
बीएलओ के सामने दस्तावेज का सत्यापन बना चुनौती
जबलपुर (जयलोक)। जिले में चल रही विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) के कार्य को लेकर जिला प्रशासन ने पूरी ताकत लगा दी है। इस कार्य के लिए रात्रि दो बजे के बाद तक कार्यालयों को खोलकर रखा जा रहा है। कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह तथा नगर निगम आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार खुद देर रात तक इस काम की निगरानी कर रहे हैं। कलेक्टर शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाकर सतत निरीक्षण का काम कर रहे हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम भारतीय जनता पार्टी तथा कांगे्रस दोनों के लिए ही प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। दोनों दल के लोग चाहते हैं कि उनके समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में बरकरार रहें। दोनों ही दलों के दिग्गज नेताओं के साथ ही छोटे से छोटे कार्यकर्ता भी अपने अपने क्षेत्र में मतदाता सूची के काम में बीएलओ के साथ अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं।
वहीं दूसरी ओर प्रक्रिया की अंतिम तिथि 4 दिसंबर जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे जबलपुर जिले में इस अभियान की जमीनी हकीकत सामने आने लगी है। कागजों में सुचारू दिख रही यह प्रक्रिया फील्ड में कई व्यवहारिक समस्याओं से जूझ रही है। घर-घर जाकर मतदाता सत्यापन का काम करने वाले बूथ लेवल ऑफिसर से लेकर आम नागरिक तक इस प्रक्रिया को लेकर असमंजस और दबाव की स्थिति में नजर आ रहे हैं।
शहर के अधारताल, घमापुर, गोहलपुर, रांझी, पनागर, माढ़ोताल और बेलखेड़ा क्षेत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक बीएलओ पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। एक-एक बीएलओ को सैकड़ों घरों का सत्यापन करना है, जहां उन्हें फॉर्म भरने के साथ-साथ आधार, राशन कार्ड, बिजली बिल जैसे दस्तावेजों का मिलान भी करना पड़ रहा है। समय सीमा कम होने के कारण कई कर्मचारी देर रात तक फील्ड में काम करने को मजबूर हैं, जिससे काम की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

डिजिटल काम बना बड़ी बाधा
ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। पनागर, शहपुरा भिटौनी और कुंडम से जुड़े क्षेत्र में नेटवर्क की कमजोरी के चलते ऑनलाइन एंट्री और फोटो अपलोड का काम बार-बार बाधित हो रहा है। कई जगहों पर बीएलओ को पहले कागज पर रिकॉर्ड तैयार करना पड़ रहा है और फिर शहर लौटकर साइबर कैफे या कार्यालयों से डेटा अपलोड करना पड़ता है। इससे समय भी बर्बाद हो रहा है और गलतियां होने की संभावना भी बढ़ गई है।

दस्तावेजों को लेकर असमंजस
शहर की झुग्गी बस्तियों और पुराने मोहल्लों में रहने वाले कई लोगों के पास पूरे दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। कई परिवारों में नाम की स्पेलिंग, जन्मतिथि या पते को लेकर आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्रों में भिन्नता पाई गई है। इससे बीएलओ और नागरिकों के बीच बहस की स्थिति भी कई जगह देखने को मिली है। नागरिकों का कहना है कि उन्हें स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई कि कौन से दस्तावेज मान्य हैं और किस स्थिति में उनका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहेगा।

नाम कटने का डर और अफवाहों का असर
एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सबसे बड़ी चिंता मतदाताओं के मन में नाम कटने का डर है। कई वार्डों में लोगों को यह भ्रम है कि यदि किसी कारणवश सत्यापन के दौरान गलती हो गई तो उनका नाम स्थायी रूप से वोटर लिस्ट से हट सकता है। इसी डर के चलते कुछ लोग बीएलओ को जानकारी देने से भी कतराने लगे हैं। सोशल मीडिया और मोहल्लों में फैली अफवाहों ने इस डर को और हवा दी है।
राजनीतिक माहौल भी बना दबाव का कारण
राजनीतिक रूप से एसआईआर प्रक्रिया पर नजर रखी जा रही है। विभिन्न दलों के कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। कहीं-कहीं बीएलओ पर परोक्ष दबाव डालने और शिकायतें दर्ज कराने की घटनाएं भी सामने आई हैं। प्रशासनिक अधिकारियों को बार-बार समीक्षा बैठकें कर कर्मचारियों को दिशा-निर्देश देने पड़ रहे हैं, जिससे अभियान की गति प्रभावित हो रही है।
महिलाओं और गरीब तबके को हो रही ज्यादा दिक्कत
शहर की गरीब बस्तियों, घरेलू काम करने वाली महिलाओं और वृद्ध मतदाताओं के सामने सबसे ज्यादा समस्या आ रही है। कई विधवा महिलाओं के पास पहचान के पुराने दस्तावेज हैं, जिनमें पति का नाम या पता अब सही नहीं है। ऐसी स्थिति में बीएलओ स्वयं भी असमंजस में हैं कि किस आधार पर सत्यापन किया जाए।
समयसीमा सबसे बड़ी चुनौती
जबलपुर में भले ही प्रशासन रोजाना प्रगति की रिपोर्ट जारी कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई वार्डों में अभी भी बड़ी संख्या में घरों का सत्यापन बाकी है। अगर यह प्रक्रिया तय समयसीमा में पूरी नहीं हो पाती है तो बाद में आपत्तियों और सुधारों का बोझ और बढ़ सकता है।
स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त कर्मचारियों की जरूरत
शहर में लोगों की मांग है कि बीएलओ के साथ अतिरिक्त अस्थायी कर्मचारियों की तैनाती की जाए, ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की वैकल्पिक व्यवस्था हो, और हर वार्ड स्तर पर दस्तावेज सहायता शिविर लगाए जाएं। साथ ही लोगों को यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि सत्यापन का उद्देश्य नाम काटना नहीं, बल्कि सूची को सही और पारदर्शी बनाना है।
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Author: Jai Lok







