
नरसिंहपुर (जयलोक)। महाराजश्री जी ने आज वाल्मीकि रामायण को आगे बढाते हुये अपने प्रवचन में बताया की जननं जाति इसका कभी परिवर्तन नहीं हो सकता जिस जाति के माता-पिता से आपका जन्म हुआ है वह कभी परिवर्तित नहीं हो सकती है ।
भगवान श्री राम ने अपनी बाल लीलाओं (अभिनय) से सुख प्रदान किये । ऋषि विश्वामित्र जी को जानकारी हुई वह बहुत समय से यज्ञ कर रहे थे मारीच, तडक़ा, सुबाहु के कारण उनके विघ्न करने से वह पूर्ण नहीं हो पा रहा था अधर्मियों, विधर्मियों, आतंकवादियों का यही काम होता है ।ऋषि विश्वामित्र ने विचार किया दशरथ जी से राम और लक्ष्मण को मांग कर ले आऊ तो यह यज्ञ पूर्ण हो सके । वह अयोध्या आए दशरथ ने उनके चरण धुलाकर सिंहासन पर बैठाया पूजन किया राजा ने कहा कि – केहि कारन आगमन तुम्हारा । कहहु सो करत न लावउँ बारा ।।उन्होंने यज्ञ रक्षा के लिये राम और लक्ष्मण जी की मांग दशरथ जी से की धर्म का पालन राजा करता है धर्म का उपदेश धर्माचार्य करते हैं । दशरथ जी राजकुमारों के बड़े होने पर उनके विषय में सभा में विचार विमर्श कर रहे थे । उसी समय महातेजस्वी ऋषि विश्वामित्र जी पधारे। हमारी पूर्णता बिना धर्म के बिना गुरु की कृपा के नहीं है।
दशरथ जी ने कहा –
सब सुत प्रिय मोहि प्रान की नाईं ।
राम देत नहिं बनइ गोसाईं ।।
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा ।
कहँ सुंदर सुत परम किसोरा ।।
सुनि राजा अति अप्रिय बानी ।
हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी ।।
चौथेंपन पायउँ सुत चारी ।
बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी ।।
मागहु भूमि धेनु धन कोसा ।
सर्बस देउँ आजु सहरोसा ।।
देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं ।
सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं ।।
दो अक्षर वाली अन्य जो वस्तु मांगना है मांग लीजिये एक निमिष मैं दे दूंगा राम को मत मांगिये !दो अक्षर की सब संपत्तियां दे सकता हूं । पुत्र वियोग की आशा से बहुत दु:ख हुआ क्या करूं शोक से नेत्रों से आंसू आ गये । संबंध परमात्मा से बनाओ सबसे व्यवहार करो मनुष्य उल्टा करता है संबंध सब रिश्तेदारों से बनाता है व्यवहार परमात्मा से करता है यही सब दु:खों का कारण है प्रेम परमात्मा से करो व्यवहार सबसे उल्टा मत करो । राम अभी युद्ध कला में पारंगत नहीं हैं । 60 हजार वर्ष बाद राम को पाया है । मारीच, सुबाहु महाबलशाली सुन्द और उपसुन्द के पुत्र हैं राम उनसे युद्ध नहीं कर पायेंगे। विश्वामित्र जी ने कहा मैं राम को जानता हूं उनके सामने कोई राक्षस नहीं टिक पायेंगे।विश्वामित्र जी को दशरथ के बार-बार मना करने पर क्रोध आ गया कहा तुमने प्रतिज्ञा की है जो मांगेंगे दूंगा इस कुल में ऐसा कभी नहीं हुआ, मैं बिना कुछ लिए लौट जाऊंगा । तब वशिष्ठ जी ने राजा दशरथ जी को समझाया आप सत्य प्रतिज्ञ हैं धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये । यह ऋषि धर्मात्मा है इनका मांगा दे दीजिये अपने दोनों पुत्रों को दे दीजिये।
महर्षि विश्वामित्र जी के साथ में राम और लक्ष्मण का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है यह उन्हें शक्ति संपन्न करके भेजेंगे उनके ही कल्याण के लिये ही यह मांग रहे हैं। तब दशरथ और कौशल्या जी ने राम लक्ष्मण जी से कहा आज से ऋषि विश्वामित्र जी तुम्हारे माता-पिता हैं यह जो कहें उसका पालन करना ।
।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

Author: Jai Lok







