
राजेंद्र चंद्रकांत राय
जबलपुर, (जयलोक )
इसलिए तारीख ने हमको कभी चाहा नहीं,
हम अकेले हैं हमारे पास चौराहा नहीं।
यह शेर भवानीशंकर की एक गजल से है। भवानीशंकर यानी एक झलझलाता हुआ पारदर्शी चेहरा। दुबली-पतली काया। तरल आवाज और लपक कर मिलने की उत्कंठा से भरा हुआ स्वभाव था उनका। मूलत: गजलगो थे, पर साक्षात्कार और परिचर्चाएं भी उन्होंने आयोजित कीं, जो ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ करती थीं। उनकी गजलें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहीं।
उन दिनों दुष्यंत कुमार की गजलों की भारी सरगर्मी थी। वे कविता से गजल के घर संतरण कर रहे थे और ऐसे में एक दिन भोपाल पहुंचे ‘सारिका’ के संपादक और चर्चित कथाकार कमलेश्वर ने उनसे गजलें सुनीं और अपने साथ पूरी पोथी लेकर बंबई चले गए थे। फिर हम सबने देखा कि कहानी की उस सर्वाधिक प्रसारित और प्रतिष्ठित मानी जाने वाली पत्रिका का एक पूरा अंक ही दुष्यंत कुमार की गजलों पर केंद्रित है। उन्हीं गजलों से हिंदी में गजलें लिखे जाने का एक नया दौर शुरु हुआ था, जिसे हिंदी गजलें भी कहा गया। भवानीशंकर उसी दौर में अपना मकाम बनाने निकले थे। उनका एक शेर है –
आदमी दिन पर दिन गिरा नीचे
और ऊँचे उठे मकान सभी।
इस दौरान उनके दो गजल संकलन सामने आए, चौखटों के पार और भवानीशंकर की हिंदी गजलें। वे ‘नवभारत’ के साहित्य संपादक भी रहे। उन्होंने उसमें प्रकाशन के लिए मुझसे भी रचनाएं ली थीं। बाद में भवानी भाई पर सत्य कथाएं लिखने का खब्त भी सवार हुआ था। वे मनोहर कहानियां ओर सत्यकथा में अपराध कथाएं लिखते रहे। इससे उनकी साहित्यिक पहचान कमजोर भी पड़ी। 1945 में जन्मे भवानीशंकर कोतवाली थाने की बगल में अपने पुश्तैनी सेठ चुन्नीलाल के बाड़े वाले मकान में रहा करते थे, जिनकी बगल में राजकुमार सुमित्र का भी ठिकाना था। दोनों घरों में मेरी आवा-जाही थी। सुमित्र जी से हम उनका सानिध्य पाने जाते थे और भवानी बाबू से गपियाने। हम यानी राजीव कुमार शुक्ल, जॉनी इरशाद अहमद और प्रभाकांत शुक्ल। महफिल जमती थी और जमाने भर की बातें होती थीं। उनकी पत्नी ममता जी अंग्रेजी की अध्यापिका थीं और अंग्रेजी में कविताएं लिखती थीं। हम लोगों के जाने पर खातिर‘तवज्जो करती थीं, पर बातचीत में ज्यादा हिस्सेदारी नहीं करती थीं। थोड़ा अंतर्मुखी प्रतीत होती थीं। फिर एक दिन सुना कि एक अग्नि-दुर्घटना में वे चली गईं। भवानी भाई पर उनकी मृत्यु का मानसिक असर पड़ा और वे स्मृति-भ्रंश का शिकार हो गए। चमचमाता व्यक्तित्व दरक गया। शीशे में दरारें आ गईं। सृजनात्मकता फना हो गई। वे अंदर से चूर-चूर होने लगे। और फिर एक ऐसा भी दिन आया, जब वे कहीं जाने के लिए, घर से निकले पर कभी लौटे नहीं। उनका कोई निशान तक नहीं खोजा जा सका। मैंने उनके पुत्र के द्वारा समाचार पत्रों में उनके कहीं चले जाने का विज्ञापन पढ़ कर ही जाना था, कि वे प्रस्थान कर गए हैं।
ठीक ऐसा ही ‘कोर्ट मार्शल’ जैसे नाटक, ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ जैसी संस्मरणत्मक प्रस्तक और ‘मरा हुआ पक्षी’ जैसी कहानी के नामचीन लेखक स्वदेश दीपक के साथ भी हुआ। वे भयानक रूप से जल गए थे और महीनों अस्पताल में तकलीफ भोगते रहे। जली देह में कई नासूर पैदा हो गए थे, ऐसे नासूर कि उनके प्रियजनों और परिजनों ने भी उनसे मुख मोड़ लिया था। फिर 7 जून 2006 की सुबह वे भी बहिर्गमन कर गए और उनका कहीं कोई पता नहीं चला। इस तरह दुनिया को त्याग कर चले जाने वाले कहां चले जाते हैं, हम में से किसी को भी नहीं पता। रंगकर्मी समर सेनगुप्ता के और खुद मेरे भी साले साहब भी इसी तरह अज्ञात में प्रस्थित हुए थे। क्या हमारे संसार से व्यथित लोगों का कोई अपना गोपन संसार भी कहीं है? भवानी भाई की रचनाशीलता, करुणा और व्यथा की यादें हमारे शहर पर भारी हैं। भवानी शंकर शहर को प्रमुख साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था मित्र संघ का साहित्य संयोजक संस्था के महासचिव अजित वर्मा द्वारा बनाया गया था। तब भवानी शंकर ने मित्र संघ की ओर से शहर के कवियों पर केंद्रित विशिष्ट कवि गोष्ठी के आयोजन की शुरुआत की।विशिष्ट कवि गोष्ठी प्रति सप्ताह आयोजित हुआ करती थी। जिसमें किसी एक कवि को केंद्रित करके उसे विशिष्ट कवि बनाया जाता था और उसकी कविताओं को सुनने से लेकर उसकी कविताओं की समीक्षा तक इस गोष्ठी में कवि किया करते थे और अपनी रचनाएं भी सुनाया करते थे। भवानी शंकर ने कवियों को लेकर एक और परंपरा शुरू की थी जिसमें वे कोई एक पंक्ति सभी कवियों को दिया करते थे और उस पंक्ति पर कवि अपनी रचनाएं लिखा करते थे और मित्र संघ द्वारा आयोजित गोष्ठियों में सुनाया करते थे। विशिष्ट कवि गोष्ठी के आयोजनों का दौर लंबा चला। भवानी शंकर द्वारा मित्र संघ की आयोजित विशिष्ट कवि गोष्ठियों में जाने-माने साहित्यकार रामेश्वर शुक्ल अंचल, नर्मदा प्रसाद खरे, श्रीबाल पांडे, गोविंद प्रसाद तिवारी, राम किशोर अग्रवाल मनोज जैसे दिग्गज कवि भी इन गोष्ठियों की शोभा हुआ करते थे। आज भवानी शंकर की रचनाओं को खोजने-सहेजने और प्रकाशित कराने की जरूरत है। उनका एक और शेर याद आ रहा है –
चौखटों के पार चमड़े का भरा बाजार है,
और कानों में हमारे इत्र का फाहा नहीं है।

Author: Jai Lok







