
जबलपुर, (जयलोक)। अमरकंटक में हुई दिव्यांग छात्र की नहाते समय हुई मौत से संबंधित घटना के संबंध में प्राचार्य डॉ शिवेंद्र परिहार ने अपना पक्ष भी जारी किया है। प्राचार्य परिहार का कहना है कि वे स्वयं पूर्णत: दृष्टिबाधित दिव्यांग हैं। छात्रों के आग्रह पर ही उन्हें शैक्षणिक भ्रमण हेतु अमरकंटक ले जाया गया था। विद्यार्थियों को बार-बार समझाइश दी गई थी कि नदी में नहीं उतरना है। किन्तु कुछ छात्रों के बार-बार आग्रह करने पर लगभग 20 छात्रों को पांच कर्मचारियों के साथ स्नान हेतु भेजा गया था। मृतक छात्र एक बार स्नान कर वापस आ चुका था, किन्तु उसके पश्चात उसने किसी कर्मचारी को बिना बताए अपनी इच्छा से पुन: नदी में स्नान करने चला गया। इसी दौरान यह भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित हुई।

एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि संयुक्त संचालक द्वारा दिनांक 23 फरवरी को एक जांच समिति का गठन किया गया, जिसमें सहायक संचालक सोनम बर्वे द्वारा प्राचायज़् के अधीनस्थ कर्मचारी शिवशंकर कपूर एवं सुरेश चन्द्र यादव को सदस्य बनाया गया। उल्लेखनीय है कि इन दोनों कर्मचारियों को पूर्व में अनियमितताओं के कारण तत्कालीन कलेक्टर द्वारा उनके पदों से हटाया गया था। श्री शिवशंकर कपूर को शासकीय राज्य अपंग संस्थान के अधीक्षक पद से तथा श्री सुरेश चन्द्र यादव को प्राचार्य, शासकीय दृष्टिबाधित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जबलपुर के पद से दिनांक 26/12/2024 को हटाया गया था।

तत्पश्चात इन संस्थाओं का प्रभार डॉ शिवेन्द्र सिंह परिहार को सौंपा गया है था।इसके अतिरिक्त श्री शिवशंकर कपूर द्वारा जांच रिपोर्ट जिला कलेक्टर तक पहुंचने से पहले कर्मचारियों के बयान तथा कुछ फोटो-वीडियो, जो जांच समिति को सौंपे गए थे, उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। यह जांच प्रक्रिया की गोपनीयता एवं संवेदनशीलता के विरुद्ध है और जांच समिति की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। इस संबंध में प्राचार्य परिहार ने प्रमाणों सहित संयुक्त संचालक आशीष दीक्षित एवं सहायक संचालक को अवगत कराया था, किन्तु इस गंभीर कृत्य के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई। इन परिस्थितियों में यह प्रतीत होता है कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से संचालित नहीं हो सकी। यह भी विचारणीय है कि जिन व्यक्तियों से जांच कराई गई, उन्हें ही पुन: संस्थाओं का प्रभार दे दिया गया।

इससे यह स्पष्ट होता है कि संपूर्ण जांच प्रक्रिया पूर्वाग्रह से प्रभावित रही।यह भी उल्लेखनीय है कि एक उच्च वेतनमान प्राप्त अधिकारी की जांच उनसे निम्न वेतनमान एवं अधीनस्थ पद पर कार्यरत कर्मचारियों से कराई गई, जो प्रशासनिक दृष्टि से भी उचित प्रतीत नहीं होता। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि एक पूर्णत: दृष्टिबाधित अधिकारी अपने कार्यों का संचालन अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के सहयोग से ही करता है।
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Author: Jai Lok






