
जबलपुर (जयलोक)। इस साल का दूसरा और आखिरी पूर्ण चंद्र ग्रहण कल 7 सितंबर को है। जब धरती सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और अपनी छाया चांद पर डालती है, तब चंद्र ग्रहण होता है। यह खगोलीय घटना न सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए खास है, बल्कि धार्मिक, ज्योतिषीय और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस बार का चंद्र ग्रहण रात 9 बजकर 58 मिनट पर शुरू होगा और 8 सितंबर की रात 1 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगा। चंद्रमा पूरी तरह धरती की छाया में डूब जाएगा, जिसे आम भाषा में ‘ब्लड मून’ कहा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चंद्रमा उस समय हल्के लाल रंग का दिखता है। यह पूरा ग्रहण लगभग 3 घंटे 28 मिनट तक चलेगा और भारत के सभी हिस्सों में आसानी से दिखाई देगा।
इस संबंध में ब्रम्हाचारी डॉ. इंदुभुवानंद महाराज ने बताया कि चंद्रग्रहण में स्नान करने का महत्व शास्त्रों में वर्णित किया गया है। चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण में गंगा स्नान करना चाहिए। चंद्र ग्रहण में गंगा स्नान करने से गंगा स्नान करने से लाख गुना पुण्य की प्राप्ति होती है। गंगा नदी में स्नान करने से दस करोड़ पुण्य की प्राप्ति होती है। इसमें दान का भी विशेष महत्व है। चंद्र और सूर्य ग्रहण में जो करोड़ों गाय दान करने से पुण्य प्राप्त होता है यह पुण्य मात्र गंगा स्नान करने से ही प्राप्त होता है। कहते हैं जब सूर्य और चंद्र ग्रहण पड़ता है तो सारा जल गंगा के सामान मान लिया जाता है ऐसा तर्क शास्त्रों से प्राप्त होता है। जब राहु चंद्रमा को ग्रषित करता है तो सारा का सारा जल गंगा के सामान पुण्य देने वाला माना जाता है। अगर गंगा नदी प्राप्त ना हो या महानदी प्राप्त ना हो तो बावली के जल से स्नान करना चाहिए। उससे श्रेष्ठ जल कुआँ का होता है कुआँ के जल से श्रेष्ठ जल झरने का जल होता है। झरने से श्रेष्ठ जल नदी को होता है और नदी से भी श्रेष्ठ जल जलाशय का होता है। उससे भी श्रेष्ठ सरोवर का होता है। वहीं गंगा के सामान पुण्य देने वाला होता है। समुद्र के जल का विशेष महत्व है। गुरू क्षेत्र में गौ दान, हाथी दान, तिल दान, स्वर्ण भूमि दान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है वह पुण्य समुद्र में स्नान करने मात्र से प्राप्त होता है। अगर किसी कारणवश हम स्नान नहीं कर पाते हैं तो तीर्थ का स्मरण करने से ही सौ यज्ञ करने का पुण्य स्मरण से ही प्राप्त हो जाता है। जल पीने, स्मरण करने, तीर्थ के दर्शन करने, तीर्थ जल का स्पर्श करने से भी पुण्य प्राप्त होता है। चंद्र और सूर्य ग्रहण में श्रृाद्ध का भी विशेष महत्व है। जैसे ब्राम्हण के हाथ में सारी पृथवी का दान करने से पुण्य प्राप्त होता है वहीं पुण्य सूर्य या चंद्र गृहण में श्रद्ध करने से प्राप्त होता है। इसका इतना अधिक पुण्य है कि जब तक सूर्य चंद्रमा तारे रहते हैं तब तक उसको स्वर्गलोग में निवास प्राप्त होगा। लेकिन यह सूखा अन्न या सोने से किया जाएगा। श्राद्ध में भोजन कराने वाले को पुण्य प्राप्त होता है लेकिन भोजन करने वाले को पुण्य नहीं मिलता। सूतक, मरण के समय, ग्रहण के समय श्राद्ध भोजन करने वाले को दोष लगता है जबकि भोजन कराने वाले को पुण्य प्राप्त होता है। अगर कोई श्राद्ध नहीं करता है तो उसे पीड़ा प्राप्त होती है। त्रयोदशी से लेकर नौ दिनों तक मांगलिक कार्य त्याग करना चाहिए। जिस नक्षण पर ग्रहण पड़ता है उस नक्षण का 6 माह तक परित्याग किया जाता है। जब तक सूर्य और चंद्र ग्रहण हो तब तक जप करना चाहिए। ना सोना चाहिए ना भोजन करना चाहिए। अगर भोजन करना है तो मुक्ति के बाद ग्रहण करना चाहिए। जो निद्रा लेता है वह रोगी हो जाता है।

Author: Jai Lok







