
डॉ.योगेंद्र श्रीवास्तव
(जयलोक)

गत 27 अगस्त से अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाकर दोनों देशों के परस्पर व्यापार पर गंभीर आघात किया है और इस मुद्दे पर दोनों के राजनीतिक सम्बन्धों में भी खटास आ गई है। भारत द्वारा रूसी तेल के आयात से खफा डोनॉल्ड ट्रम्प पहले ही धमकी दे चुके थे और उसी के मुताबिक उन्होंने 27 अगस्त से टैरिफ 25 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी करके भारत को फिलहाल आर्थिक मुश्किलों में डाल दिया है।
पिछली सदी के आखिरी दशक में शुरू हुए आईटी विस्फोट पर सवार वैश्वीकरण का खुमार धीरे धीरे उतर रहा है और इक्कीसवीं सदी की तेजी से बदलती दुनिया में राजनीतिक उथल पुथल से लगभग सारे देश प्रभावित हुए हैं। वर्ष 2016 के अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के साथ अमेरिका फर्स्ट का नारा बुलन्द हुआ जिसके कारण पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था में हलचल हुई।

वर्ष 2020 के चुनाव में ट्रम्प की हार हुई लेकिन उन्होंने अपने इरादे स्पष्ट कर दिये थे। उन्होंने कहा कि वे वैश्विकता को नकारते हैं और देशप्रेम को स्वीकारते हैं क्योंकि अमेरिका को फिर से महान बनाना है। वर्ष 2024 में दोबारा जीतने के बाद अपना वादा पूरा करने के इरादे से ट्रम्प ने पूरी दुनिया के खिलाफ टैरिफ वॉर शुरू कर दिया जिसका सबसे बड़ा खामियाजा भारत को उठाना पड़ रहा है। यद्यपि ट्रम्प के टैरिफ वॉर का अमेरिका में भी विरोध हो रहा है और उनकी अनिश्चित और स्वच्छंद कार्यशैली के चलते यह कहना मुश्किल है कि ट्रम्प आगे क्या करेंगे मगर फिलहाल भारत निश्चित ही एक बड़ी आर्थिक मुश्किल में है।

अमेरिका की शर्तें मानना भारत के लिये कतई मुमकिन नहीं क्योंकि ट्रम्प की मनमानी शर्तों को स्वीकार करने से राष्ट्रीय सम्मान को ठेस पहुंचेगी और देश के किसानों तथा मजदूरों को नुकसान होगा। मगर कभी कभी मुश्किल भी एक वरदान बन जाती है क्योंकि इस टैरिफ वॉर के चलते भारत ने अपने उत्पादों के लिये नए बाजारों की तलाश शुरू भी कर दी है जिसके उत्साहवर्धक संकेत मिले हैं। यदि भारत अपने कूटनीतिक कौशल से नये अंतर्राष्ट्रीय एवं व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने में कामयाब हो तो यह अमेरिकी दबाव का माकूल जवाब देने में मददगार होगा।
प्रधानमंत्री मोदी की हाल में हुई जापान एवं चीन यात्रा तथा एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) के नेताओं से निरन्तर संवाद यही संकेत दे रहे हैं कि भारत अपनी राह खुद चुनने की पुरजोर कोशिश में है। लेकिन इस व्यापारिक संकट के दौर में जनमानस में फिर से वही सवाल उभरता है कि हम भी वॉलमार्ट, अमेजऩ और अल्फाबेट (गूगल) जैसी विशाल कंपनियां क्यों नहीं बना सके? फॉर्च्यून 500 के अनुसार वर्ष 2024 में अमेरिका की सबसे बड़ी रिटेल व्यापार वाली कम्पनी वॉलमार्ट का टर्नओवर 680 बिलियन डॉलर था। अगर टेक कंपनियों की बात करें तो गूगल का टर्नओवर 350 बिलियन डॉलर और माइक्रोसॉफ्ट का टर्नओवर 280 बिलियन डॉलर था। इनकी विशालता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत का सालाना बजट खर्च लगभग 400 बिलियन डॉलर है।
इसके बरक्स भारत में 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा टर्नओवर वाली एकमात्र कम्पनी रिलायंस इंडस्ट्रीज है जिसका पिछले साल का टर्नओवर 125 बिलियन डॉलर था और सबसे बड़ी टेक कंपनी टीसीएस का टर्नओवर केवल 30 बिलियन डॉलर था। उत्पाद आधारित कम्पनियों को छोड़ भी दें तो देश में बौद्धिक क्षमता का भण्डार होने के बावजूद हम दुनिया के टेक्नोलॉजी व्यापार में ऊंचा स्थान नहीं पा सके, यह खेद का विषय है। एक अनुमान है कि 2030 में हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेंगे लेकिन जीडीपी के अनुसार विश्व में तीसरे नम्बर पर आना इसीलिए नाकाफी है कि इससे देश की इतनी बड़ी जनसंख्या की प्रतिव्यक्ति आय में बहुत मामूली बढ़ोत्तरी होगी।
हमारे देश के अनेक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और तकनीकी मैनेजर विश्व की बड़ी बड़ी कम्पनियों के शीर्ष तक पहुंचे हैं इसलिए इस गंभीर समस्या पर भी विचार किया जाना जरूरी है कि देश के सबसे प्रतिभावान इंजीनियर अमेरिका और यूरोप की कंपनियां क्यों ले जाती हैं? स्पष्ट है कि देश में प्रतिभा का सही मूल्यांकन और सदुपयोग नहीं हो रहा। पिछले तीन-चार दशकों से बड़ी संख्या में प्रतिभा पलायन के पीछे की वास्तविकता यही है कि हमने अपने सिस्टम को एंटरप्रेन्योर (नए विचार के साथ उद्यम) फ्रेंडली नहीं बनाया। पूरी व्यवस्था घोर लालफीताशाही और यथास्थितिवाद की जड़ता से ग्रस्त है इसलिए हर नए विचार को हतोत्साहित करने का हर संभव प्रयास किया जाता है। रिसर्च और इनोवेशन (नवाचार) के लिये प्रोत्साहन की कमी है। वैसे व्यावसायिक शिक्षा के पोस्ट ग्रैजुएट कोर्स और हर विधा में पीएच डी हेतु थीसिस की अनिवार्यता होती है लेकिन ये काम वास्तविक रिसर्च के बजाय अधिकांश कॉपी-पेस्ट की तर्ज पर किया जाता है। अकादमिक योग्यता हासिल करने के लिये छात्रों पर रिसर्च थोपी जाती है लेकिन यदि कोई वाकई रिसर्च का इच्छुक हो तो उसे हर स्तर पर हतोत्साहित किया जाता है। चूंकि रिसर्च के लिये अनुकूल वातावरण नहीं है इसीलिए इनोवेशन की संभावना भी खत्म हो जाती है। हमने अकादमिक क्षेत्र में वांछित गुणात्मक सुधार नहीं किये जिसका असर आर्थिक क्षेत्र में भी दिखाई देता है। भले ही भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है लेकिन न तो हमारी शिक्षण संस्थाएं विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं और न ही कॉरपोरेट कंपनियां विश्व व्यापार के शीर्ष पर हैं।
यह सर्वविदित है कि देश में लालफीताशाही किसी भी क्षेत्र में विकास के लिये एक बहुत बड़ा अड़ंगा है। अफसरशाही एकदम बेलगाम है और पूरा सिस्टम मूर्खता और मनमानी पर चल रहा है। भारत में उद्योग, श्रम, कम्पनी और टैक्स कानून इतने जटिल हैं कि एक छोटा सा उद्योग-व्यापार खोलना भी बहुत मुश्किल काम है। भले ही कागजों पर सरकार सिंगल विंडो क्लियरेंस का दावा करती है लेकिन भुक्तभोगी जानते हैं कि एक बिजली का कनेक्शन लेने में भी महीनों का समय लग जाता है। अफसर और बाबू फाइल इधर से उधर करने और काम को टालने में माहिर हैं। इसके पीछे भ्रष्टाचार भी है और घटिया कार्यसंस्कृति भी। क्या वर्तमान आर्थिक संकट से सीख लेकर हम सुधार की दिशा में कदम बढ़ाएंगे! अल्बर्ट आइंस्टाइन का प्रसिद्ध कथन है कि आपदा में ही महान अवसर हैं। क्या भारत ट्रंप टैरिफ की चुनौती के बाद इस पर अमल कर सकेगा? फिलहाल अमेरिकी उत्पादों के विरोध, ट्रंप की आलोचना और भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती की चर्चा के साथ राष्ट्रप्रेम उफान पर है लेकिन वास्तविकता यह है कि केवल भावनाओं के दम पर अर्थव्यवस्था को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि देश में रिसर्च और इनोवेशन पर जोर दिया जाये तथा लालफीताशाही पर अंकुश लगे। एंटरप्रेन्योरशिप को प्रोत्साहन के साथ रिसर्च और इनोवेशन के बलबूते ही अकादमिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में प्रगति सम्भव है।
Author: Jai Lok







