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गृहस्थ को धर्म अर्थ की प्राप्ति के लिए  प्रयत्न करना चाहिए- डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज

रायपुर (जयलोक)। श्री शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में चातुर्मास प्रवचन माला के अंतर्गत चल रही शिव पुराण की कथा के सदाचार प्रसंग की मार्मिक व्याख्या करते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ .स्वामी इन्दुभवानन्द  तीर्थ जी महाराज ने बताया कि गृहस्थ को धर्म अर्थ की प्राप्ति  के लिए प्रयत्न करना चाहिए। धार्मिक नियमों का पालन करते हुए अर्थ कमाना चाहिए, धर्मपूत अर्थ से ही धर्मपूतभोग की प्राप्ति होती है और भोग से वैराग्य की प्राप्ति हो जाती है। धर्मपूर्वक उपार्जित धन से जो भोग प्राप्त होता है उसे एक दिन अवश्य ही वैराग्य का उदय होता है धर्म के विपरीत अधर्म से उपार्जित धन के द्वारा जो भोग प्राप्त होता है, उससे भोगों के प्रति और अधिक  आसक्ति उत्पन्न होती है, जिससे व्यक्ति का अध: पतन हो जाता है। इस अध: पतन से बचने के लिए धन धर्मपूर्वक ही कमाना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि  दो प्रकार का होता है एक धर्म द्रव्य के द्वारा  संपादित होता है और दूसरा धर्म शरीर के द्वारासंपादित किया जाता  है। जो धर्म द्रव्य के द्वारा संपादित होता है उस धर्म को  यज्ञ दान अनुष्ठान आदि के रूप में जाना जाता  है ,और तीर्थ स्नान आदि शरीर से धर्म से संपादित होते हैं। शरीर और धन दोनों से ही धर्म संपादित होता है शरीर से संपादित होने वाले धर्म को तपस्या कहा जाता है। कामना के त्याग से अंत:करण की शुद्धि होती है और शुद्ध अंत:करण में ही ज्ञान का उदय होता है सत्ययुग आदि  में तपस्या आदि से धर्म  प्राप्ति को ही प्रशस्त माना गया था किंतु कलयुग में द्रव्य साध्य धर्म ही अच्छा माना गया कलयुग में धन से ही धर्म सहज और सुगम है, तथा कलयुग में प्रतिमा भगवद्विग्रह की पूजा से ही ज्ञान लाभ की प्राप्ति होती है। गृहस्थाश्रमी को धन-धान्य आदि सभी वस्तुओं का दान करना चाहिए। अपना हित चाहने वाले गृहस्थ को जिस काल में जो फल अथवा धान्यादि वस्तुएं उत्पन्न होती हैं उसका दान अवश्य करना चाहिए विशेष करके अन्न दान अवश्य करना चाहिए, जिसके अन्न को खाकर मनुष्य जब तक कथा श्रवण करता है अथवा  सद्धर्म का पालन करता है, उतने समय तक उसके किए हुए धर्म का आधा पुण्य फल दाता को मिल जाता है।कथा के पूर्व समस्त भागवत भक्तों ने शिव पुराण की पोथी का पूजन किया शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने मंगलाचरण करके आरती संपादित की पश्चात स्वामी जी महाराज ने शिव पुराण की कथा श्रवण कराई।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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