
जबलपुर (जयलोक)। पिछले दो वर्षों में शराब दुकानों की ऑफसेट प्राइस में हुई तेज बढ़ोतरी का असर अब जबलपुर जिले में साफ दिखाई दे रहा है। ऊंची बेस प्राइस के कारण ठेकेदारों के लिए मुनाफा निकालना मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि कई दौर की नीलामी के बाद भी जिले की 143 दुकानों में से 12 दुकानें अब तक नहीं ली गई हैं।
आबकारी विभाग के अनुसार इस आबकारी वर्ष में जबलपुर जिले में कुल 143 शराब दुकानों का संचालन प्रस्तावित है। अधिकांश दुकानों की नीलामी हो चुकी है, लेकिन 12 दुकानों के लिए ठेकेदार सामने नहीं आए। इन दुकानों को लेकर शनिवार को फिर से टेंडर प्रक्रिया आयोजित की गई।

बढ़ी ऑफसेट प्राइस बनी वजह
स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि पिछले दो वर्षों में ऑफसेट प्राइस में इतनी अधिक वृद्धि की गई कि कई क्षेत्रों में बिक्री के अनुपात में लागत निकालना भी कठिन हो गया। बाजार की स्थिति, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता मांग को देखते हुए ऊंची बेस प्राइस पर बोली लगाना जोखिम भरा सौदा साबित हो रहा है।

सूत्रों के मुताबिक प्रदेश स्तर पर भी यही स्थिति बनी है। कई दुकानों की नीलामी के लिए सरकार को ऑफसेट प्राइस में कटौती करनी पड़ी। अब विभाग ने फैसला लिया है कि बची हुई दुकानों की नीलामी पिछले वर्ष की ऑफसेट प्राइस पर की जाएगी, ताकि ठेकेदारों को राहत मिल सके।

राजस्व पर असर
शराब दुकानों की नीलामी में देरी से सरकार के राजस्व लक्ष्य पर भी असर पड़ रहा है। प्रदेश स्तर पर हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का लक्ष्य रखा गया है। जबलपुर जैसे बड़े जिले में 12 दुकानों का खाली रहना भी आबकारी विभाग के लिए चिंता का विषय है।
नीति की समीक्षा जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि कागजों पर तय की गई ऊंची ऑफसेट प्राइस और जमीनी बाजार की वास्तविक स्थिति में अंतर के कारण यह स्थिति बनी है। यदि दरें व्यवहारिक नहीं रहीं तो भविष्य में भी नीलामी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
Author: Jai Lok







