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ग्रामीण क्षेत्रों में एसआईआर में दिख रही तेजी

महिलाओं का डाटा एकत्रित करने में आ रही परेशानी

जबलपुर (जयलोक)। जिले में एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया शुरू हुए दो सप्ताह बीत चुके हैं और अब जैसे-जैसे 4 दिसंबर की अंतिम तिथि नजदीक आ रही है, प्रशासनिक हलचल तेजी से बढऩे लगी है। लेकिन इस बार सबसे दिलचस्प तस्वीर यह है कि ग्रामीण क्षेत्र जागरुकता और सहयोग में शहरों से कहीं आगे नजर आ रहे हैं। जहाँ शहरों में बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने घरों में बैठकर बीएलओ का इंतजार कर रहे हैं, वहीं गांवों में लोग खुद बीएलओ तक पहुंचकर फार्म भरवा रहे हैं, दस्तावेज दिखा रहे हैं और संशोधन कार्य में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में काम की रफ्तार अपेक्षाकृत बेहतर है, जबकि शहरों में धीमी गति बनी हुई है।

 

संसाधनों की कमी से बढ़ी दिक्कतें
इस सर्वेक्षण ने प्रशासनिक तैयारियों की कमियों पर भी रोशनी डाली है। कई बीएलओ मानते हैं कि इस बार उन्हें दिया गया प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं था, जिसके कारण डेटा मिलान, ऑनलाइन अपडेट और दस्तावेज सत्यापन में बार-बार त्रुटियाँ सामने आ रही हैं। उधर रियल-टाइम अपडेट के लिए दिए गए तकनीकी संसाधन भी पर्याप्त नहीं हैं। कई बीएलओ को अब भी पुराने मोबाइल, कमजोर इंटरनेट और सीमित डेटा सपोर्ट के साथ काम करना पड़ रहा है। यह सीधे तौर पर फील्ड की कार्यक्षमता को प्रभावित कर रहा है।

ऑनलाइन सिस्टम की धीमी रफ्तार
बीएलओ बताते हैं कि इस बार ऑनलाइन प्रक्रिया उनकी सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है। पोर्टल का सर्वर कई बार इतना धीमा हो जाता है कि एक एंट्री अपलोड करने में 25-30 मिनट तक लग जाते हैं। कई बार सर्वर बीच में बंद हो जाने से पूरा दिन बेकार चला जाता है। ऐसी स्थिति में जब फॉर्म वापस आते हैं और दोबारा संशोधन करना पड़ता है, तो काम कई गुना बढ़ जाता है। यही वजह है कि शहरी क्षेत्रों में कार्य की गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है।

2003 के पुराने मतदाताओं की खोज
एसआईआर के इस चक्र में सबसे मुश्किल कार्य है 2003 की मतदाता सूची में दर्ज उन लोगों की खोज जो आज व्यावहारिक रूप से किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद नहीं मिलते। जबलपुर के वार्डों में बीएलओ घंटों घर-घर तलाश कर रहे हैं, लेकिन कई पते ऐसे हैं जहाँ घर ही अस्तित्व में नहीं, कई जगह लोगों को नाम तक याद नहीं, और कई मतदाता वर्षों पहले शहर छोड़ चुके हैं। एक बीएलओ ने बताया कुछ रिकॉर्ड इतने पुराने हैं कि पता लगाना भी मुश्किल है कि मतदाता जीवित हैं या नहीं। कई बार पड़ोसी भी जानकारी नहीं दे पाते।

शादीशुदा महिलाओं की मैपिंग पेचीदा
जबलपुर सहित पूरे प्रदेश में बड़ी समस्या उन शादीशुदा महिलाओं की पहचान और सत्यापन को लेकर सामने आई है जिनका 2003 में विवाह नहीं हुआ था। अब वे अलग-अलग घरों, वार्डों या गांवों में रहती हैं, जबकि पुराने रिकॉर्ड में उनका नाम मायके वाले पते पर दर्ज है। बीएलओ बताते हैं कि कई महिलाओं के मायके और ससुराल दोनों जगह नाम अलग-अलग हैं। उम्र और पते में असंगतता है, बहुत सी महिलाएं दूसरे शहर चली गईं, पर रिकॉर्ड अपडेट उसी पुराने पते पर है। ऐसी स्थिति में मिलान और आधार लिंकिंग अत्यंत धीमी गति से आगे बढ़ रही है।

आम जनता का सहयोग सुखद
हालाँकि चुनौतियों के बीच सबसे सुकून देने वाली बात यह है कि आम जनता में जागरुकता देखने को मिल रही है, और लोग आगे आकर अपना डेटा सही करवाने की पहल कर रहे हैं। ग्रामीणों का यह सहयोगात्मक रवैया बीएलओ के लिए बड़ी राहत साबित हो रहा है, जबकि शहरों में जागरुकता बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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