
54 दुकानों को नहीं मिले ठेकदार, इन दुकानों को चलाना आबकारी विभाग के बस में नहीं
जबलपुर (जयलोक)। मध्य प्रदेश सरकार का राजस्व का सबसे बड़ा साधन शराब की बिक्री का है। शराब की बिक्री के लिए प्रदेश सरकार लगातार नई-नई नीतियाँ बनाकर फैसले लागू करते आ रही हैं। एक बार फिर प्रदश सरकार ने नई आबकारी नीति बनाई। लेकिन यह आबकारी नीति बुरी तरह से फैल हो गई है। इस नीति का यह नतीजा है कि जिस बड़ी तादात में प्रदेश की शराब की दुकानों को नीलाम होना था वह नहीं हो पाया है। इस वजह से सरकार को शराब से होने वाली कमाई में करोड़ों रूपये का घाटा हुआ है। जबलपुर जिले में कुल 143 शराब दुकानों की नीलामी की जाना रही जिनमें से 54 दुकानों की नीलामी शेष रह गई थी। इन दुकानों के लिए ई-टेंडर आए। जो कि रिजर्व प्राईज से कम हैं और उनका मंजूर होना संभव नहीं हैं।

मध्य प्रदेश की नई आबकारी नीति इस वर्ष फेल हो गई, जबलपुर सहित प्रदेश के कई जिलों में 31 मार्च के बाद भी ठेके नीलाम नहीं हो सके, इतिहास में पहली बार एक अप्रैल को शहर की कई दुकानें बंद रहीं। गुरुवार को कुछ दुकानों को आबकारी विभाग ने अपने हैंडओव्हर किया, लेकिन माल की उपलब्धता नहीं होने और स्टाफ की कमी के कारण दुकानें संचालित नहीं हो पाईं। लिहाजा सरकार को दो दिन में करोड़ों रुपये की राजस्व की चपत लग गई।
सूत्रों के मुताबिक 27 अप्रैल को विभाग ने जबलपुर की 143 में से शेष बची 54 दुकानों के लिये ई टेंडर बुलाए थे। लेकिन यह सभी टेंडर सरकारी रिजर्व प्राईस से 20 से 40 फीसदी तक नीचे आए, लिहाजा शासन को प्रस्ताव भेजा गया। फिलहाल इन टेंडरों को मंजूरी नहीं मिली, सरकार की रिजर्व प्राईस से नीचे टेंडर नहीं देने की स्थिति में हैं। एक दो प्रतिशत भी बढ़ कर मिले तो टेंडर दिये जा सकते हैं। इस बीच नया वित्तीय वर्ष प्रारंभ हो जाने के बाद 54 दुकानों को आबकारी ने ठेकेदार नहीं मिलने से अपने हैंडओव्हर किया। अब विभाग के सामने मुख्य समस्या यह है कि इतना स्टाफ नहीं है की दुकानों को चला सके और दूसरा मुख्य पहलू यह है कि दुकानों में माल का स्टॉक भी नहीं है। विभाग को माल की खरीदी भी करनी है और दुकानों के संचालन के लिये स्टॉफ भी जुटाना है। फिलहाल आबकारी विभाग के हाथपैर फूल गये हैं।

नर्मदा किनारे होटलों में छलक रहे जाम
शासन के निर्णय के मुताबिक नर्मदा नहीं के किनारे 5 किलोमीटर दूरी तक न शराब की दुकानें खुल सकती हैं, न शराब का क्रय विक्रय हो सकता है। इसके बावजूद जबलपुर में तिलवारा के समीप जितनी भी नामचीन बड़ी होटलें हैं सबमें काकटेल पार्टियाँ धड़ल्ले से चल रही हैं। आखिर इन्हें एफएल 5 (शराब परोसने) का अस्थाई लायसेंस और परमिट कैसे दिया जा रहा है। हाल ही में शादी के सीजन में नर्मदा किनारे तिलवारा से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर स्थित सभी होटलों में काकटेल पार्टियां धड़ल्ले से चलीं। शासन के नियमों की धज्जियाँ उड़ी उसके बावजूद कोई ध्यान नहीं दिया गया। इससे शराब ठेकों की दुकानों को भी नुकसान हो रहा है और नियमों का उल्लंघन भी हो रहा है।

Author: Jai Lok






