
जबलपुर (जयलोक)
धर्मसम्राट पश्चिमाम्न्नाय द्वारकाशारदापीठाधीश्वर श्रीमज जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीसदानंद सरस्वती जी ने परमहंसी गंगा आश्रम में आयोजित चार्तुमास के अंतर्गत अपने प्रवचन में कहा कि ऋषि विश्वामित्र जी को दशरथ जी ने राम लक्ष्मण को सौंप कर आज्ञा दी कि अबसे ऋषि विश्वामित्र जी ही आपके माता-पिता हैं इनकी आज्ञानुसार ही अब आप लोगों को कार्य करना हैं।

संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिये यज्ञ होते हैं उन्ही की रक्षा के लिये विश्वामित्र जी दोनों भाइयों को ले जा रहे हैं।शंकराचार्य जी ने आगे कहा कि नीति राजनीति कहती है धर्मपालन करने वाले सलाहकार अच्छे होना चाहिये। धर्मनीति राजनीति दोनों में नीति है इसलिये राजनीति धर्म के अनुसार चलनी चाहिये।

चाणक्यनीति शुक्रनीति में कहा है राजा को संस्कृति, धर्म में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं होना चाहिये। डेढ़ योजन चलने पर दक्षिण तट सरयू का वहां ऋषि विश्वामित्र ने आचमन करा कर उन्हें बला अतिबला विद्यायें दी जिनसे भूँख-प्यास नहीं लगती। बला, अतिबला की मंत्र दीक्षा और जडी से पूरित किया।

बला, अतिबला सभी विद्याओं की माता है। शंकराचार्य जी ने आगे कहा कि सदाचार होगा तभी शिष्टाचार बनेगा यही हमारी संस्कृति है। ऋषि विश्वामित्र जी ने कहा मै तुम्हे इन विद्याओ के योग्य समझता हूँ। विद्याओ से जिस प्रकार सूर्य कि शोभा है वैसी प्रभु श्रीराम कि शोभा बनी। रात्रि विश्राम तीनो ने वहीं किया। शिवकथा-भगवान् श्रीराम ने लंका चढ़ाई के पूर्व रामेश्वरम भगवान् शिव की प्रतिष्ठा की। जो राम हैं वही शिव हैं। जो शिव हैं वही ईश्वर हैं।
Author: Jai Lok







