
नरसिंहपुर (जयलोक)।
द्वारकाशारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी ने कहा कि रामविवाह केवल आयोजन नहीं, आत्मा और परमात्मा का संयोग है पूज्य शंकराचार्य जी महाराज का मुंडकोपनिषद और मानस आधारित दिव्य व्याख्यान रामविवाह की कथा में मुंडकोपनिषद का प्रतिबिंब जब वेद और भक्तिकाव्य एक हो जाएँ चातुर्मास के 21वें दिन आश्रम परिसर में गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती श्रद्धा और संस्कृति के अनूठे संगम के रूप में मनाई गई।
कार्यक्रम की शुरुआत ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानंद जी के सरस सुभाषित तुलसीचरित-प्रवचन से हुई, जहाँ संत तुलसी के जीवन प्रसंगों में रामभक्ति की दिव्यता उभरकर सामने आई। ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप जी ने कहा तुलसीदास को राम-दर्शन हनुमान ने कराए, जैसे आत्मा को ब्रह्म-दर्शन गुरु कराता है। महाराजश्री की दिव्य वाणी: रामकथा और उपनिषदों की एकात्म दृष्टि अनन्तश्री विभूषित द्वारकाशारदापीठाधीश्वर पूज्यपाद शंकराचार्य स्वामी श्रीसदानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा जो राम विवाह कोमात्र एक कथा मानतेहैं, वे उसकेआध्यात्मिक रहस्यको नहीं जानते।यह आत्मा का ब्रह्म से मिलन है —
जैसे मुंडकोपनिषद में कहा गया:‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया…’दो पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं — एक खाता है और एक केवल देखता है।जो खाता है वह जीव है, जो देखता है वह परमात्मा है।
विवाह वह क्षण है जब दोनों के बीच की दूरी मिटने लगती है। विवाह नहीं, संस्कारों की ऋचाएँ गूंजीं मिथिला मेंमहाराजश्री ने विवाह प्रसंग का गूढ़ विवेचन करते हुए कहा राम का विवाह एक, धर्म का उद्घोष है जहाँ पिता के हाथ में बेटी है, वर के हाथ में धर्म है, और साक्षी में अग्नि और वेद हैं। उन्होंने कहा- बारात जब मिथिला पहुँची, तब दो कुल नहीं, दो दर्शन मिले। अयोध्या की मर्यादा और मिथिला का वैदिक तेज एक हुआ।
यह केवल राजकुमार का विवाह नहीं यह भारतभूमि के गृहस्थ-धर्म की पुनर्स्थापना है। मुंडकोपनिषद की दृष्टि से विवाह तपो ब्रह्म इतिमुंडकोपनिषद कहता है: तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपस्या के द्वारा ब्रह्मको जानो।महाराजश्री ने इसे रामविवाह से जोड़ा जिस विवाह मेंसंयम, सेवा, तप और धर्म की प्रतिष्ठा न हो, वह केवल एक सामाजिक अनुबंध है, आध्यात्मिक मिलन नहीं लेकिन श्रीराम का विवाह शरणागति का वरण है व्यवस्था में सेवा का भाव ब्रह्मचारी सुबुद्धानंद जी का अदृश्य नेतृत्व कार्यक्रम की संपूर्ण संरचना, संचालन और अतिथि समन्वय पूज्य ब्रह्मचारी सुबुद्धानंद जी के निर्देशन में अत्यंत सहजता से सम्पन्न हुआ।
मंच पर नहीं, लेकिन व्यवस्थाओं की प्रत्येक रचना में उनकी सेवा की गूंज सुनाई देती रही। आखऱिी संदेश, विवाह केवल मिलन नहीं, अनुशासन है पूज्यपाद महाराजश्री ने युवाओं से कहा- आज विवाह उत्सव बन गया, लेकिन भारत में विवाह ऋषियों की दीक्षा हुआ करता था।
उपनिषद कहता है ‘नायमात्मा न प्रवचनेन लभ्य:’ आत्मा उपदेश से नहीं, *निष्ठा से मिलती है। और यही बात तुलसीदास मानस में कहते हैं ‘चरन राम तीरथ चलि जाहीं, राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।’
यह दिन, केवल तुलसीदास जी की स्मृति नहीं था — यह वह क्षण था जब उपनिषद और मानस, दर्शन और भक्ति, शंकर और तुलसी एक-दूसरे को आलोकित कर रहे थे।

Author: Jai Lok







