Download Our App

Home » जबलपुर » बैठक, निर्देश, जाँच, कार्यवाही ये शब्द ना होते तो क्या होता इनका…

बैठक, निर्देश, जाँच, कार्यवाही ये शब्द ना होते तो क्या होता इनका…

(जय लोक)। जिसने भी हिंदी की ‘डिक्शनरी’ बनाई होगी या हिंदी के शब्दों को ईजाद किया होगा उसको तमाम  सरकारें और अफसर कोटि-कोटि धन्यवाद दे रहे होंगे क्योंकि यदि बैठक, निर्देश, जांच, और कार्यवाही जैसे शब्द डिक्शनरी में ना होते तो ना सरकारें चल पाती और न अफसरशाही। ये चारों शब्द इतने महत्वपूर्ण हैं कि जब अफसरों की मसूरी में ट्रेनिंग होती है तो उन्हें ये शब्द रटाए जाते हैं बैठक और निर्देश। हर अफसर को ये बताया जाता है कि अगर आपको अफसर गिरी करना है तो आपके लिए ये दो शब्द बेहद महत्वपूर्ण हैं। रोज बैठक करो और निर्देश जारी करो इसके अलावा आपको कुछ नहीं करना है कोई पूछे तो बता देना कि बैठक कर ली है और निर्देश जारी कर दिए हैं भूल कर भी अपने निदेर्शों के बारे में कभी जानकारी भी मत लेना कि आपने कौन से निर्देश किस बैठक में जारी किए थे। सचमुच यदि किसी अफसर से यह पूछ लिया जाए कि हुजूर आपने कल की बैठक में कौन से विषय पर बात की थी और क्या निर्देश दिए थे तो कहो वो अफसर दौड़ लगा दे, क्योंकि सुबह से लेकर शाम तक बैठक और निर्देश इसके अलावा उनके पास और कोई काम नहीं होता बैठक में क्या हुआ, निदेर्शों का क्या हुआ, इससे उनका दूर-दूर तक लेना देना नहीं।

 

उनका काम है बैठक लेना और निर्देश जारी करना। उधर जिनके लिए निर्देश जारी होते हैं उनको भी मालूम है कि ये फॉर्मेलिटी है उन्हें यह बात अच्छी तरह से मालूम रहती है कि वे तो निर्देश देकर निकल लिए हैं कल दिए गए निर्देश भूल कर बड़ा अफसर आज फिर एक निर्देश दे देगा। यही हाल सरकारों का है कितनी भी बड़ी घटना हो जाए, सरकार में बैठे हर नेता से जब भी कोई पूछता है कि साहब जी ये क्या हुआ है और इसका क्या होगा तो उनके मुंह से तत्काल निकलता है ‘इस मामले की गहराई से जाँच की जाएगी और जो भी दोषी होगा उस पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाएगी’ जब भी नेता शपथ लेता है तब उसके कान में ये मंत्र फूंका जाता है कि जब भी कोई मीडिया वाला किसी घटना के बारे में कुछ भी पूछे तो बस एक ही जवाब दे देना ‘जाँच की जाएगी और कड़ी कार्यवाही की जाएगी’ आज तक कितने मामलों की जांच हुई और कितनों पर कार्यवाही हुई ये बहुत बड़ा रहस्य है जिसके सामने ‘ब्लैक होल’ का रहस्य भी छोटा पड़ जाता है। आम जनता भी ये बात अच्छे से समझ गई है कि अफसर और सरकारें सिर्फ  इन चार शब्दों के भरोसे चल रही है अगर ये चार शब्द ना होते तो फिर अफसरों का और सरकारों का क्या होता ये बहुत ही बड़ा सवाल है। अपने को तो लगता है कि डिक्शनरी बनाने वाले या हिंदी के शब्द बनाने वाला भी कभी ना कभी अफसर रहा होगा या फिर सरकार में किसी मंत्री पद पर रहा होगा इसलिए उसने इन शब्दों को खोज निकाला। अफसर और सरकार जी भर कर उस व्यक्ति का धन्यवाद अदा करती है जिसने इन शब्दों को जन्म दिया बैठक, निर्देश जाँच, और कार्यवाही बस इन्हीं चार शब्दों पर सरकारें चल रही है लेकिन जिस  दिन ये चार शब्द अपने पर आ जाएंगे उसे दिन सरकारों के हाथ पैर फूलना तय है।

 

गजब कर दिया कांग्रेस ने
निर्णय लेने में बेहद ढीली हर चीज को टालने में उस्ताद कांग्रेस ने इस बार तो गजब कर दिया । पहले ही घोषणा कर दी थी कि स्वतंत्रता दिवस पर 15 अगस्त को प्रदेश में कांग्रेस के जिला अध्यक्षों की घोषणा कर दी जाएगी। किसी को भरोसा नहीं था क्योंकि उन्हें कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के ढीलेपन का बहुत पुराना अनुभव था लेकिन पता नहीं कौन से पेड़ के नीचे बैठकर हाई कमान को ये बुद्ध ज्ञान हो गया और उसने सचमुच 15 अगस्त को 71 जिला अध्यक्षों और ग्रामीण अध्यक्षों की नियुक्ति की घोषणा कर दी। जिनके नाम आए वे खुद भी चौंक गए कि इतनी फुर्ती तो आज तक कभी पार्टी रही नहीं आज अचानक पार्टी को क्या हो गया। इधर घोषणा हुई उधर विरोध भी शुरू हो गया वैसे भी गुटबाजी तो कांग्रेस के लिए कोई बड़ी बात नहीं है आए दिन गुट बाजी के चलते विवाद की स्थिति बनती है और इसी चक्कर में पंद्रह महीने में मध्य प्रदेश से उनकी सरकार भी रुखसत हो गई, लेकिन अब पता लगा है कि इस बार कांग्रेस ने बहुत गंभीरता दिखाई है पर्यवेक्षक भेजे गए थे उन्होंने सबसे रायशुमारी करी और फिर अध्यक्षों की घोषणा कर दी। कांग्रेस का कहना है कि अब बहुत हो गया एक ही उद्देश्य है भाजपा को जड़ से उखाड़ फेंकना है राहुल गांधी नए-नए मुद्दे लेकर जनता के सामने आ रहे हैं अब देखना यह है कि कांग्रेस ने अपना ढीलापन त्याग कर फुर्ती दिखाई है उसका कितना असर होता है अ_ाइस का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए जीने और मरने की स्थिति है अगर इस बार भी चूक गए तो फिर आगे 5 साल तक हाथ की आई शून्य ही रहेगी।

 

मजनू की ऐसी बेइज्जती
जिन प्रेम कथाओं को हमने अक्सर सुना है उनमें लैला मजनू, शीरी फरहाद, रोमियो जूलियट का नाम सबसे आगे है। कहते हैं मजनू अपनी लैला के प्यार में इतना पागल हो गया था कि उसे लोग पत्थर मारते थे लेकिन वह उफ नहीं करता था लैला मजनू पर हरनामसिंह रवेल ने बड़ी मशहूर फिल्म ‘लैला मजनू’ बनाई थी जिसमें ऋषि कपूर और रंजीता ने लैला और मजनू की भूमिका निभाई थी। लैला के प्रेम के लिए अपना सब कुछ त्यागने वाले मजनू नाम की कद्र करना तो दूर रहा उसे ऐसे छेड़छाड़ करने वाले युवाओं से जोड़ दिया है जिससे मजनू की न केवल बेज्जती हो रही है बल्कि उसके अमर प्रेम का भी अपमान हो रहा है। हाल ही में डीजीपी साहब ने एक आदेश दिया है कि मजनुओं की खोज खबर ली जाए अरे भाई मजनू तो बेचारा तमाम कष्ट सहकर भी अपनी लैला की याद में अपना सब कुछ लुटाए बैठा था लेकिन ये सडक़ छाप छेडख़ानी करने वाले युवक होते हैं उन्हें कम से कम मजनू तो ना कहा जाए क्योंकि मजनू एक ऐसा व्यक्ति था जिसने अपनी मोहब्बत के लिए ना दिन देखा ना रात ना रेगिस्तान। बस वो तो दिन-रात लैला लैला करता रहता था। ऐसे महान आशिक की तुलना सडक़ छाप छेडख़ानी करने वालों से करना ये ठीक बात नहीं है डीजीपी साहब। आप ऐसे लोगों को और कोई नाम दे सकते हैं। मजनू भी ऊपर बैठा हुआ सोच रहा होगा कि मैंने तो कितना पवित्र प्यार किया था और लैला को कभी ना तो छेड़ा और ना ही कोई इशारे किए उसके बाद भी मेरे नाम पर इस तरह की बेइज्जती चस्पा की जा रही है। लैला भी सोचती होगी कि मेरे आशिक की ऐसी बेइज्जती पुलिस डिपार्टमेंट करेगा यह कभी उसने सपने में भी सोचा नहीं होगा।

12 कैदियों को मिली जेल से आजादी जबलपुर जिले के एक भी कैदी को नहीं मिली रिहाई

Jai Lok
Author: Jai Lok

RELATED LATEST NEWS

Home » जबलपुर » बैठक, निर्देश, जाँच, कार्यवाही ये शब्द ना होते तो क्या होता इनका…
best news portal development company in india

Top Headlines

Live Cricket