
जबलपुर (जयलोक)। द्वारकापीठ के जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने जयलोक के सम्पादक परितोष वर्मा को दिए अपने लंबे साक्षात्कार में धर्म और धर्म परिवर्तन को लेकर किए गए प्रश्नों उत्तर भी दिए। शंकराचार्य जी ने कहा कि धर्म त्याग या धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को यह जानना होगा कि जो जिस धर्म में है वह धर्म या जाति कहां से आई। उन्होंने यह भी कहा कि जिस प्रकार कोई पुत्र अपने माता पिता को नहीं त्याग सकता उसी तरह वह अपनी जाति या धर्म का भी परिवर्तन नहीं कर सकता।
जयलोक – तो फिर कलिवज्र्य प्रकरण एवं पराशर आदि स्मृतियों का समयानुकूल निर्माण क्यों किया गया ?
शंकराचार्य जी – हिन्दू धर्म में कहा गया है कि, धर्म सभी देशकाल में समान ही मानना चाहिए, यहाँ तो वर्णाश्रम में ब्राह्मणादि वर्णों के धर्म बहुत भित्रता रखते हैं यही नहीं स्त्री पुरुषों के धर्मों में भी भिन्नता है परन्तु सामान्यधर्म, अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि सभी के लिये समान माने गये हैं। जिस प्रकार वर्णाश्रम धर्मों में भिन्नता है उसी प्रकार कलियुगादि भिन्न-भिन्न देशकालों के लिये भी मनु, शंख, लिखित, पराशर आदि मुनियों ने वेदानुकूल ही स्मृतियों का निर्माण किया है, किसी ने भी बुद्धिबल से शास्त्रों का प्रणयन नहीं किया प्रत्युक्त अनादि, अपौरुषेय वेद के आधार पर ही धर्मशास्त्रों का आविर्भाव किया गया जिनमें युगों-युगों के विभिन्न प्रकार के धर्मों का निर्वचन किया गया है।
कलिवज्र्य प्रकरण तो पर्युदास विधि के समान है उसका तात्पर्य कलिभिन्न युगों में उन उन कार्यों का प्रवर्तन मात्र है न कि कोई नवीन प्रवत्र्तन या निवर्तन का विधान किया गया है। केवल परिगणित कर्मों का देशकाल वशात् संकोच मात्र ही निहित है।
जयलोक – धर्म में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?
शंकराचार्य जी – धर्म अतीन्द्रिय वस्तु है जो प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विषय भी नहीं है उसका बोध केवल अनादि अपौरुषेय वेदवाक्यों के द्वारा ही हो सकता है। अत: उसमें पुरुष की भ्रम, प्रमादादि दोषयुक्त बुद्धि का प्रवेश नहीं है तो फिर मनुष्य की बुद्धिं से नवीन कल्पना कैसे की जा सकती है, केवल अनादि शास्त्रों में ही जो देश, काल तथा अन्य परिस्थिति के अनुसार विभिन्न प्रकार की कल्पनायें हैं वे ही मान्य हो सकती हैं। उन्हीं शास्त्रों में कलियुगादि की विभिन्न सामयिक व्यवस्थायें भी निरूपित हैं वे सभी शास्त्रसम्मत होने मात्र से ही प्रामाणिक हैं। परन्तु आलस्य, भ्रम, लोभ, प्रमाद, राग, द्वेषवशात् मानव बुद्धि से कोई भी परिवर्तन सम्भव नहीं है। अत: वेद, पुराण, स्मृतियों में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता। धर्मत्याग या धर्मपरिवर्तन करने वाले को यह जानना चाहिए कि जो जिस धर्म में वह है, वह धर्म या जाति कहाँ से आई ?
कहना होगा माता-पिता से-तो क्या माता-पिता का परिवर्तन किया जा सकता है? यदि नहीं तो धर्म कैसे परिवर्तित होगा? रक्त कैसे बदल सकते हैं ? जाति कैसे बदल सकते हैं? जैसे कोई नालायक संतान अपने पिता से कहे कि मैं आज से आपको अपना पिता नहीं मानता और वृद्धाश्रम भेज दे। फिर भी पुत्र चाहे माने या न माने पिता तो वही रहेंगे? इसी तरह जाति धर्म में भीपरिवर्तन नहीं किया जा सकता! मानना प्रमाण नहीं हैं।

धर्मान्तरण
शंकराचार्य जी ने कहा कि धर्मान्तरण शब्द ही अशुद्ध धर्मत्याग। यदि कोई कहेगा कि मैं हिन्दू धर्म को छोड़ रहा हूँ तो जिसे वह पकड़ेगा उसके लिये अधर्म हुआ। क्योंकि वह परधर्म है परधर्म : स्वीकार करना अधर्म है, तो धर्म की परिभाषा क्या हैं? यह हम लिख चुके हैं, फिर भी संक्षिप्त में जो ग्रंथ इस देश के भारत नाम और हिमालय से लेकर समुद्रपर्यन्त आपको प्रमाणित करते हैं। उन ग्रंथों के द्वारा विहित कर्म धर्म है। धर्म परिवर्तन करने वाले को पहले तो वह जिस धर्म में पैदा हुआ है उसका गुण-दोष बताना होगा। इसे रोके कैसे ? संविधान में जिस देश में धर्म के पालन की अनुमति दी गई है वह यही सनातन हिन्दुधर्म है। क्योंकि भारतीय संविधान इस देश का नाम भारत स्वीकार करता है। प्रमाण संविधान की प्रस्तावना में प्रारंभ में ही यह उल्लेख है कि इस देश का नाम इंडिया जिसे भारत कहते हैं। वह होगा। इस देश का जो राष्ट्रगान है जन-गण-मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता। यह राष्ट्रगान सिद्ध करता है कि इस देश का नाम भारत है।
अत: इस देश का भारत नाम संवैधानिक है। इसलिए संविधान ने इस देश के नागरिकों को जिस धर्म का पालन करने की स्वतन्त्रता दी है। वह धर्म वही है जिसके प्रतिपादक ग्रन्थ इस देश को भारत स्वीकार करते हैं। कुरान और बाइबल जैसे ग्रन्थ इस देश को भारत स्वीकार नहीं करता, इसलिये संविधान इस देश के नागरिकों की उस धर्म के पालन को स्वतंत्रता का अधिकार कैसे दे
सकता है? जिसका विधान ये ग्रन्थ करते हैं। इसलिए हिन्दु धर्म छोडक़र दूसरे धर्म को अपनाना असंवैधानिक है।

गुरु और पिता एक हैं
(1.) – नीतिशास्त्र में इन पाँचों को पिता कहा गया है। जनिता चोपनीता च यच्य विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पंचैते पितर: स्मृता: ॥ पिता जन्म देते हैं। गुरु हमारी देह में आध्यात्मिकता को जन्म देते हैं। पक्षी को द्विजन्मा कहा जाता है । पहला अंडा के रूप में और दूसरा अंडा जब खुलता है।
इस तरह ब्राह्मण जन्मनाब्राह्मणोज्ञेय: संस्कारात्द्विज उच्यते।।
(2.) वैदिककाल में -: ऋषियों के पिता ही उनके गुरु थे। (समाप्त)

हिंदू धर्म की रक्षा के लिए परिवर्तन एवं परिवद्र्धन आवश्यक है
Author: Jai Lok







