह निर्देश पश्चिम बंगाल में तीन चरणों वाली विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दूसरे चरण की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए दिया गया है।
निर्वाचन आयोग का यह कदम हुगली और कूच बिहार जिलों में हुई हालिया अप्रिय घटनाओं के बाद सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन जिलों में सत्ताधारी दल के कुछ विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप के कारण सुनवाई सत्रों में बाधा उत्पन्न हुई थी। आरोप है कि इन नेताओं ने सुनवाई के दौरान अपनी पार्टी के एजेंटों की उपस्थिति की मांग की और प्रक्रिया को जबरन बाधित करने का प्रयास किया, जिसके कारण कई सत्रों को समय से पहले बंद करना पड़ा। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची के सुधार और दावों के निपटारे की प्रक्रिया पूरी तरह प्रशासनिक और पारदर्शी होनी चाहिए। इसमें किसी भी बाहरी राजनीतिक दबाव या एजेंटों की भागीदारी प्रक्रिया की तटस्थता को प्रभावित कर सकती है। इसी संदर्भ में, मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय को निर्देशित किया गया है कि वे सभी जिला मजिस्ट्रेटों और जिला निर्वाचन अधिकारियों को सतर्क करें। यदि भविष्य में किसी भी जिले में सुनवाई को बाधित करने या राजनीतिक प्रभाव डालने की कोशिश की जाती है, तो संबंधित पक्षों के खिलाफ तत्काल आवश्यक कार्रवाई की जाए। सीईओ कार्यालय के अधिकारियों के अनुसार, आयोग का प्राथमिक उद्देश्य इस प्रक्रिया में पूर्ण निष्पक्षता और गोपनीयता बनाए रखना है। इससे पूर्व, राजनीतिक दलों द्वारा अपने एजेंटों को सुनवाई में शामिल करने की मांग को आयोग पहले ही खारिज कर चुका है।
Author: Jai Lok







