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दैनिक जयलोक – प्रणाम जबलपुर-87 वॉ व्यक्तित्व, भारती वत्स : कविता से जेंडर सरोकारों तक की सक्रियता राजेंद्र चन्द्रकान्त राय

जबलपुर, (जयलोक )। प्रोफेसर भारती वत्स मूलत: कवि हैं, पर साहित्य केवल कागज और कलम तक ही सीमित नहीं होता, वह गहरी संवेदनाओं से उपजता है और वे संवेदनाएं रचनाकार के सार्थक सरोकारों से जन्मती हैं। भारती जी का संपूर्ण व्यक्तित्व एक ऐसे बौद्धिक का व्यक्तित्व है, जो समाज की असंगत धाराओं को बदलने के लिए अपने भीतर एक किस्म की चरम बेताबी को महसूस करता है। वे अपने अध्यापन, लेखन और सार्वजनिक जीवन में उस बेताबी के साथ परिवर्तन के पक्ष में निरंतर सक्रिय रहती हैं। उनसे मिलना, उन्हें सुनना और उनसे बातें करना अनुभवों के नए संसार में पैठने जैसा हुआ करता है।
वे समकालीन कविता के परिदृष्य में बहुत सशक्त रूप से अपनी उपस्थिति को दर्ज कराती हैं, परंतु जरा संकोची वृत्ति की होने के कारण उनका उस तरह से नोटिस नहीं लिया जा रहा है, जिसकी वे असली हकदार हैं। उनकी कविता में भाषा की रवानी, विचारों का सम्प्रेषण और विषयों की विविधता उनके सृजन को महत्तामय बनाती है। वे मनुष्यमात्र की चिंता करती हैं। इसीलिए हमारे पड़ोसी देश म्यांमार में फौजी तख्तापलट के बाद वहां के लोगों को जिस तरह से फौजी बूटों के तले कुचला जा रहा है, उसे वे अनदेखा नहीं कर पातीं। उन्होंने ‘म्यांमार के साथियों के लिए’ कविता में लिखा –
अपने समय में उपस्थित/दु:समय के साथी/ये युद्धरत लोग…/दरअसल वे लड़ रहे हैं/जीवन सौंदर्य के लिए/जिसका साक्षी है/सिर्फ मनुष्य…।/कुरुपताओं के पहाड़ों/के खिलाफ/ये नारंगी बसंत/दुनिया के नि:शेष होने के पहले/पृथ्वी पर सपनों की/फसलें उगाना चाहता है/वैसे ही जी लेने की/आदत पडऩे के पहले/बेचेनियों के बीज/बो देना चाहता है।/स्वाधीनता और सौंदर्य/की आंतरिक चाह/का यह रास्ता गुजरता है/प्यार के उस अदृश्य तलघर से/जहां फूटते रहते हैं/बुलबुले निरंतर/अतरंगी…..।
इन दिनों उन्होंने समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग ट्रांस जेंडर के हकों, विचारों और भावनाओं से समाज को परिचित कराने के लिए कमर कस रखी है। यहाँ पर ट्रांस जेंडर समुदाय के बारे में उनसे ही जानना ज्यादा मौजूं होगा- ‘जिस तरह ‘औरत की बात, उसके अनुभवों और उसके सामाजिक व्यक्तित्व को पितृसत्तात्मक समाज संरचना के विषमतामूलक सांस्कृतिक मूल्यों को समझे बिना नहीं समझी जा सकती उसी तरह ट्रांस व्यक्तित्वों के निर्विकल्प जीवन और उसकी यातनाओं को भी समाज की संकीर्ण, घटिया सांस्कृतिक मान्यताओं को जाने बिना, नहीं समझा जा सकता है।’ असल में हम सब और हमारा पूरा समाज ट्रांस जेंडर वर्ग से इतना अनभिज्ञ है, कि वह उनके जीवन-यथार्थ को जान पाने में असमर्थ ही रह गया है। वे हमें नाच-गाकर पैसे उगाहने वाला समुदाय मात्र ही प्रतीत होता हैं। हम उन्हें देख कर द्रवित नहीं होते, व्यंग्यात्मक मुस्कानों में रूपांतरित हो जाते हैं। भारती जी के सानिध्य में मेरी मुलाकात इसी समुदाय के रहीम मंसूरी से हुई थी और मैंने उनका एक लंबा इंटरव्यु किया था। उन्होंने बताया था कि ट्रांस जेंडर का यथार्थ यह है कि उसके पास देह तो होती है पुरुष की, परंतु उसकी सारी भावनाएं और मनुहारें एक स्त्री की ही होती हैं। माता-पिता उसका विकास एक लडक़े के तौर पर करना चाहते हैं और वह खुद एक लडक़ी की तरह अपने को कोमलांगी, लज्जालु और सपनों में डूबी हुई नायिका की तरह महसूस करती है। इस द्वैत का परिणाम उसका अपने ही घर से निष्कासन के रूप में ही होता है। बहुतों के साथ उन्हीं के परिजनों के द्वारा वीभत्स अत्याचार भी किया जाता है। अक्कई पद्मशाली ऐसी ही एक ट्रांस जेंडर हैं, जिनकी टांगों के बीच में उनके ही पिता ने खौलता हुआ पानी डाल कर घर से निकाल दिया था, पर आज वे अपने साहस से प्रतिष्ठित समाज सेविका की भूमिका में पहचान बना चुकी हैं।
भारती जी ने उनके लिए भी एक कविता रची है, ‘दुआओं की व्यापारी हूँ…’ बाड़े तुम्हारे/हरे, लाल, नीले, पीले और केसरी,/जिनमें क़ैद हो तुम/अपने झंडे-डंडे के साथ,/मवेशी की तरह,/वह भी रास्ता भूल जाता है/कभी-कभी बाड़े का,/पर तुम अपने दिमाग में लिये/घूमते हो नक्शा बाड़े का।पर मैं – अक्कई पद्मशाली/घूमती फिरती हूँ उन्मत्त बे-ख़ौफ़/इन सब बाड़ों के मुहानों पर/दुआओं का व्यापार करती…/तुम मुझे नपुंसक बोलते हो/ये तुम्हारी भाषा की लाचारी/तुम्हारे दिमाग़ की प्रवंचना है/जिसमें मैं, गाली बन तैरती हूँ। पर मैं -/पर मैं, एक सम्पूर्ण मनुष्य हूँ/मनुष्य की तरह।/तुम्हारे नवजात,/मेरी दुआओं से जन्म लेते हैं/मेरे पैरों की थाप और ताली की लय/तुम्हें आश्वस्त करती हैतुम्हारे जीवन के रंग, अनहद नाद की तरह/सब मुझसे शुरू और मुझ में समाप्त होते हैं./मैं परती धरती का गीत हूँ…। सुनो, स्त्रियों -/मैं अवहेलनाओं से बनी,/उदासी नहीं हूँ/मैं तिरस्कारों से उपजी,/हताश भी नहीं हूँ तुम्हारी तरह।/तुमने – मेरे दबंग स्वरों में छुपी/कातर ध्वनि को महसूस किया है कभी?/कभी किसी दिन या किसी रात, अकस्मात्/किसी बच्चे का घर से बेदखल हो जाना/कभी किसी दिन या किसी रात, किसी/बच्चे की टांगों के बीच खौलते पानी से/निकले आर्तनाद को सुना है कभी?/फिर भी मैं बेचारगियों का संगीत नहीं, /निर्भयता का उदग्र स्वर हूँ…। क्योंकि,/मुक्ति लिंग में नहीं दिमाग़ मे रचती है।सुनो पुरुषों, मैं -/देहराग की रागिनी नहीं /औदात्य और प्रेम का /उत्कट राग हूँ…।/तनिक ठहरो…/मेरे संपूर्ण अस्तित्व को/गाली में बदलने वालों – सुनो,/मेरी आत्मा की उदासियों को /जऱा धीरज से कान लगा /धरती पर…/बस सुनो…!/मैं तो बस, दुआओं की /व्यापारी हूँ। भारती जी इसी समाज की खातिर मैदान में हैं। वे आपको उनके बीच सौहार्द बांटते मिल सकती हैं। कलेक्टर-कमिशनर के दफ्तरों में उनके लिए पैरवी करती पाई जा सकती हैं और अपनी रचनात्मकता में उन्हें पिरोकर पूरे संसार को जगाने के लिए अपनी कलम चलाते हुए भी दिख सकती हैं। मैंने उन्हें तीनों रूपों में देखा है। जरूरत है हमारी आँखों और दिमागों के खुलने की। भारती जी आप और आपके पीछे जुटी उन वीरांगनाओं का अभिनंदन है, जो अपने विपरीत पड़े समाज में भी पूरे साहस के साथ जिंदा हैं और उससे संवाद बनाने के लिए हर साल सावन मास की प्रतीक्षा किया करती हैं।

 

नागरिकों की जागरूकता, अधिकारियों की सजगता और सफाई मित्रों के कारण मिला यह गौरव-महापौर

Jai Lok
Author: Jai Lok

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