
संस्कारधानी यानी जबलपुर के लोग भारी क्रोध में हैं, भोलेनाथ की तर्ज में उनकी भी ‘तीसरी आंख’ खुल चुकी और गुस्सा इस बात का है कि जबलपुर में साढ़े चार सौ करोड़ की लागत से डुमना एयरपोर्ट का विकास तो हो गया लेकिन वहां फ्लाइट नहीं आती। क्रोध में आकर जबलपुर के अनेक संगठनों ने एक ‘वायु सेवा संघर्ष समिति’ का भी गठन कर लिया, आए दिन उनकी बैठक होती है जिसमें तरह-तरह के निर्णय लिए जाते हैं अब एक निर्णय यह भी लिया गया है कि आगामी 6 जून को जबलपुर के लोग ‘नो फ्लाइंग डे’ मनाएंगे, यानी उस दिन कोई भी यात्री ना तो हवाई जहाज से जबलपुर आएगा और ना जबलपुर से किसी दूसरे शहर को प्रस्थान करेगा। जिन लोगों ने भी टिकटें बुक कर ली है उनसे भी यह आशा की गई है कि वे 6 जून की अपनी टिकट कैंसिल करवा दें पता तो यह भी लगा है कि बाहर से आने वालों ने भी अपनी टिकट कैंसिल करवा ली है। अपना मानना तो ये है कि नो फ्लाइंग डे की बजाय यदि ‘फ्लाइंग डे’ मनाया जाता तो ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि जब हवाई जहाज आ ही नहीं रहे हैं सारी फ्लाइट लगभग लगभग बंद है तो अपने आप नो फ्लाइंग डे या कहे ‘नो फ्लाइंग मंथ’ या ‘नो फ्लाइंग ईयर’ हो गया है ऐसे में ‘फ्लाइंग डे’ मनाना ज्यादा अच्छा होता कि अगर भूले भटके कोई विमान जबलपुर के रनवे पर उतर जाता तो उस दिन को फ्लाइंग डे मान लिया जाता। लोग बाग जाकर उस विमान की पूजा अर्चना करते उसे माला पहनाते, भोग लगाते, आरती उतारते कि हे विमान तुमने जबलपुर के डुमना हवाई अड्डे पर उतर कर उसके पूरे जीवन को कृतार्थ कर दिया। उसमें जो यात्री आ रहे थे उनका भी सम्मान किया जाना चाहिए कि कम से कम एक विमान को तो डुमना हवाई अड्डे पर लेकर आ ही गए। बताया तो ये भी जाता है कि जब यात्री डुमना हवाई अड्डे पर जाते हैं और जब वहां पर जाकर दरवाजे खटखटाते हैं तब कहीं जाकर कर्मचारी उबासी लेते हुए ‘एंट्रेंस गेट’ को खोलते हैं वे भी सोचते हैं कि जब दो-चार महीने में एक विमान आना है तो काहे के लिए एंट्रेंस गेट खोल के धूल धक्कड़ अंदर आने दे, बेहतरीन अंदर आराम करें उसी में फायदा है। वायु सेवा संघर्ष समिति के कुछ सदस्य दिल्ली में भी जाकर बात करके आए हैं लेकिन अभी तक ऐसा कोई आश्वासन नहीं मिला कि जो फ्लाइट बंद हो गई हैं वे चालू हो जाएंगी। सबसे मजे की बात तो ये है कि जबलपुर का कोई नेता इस मसले पर केंद्र सरकार से बात करने तैयार नहीं वैसे वो बेचारा कर भी क्या लगा यहां के नेताओं की बखत ही क्या है और फिर उड्डयन मंत्री ज्योति राजे सिंधिया अपने ग्वालियर की तरफ देखेंगे कि जबलपुर पर ध्यान देंगे, जिस शहर का कोई धनी धोरी ना हो उसे ऐसे दिन देखने ही पड़ते हैं। देखते हैं 6 जून के बाद एकाध दो विमान जबलपुर के रनवे पर उतरते हैं या फिर वो सूना की सूना रहता है वैसे पिछली बार अपन ने सलाह दी थी कि इस एयरपोर्ट का और भी उपयोग किया जा सकता है ताकि वहां के कर्मचारियों का वेतन निकल पाए, हो सकता है उड्डयन मंत्रालय अपने सुझाव पर अमल कर रहा हो और बहुत जल्द वहां परमानेंट प्रदर्शनी, सर्कस आदि लग सकती है।
अमेरिका भी चूहों से हारा
अपने को तो अभी तक यह मालूम था कि अमेरिका विश्व का सबसे ताकतवर देश है उसके पास बड़े-बड़े हथियार हैं जो वह दूसरे देशों को बेचता है विकास के मामले में भी उसको नंबर वन माना जाता है लेकिन अब पता लगा कि उसका सारा विकास और सारी ताकत चूहों के सामने फेल है वाशिंगटन में एक राष्ट्रीय सम्मेलन होने वाला है जिसमें तमाम बड़े-बड़े लोग आने वाले हैं जो बैठकर तय करेंगे कि अमेरिका को चूहों से कैसे मुक्त किया जाए यानी कुल मिलाकर चूहे अमेरिका पर भारी पड़ रहे हैं, जिस गति से चूहों की संख्या अमेरिका में बढ़ रही है उसे गति से तो इंसान भी नहीं बढ़ पा रहे। जिधर नजर डालो उधर चूहा दिखाई देता है वहां के वैज्ञानिक भी परेशान है कि चूहों की बढ़ती आबादी को कैसे रोका जाए कौन सा पेस्ट लगाया जाए जिसमें वे हनीमून ना मना सकें लेकिन चूहे तो चूहे हैं, कौन से बिल में घुस के ब्याह रचा लें, कौन से बिल में हनीमून मना ले और बच्चे पैदा कर दे ये सिर्फ चूहे ही जानते हैं। आप कितने बड़े जोधा हो लेकिन चूहों के सामने सबको नतमस्तक होना पड़ता है इससे अच्छा तो भारत ही है, ठीक है यहां भी चूहे हैं लेकिन कम से कम इन चूहों के लिए राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन तो नहीं बुलाना पड़ रहा यही कोई कम बात है क्या?
तेंदुए को भी डिग्री मिलना चाहिए
एक खबर आई है कि वाशिंगटन की वारमेट स्टेट यूनिवर्सिटी ने ‘मैक्स’ नाम की एक बिल्ली को ‘डि लिट’ की मानद उपाधि प्रदान की है, ये बिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस में ही रहती है, छात्रों के साथ खेलती है, उनके साथ दोस्ताना व्यवहार भी रखती है और छात्र-छात्राएं इस मैक्स नाम की बिल्ली के साथ सेल्फी भी लेते हैं और वह भी बाकायदा तरह-तरह के पोज़ बनाकर उनके सेल्फी में शामिल होती है, उस हिसाब से अपने जबलपुर के नया गांव में जो ‘तेंदुआ’ आए दिन घूमता रहता है और किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता उसको भी जबलपुर यूनिवर्सिटी द्वारा एक मानद उपाधि दिया जाना जरूरी है वो भी तो नयागांव के निवासियों का दोस्त हो गया है अब तो वहां के लोग तेंदुए को देखकर डरते नहीं और ना ही तेंदुआ उनका कुछ बिगाड़ता है वैसे भी किसी भी जानवर के साथ जब इंसान रहता है तो इंसान को जानवर से और जानवर को इंसान से प्यार हो जाता है अपनी तो कुलपति महोदय से ही अपील है कि जब भी यूनिवर्सिटी में ‘कन्वोकेशन’ हो उस तेंदुए को बुलाकर बाकायदा उसे डिलिट की मानद उपाधि दी जाना चाहिए। जब अमेरिका बिल्ली को डि लिट की उपाधि दे सकता है तो हम भी तो छाती ठोक के कह सकते हैं कि तुमने तो बिल्ली को मानद उपाध दी, हमने तेंदुए को डि लिट की उपाधि दे दी।
सुपर हिट ऑफ द वीक
‘हमेशा अपने से बड़ी लडक़ी से शादी करना चाहिए’ श्रीमान जी अपने दोस्त को समझा रहे थे।
‘ऐसा क्यों’ दोस्त ने आश्चर्य से पूछा
‘वो इसलिए कि अगर कभी पत्नी से पिट भी जाओ तो तसल्ली रहेगी कि किसी बड़े ने पीटा है’ श्रीमान जी ने उसे समझाया।

Author: Jai Lok







