
बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन एक्टर्स में शुमार सौरभ शुक्ला के हम सभी मुरीद हैं। साल 1994 में ‘बैंडिट क्वीन’ से रुपहले पर्दे पर कदम रखने वाले सौरभ शुक्ला को 1998 में रिलीज ‘सत्या’ के बाद सबने प्यार से कल्लू मामा पुकारा। आज 3 दशक के करियर में वह ‘रेड’ के ताऊ जी और ‘जॉली एलएलबी’ के जज सुंदरलाल त्रिपाठी बनकर मजमा लूट लेते हैं। एक्टर होने के साथ-साथ पटकथा लेखक और फल्मि निर्देशक सौरभ शुक्ला आज 63 साल के हैं। हिंदी के साथ ही तमिल और तेलुगू फिल्मों में भी काम कर चुके हैं। बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीत चुके हैं। थएिटर की दुनिया से फिल्मों में आए सौरभ शुक्ला की एक पहचान ये भी है कि वह जोगमाया शुक्ला की संतान हैं, जो देश की पहली महिला तबला वादक थीं। उनके पिता शत्रुघ्न शुक्ला, आगरा घराने के मशहूर गायक थे। चाहे पर्दा बड़ा हो या छोटा, सौरभ शुक्ला ने एक से बढक़र यादगार भूमिकाएं की हैं। वह ह्रञ्जञ्ज पर भी खूब ख्याति बटोर रहे हैं। इन दिनों वह बतौर राइटर-डायरेक्टर अपनी फिल्म ‘जब खुली किताब’ को लेकर सुर्खयिों में हैं। सौरभ शुक्ला ने अपने अब तक के सफर, शादी, दोस्ती, जैसे विषयों जानकारी साझा की।
सौरभ शुक्ल को उनकी हालिया ओटीटी रिलीज फिल्म ‘सूबेदार’ में भी खूब पसंद किया जा रहा है। इसमें वह अनिल कपूर के दोस्त बने हैं। इंडस्ट्री में यारों के यार कहे जाने वाले सौरभ की मनोज बाजेपयी से तगड़ी दोस्ती है। वह खुलासा करते हैं कि मनोज सिर्फ उनके दोस्त भर नहीं हैं। वह उनके जीवन का बड़ा हिस्सा हैं। यहां तक कि उनकी शादी में मनोज बाजपेयी का बड़ा योगदान रहा है। मनोज बाजपेयी ने भी एक इंटरव्यू में कहा था कि संघर्ष के दिनों में सौरभ शुक्ला ने कई बार उनके लिए खाने का जुगाड़ किया था।

दोस्त के लाए खाने पर सभी का हक होता था
मनोज संग अपनी यारी को लेकर सौरभ शुक्ला कहते हैं, मेरे जीवन में मनोज का बहुत बड़ा योगदान है। मेरी पर्सनल लाइफ में मनोज ने बहुत अहम भूमिका निभाई है। जब मेरी शादी हुई थी, तब मनोज ही थे, जिन्होंने मेरी पत्नी (बर्नाली रे) से कहा था कि इससे अच्छा लडक़ा तुमको मिल नहीं सकता। वो समझदार है, कमिटेड है और साथ में गाना भी गा लेता है। मनोज तो मेरा यार है। जहां तक स्ट्रगल डेज की बात है, तो संघर्ष काफी था, मगर वो दिन मस्ती भरे थे। उस दौर में हम सभी ने एक-दूसरे का साथ दिया। मैं, मनोज, तिग्मांशु धूलिया, विजय कृष्ण आचार्य जैसे जितने भी दोस्त थे, हम साथ रहा करते थे। उस वक्त एक मेंडेट-सा था कि चाहे खाना-पीना (शराब) कोई भी लाए, वो सभी का होता था, किसी एक का नहीं। हम सभी मिलजुल कर खाया-पिया करते थे। हम सभी के सपने थे, मगर उन सपनों को पूरा करने के साथ-साथ हम फाकामस्ती भी खूब किया करते थे।

कल्लू मामा के रोल के बाद अच्छे रोल नहीं मिल रहे थे
सौरभ शुक्ला ने थिएटर और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की रेपेट्री कंपनी में अभिनेता के रूप में अपनी शुरुआत की। लेकिन उनके करियर का टर्निंग पॉइंट था फिल्म ‘सत्या’ में कल्लू मामा का रोल। हालांकि, उस सुपरहिट भूमिका के बावजूद सौरभ का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। वह कहते हैं, कल्लू मामा की भूमिका के बाद मुझे लगा था कि एक से बढक़र एक रोल्स के ऑफर आएंगे, काम की किल्लत तो नहीं हुई, मगर हां उस तरह के रोल्स की किल्लत जरूर हुई, जो मैं करना चाहता था। मुझे काफी छोटे-छोटे किरदार ऑफर हो रहे थे, जिनका कोई अर्थ नहीं था।

मैंने कहना शुरू कर दिया कि एक्टर नहीं, राइटर हूँ
यूपी के गोरखपुर में पैदा हुए सौरभ शुक्ला कहते हैं, उन दिनों लोग अक्सर ये कहते कि तुम अच्छे एक्टर हो, मगर तुम्हें कैमियो भूमिकाएं ही क्यों मिलती हैं एक दौर ऐसा भी आया, जब मैंने कहना शुरू किया कि मैं एक्टर नहीं हूं, राइटर हूं। असल में वो खुद को बचाने का एक तरीका था। लंबे समय तक मैंने राइटिंग भी की। मगर फिर वो दौर भी खत्म हुआ और अनुराग बसु की ‘बर्फी’ मिली, फिर तो एक्टर के रूप में मेरी गाड़ी फिर से चल निकली।
प्रोटोकॉल तोडक़र राष्ट्रपति से हाथ मिलाया
ये भी कम दिलचस्प बात नहीं है कि एक समय मनचाही भूमिकाओं के लिए तरसने वाले सौरभ, आगे चलकर 2013 में ‘जॉली एलएलबी’ में जज सुंदरलाल त्रिपाठी के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर चुने गए। वह बताते हैं, बहुत ही अद्भुत अनुभव था। सभी जानते हैं कि राष्ट्रीय पुरस्कार आपको राष्ट्रपति के हाथों मिलता है। मैं आपको एक दिलचस्प बात बताऊं, मैंने तो अवॉर्ड लेते समय प्रोटोकॉल भी तोड़ दिया था। प्रोटोकॉल होता है कि आप राष्ट्रपति से हाथ नहीं मिला सकते, उन्हें छू नहीं सकते, मुझे पता पता था कि मुझे उनको नमस्ते करनी है। उस वक्त तत्कालीन राष्ट्रपति थे प्रणब मुखर्जी। मैं जब अवॉर्ड लेने मंच पर गया, तो वे मुझे देखकर मुस्कुराए और बोले, आपकी वजह से मैंने ये फिल्म दो बार देखी है। उनकी ये बात सुनकर मेरी हिम्मत बढ़ गई। मैंने तपाक से कहा, अगर ऐसा है, तो इसी बात पर हाथ मिलाइए। उन्होंने भी हाथ मिला लिया और इस तरह प्रोटोकॉल तोडक़र मैंने राष्ट्रपति से हाथ मिलाया।
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Author: Jai Lok






