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मैया मोरी, मैंने ही माखन चुरायो

ओम प्रकाश श्रीवास्तव
आईएएस अधिकारी तथा
धर्म और अध्यात्म के साधक
परिवार में सबसे ज्यादा प्रेम छोटे बच्चों से किया जाता है। बच्चे होते भी हैं ब्रह्म के समान निर्दोष, पवित्र और निष्कलंक। इसलिए श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में लोकमानस ने सर्वाधिक रुचि ली। सूरदासजी के कवित्तों ने वात्सल्य भक्ति में चार चाँद लगा दिये। कृष्ण- की बाल-लीलाओं में वह सब है जो सामान्य बच्चे करते हैं – नटखटपन, रूठना, जिद करना, तोडफ़ोड़ करना, चुपके से कोई चीज उठा लेना आदि। पर श्रीकृष्ण सामान्य बालक नहीं हैं। उनका जन्म व कर्म दिव्य है।
धर्म की संस्थापना, सज्जनों का रक्षण और दुष्टों का संहार करने के लिए भगवान् अवतार लेते हैं। मछली, कछुए, वाराह जैसे प्राणियों, नृसिंह जैसे आधे नर आधे पशु के अवतारों के बाद आते हैं वामन, परशुराम, राम और कृष्ण ।

सभी अवतार क्रमश: पूर्णता की ओर बढ़ते हैं और श्रीकृष्ण पूर्ण अवतार के रूप में माने जाते हैं। पूर्ण अवतार याने जिसमें भगवत्तौ के सारे दिव्यृगुण (प्रेम, ज्ञान और शक्ति) तथा व्यमवहारिक जीवन से संबंधित सभी 18 कलाएँ पूर्णता के साथ प्रकट हुईं। एक अवतार के भी अनेक रूप होते हैं।

श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम हैं इसलिए वह पुत्र, भाई, पति, मित्र, राजा, शत्रु आदि सभी रूपों में आदर्श प्रस्तुत करते हैं। श्रीकृष्ण लीलापुरुषोत्तम हैं इसलिए वे जीवन की हर अवस्था में लीलाएँ प्रस्तुतत करते हैं। वह नटखट बालक हैं, ग्वाले हैं, प्रेमी हैं, संगीतज्ञ हैं, योद्धा हैं, कूटनीतिज्ञ हैं, राजनीतिज्ञ हैं और अंत में गीता का ज्ञान देने वाले अपने स्वरूप में स्थित स्वयं परमात्मा हैं।
सनातन धर्म के अनुसार हर मनुष्य अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के अनुसार स्वभाव लेकर जन्म लेता है। इस प्रकार हर मनुष्य का स्व भाव, रुचि अलग-अलग होते हैं।

भगवान् सभी के हैं और वे सभी मनुष्यों के उद्धार के लिए अनुकूल परिस्थितयाँ उपलब्ध कराते हैं इसलिए भगवान् विविध रूपों में प्रकट होते हैं । भक्त भी उन्हें अपनी भावना के अनुसार देखते व स्वीकारते हैं- जिन्हन कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति? तिन्ह देखी तैसी।। विभिन्न अवतारों और उनकी लीलाओं का रहस्य भी इसी पृष्ठोभूमि में समझा जा सकता है। भक्त अपने स्वभाव तथा रुचियों के आधार पर किसी भी रूप में भगवान् की भक्ति कर सकता है। भक्ति के कई रूप हैं -दास्य भक्ति (हनुमानजी की श्रीराम के प्रति), वात्सल्य भक्ति (यशोदा की कन्हैया के प्रति), संख्य भक्ति (अर्जुन की श्रीकृष्ण के प्रति), माधुर्य भक्ति (राधा और गोपियों की श्रीकृष्ण के प्रति) आदि। मीरा ने तो श्रीकृष्ण को पति रूप में माना – मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।

अब जिस भक्त की जैसी रुचि होगी वह वैसे देवता या उस देवता के वैसे स्वरूप की भक्ति करेगा। परिवार में सबसे ज्यादा प्रेम छोटे बच्चों से किया जाता है। बच्चेे होते भी हैं ब्रह्म के समान निर्दोष, पवित्र और निष्कलंक। इसलिए श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में लोकमानस ने सर्वाधिक रुचि ली। सूरदासजी के कवित्तों ने वात्सल्य भक्ति में चार चाँद लगा दिये। कृष्णा की बाल-लीलाओं में वह सब है जो सामान्यत बच्चे करते हैं – नटखटपन, रूठना, जिद करना, तोडफ़ोड़ करना, चुपके से कोई चीज उठा लेना आदि। पर श्रीकृष्ण सामान्य बालक नहीं हैं। उनका जन्म व कर्म दिव्य है (गीता 4.9)। उनके जन्मे लेते ही जेल के ताले खुल जाना, शिशु अवस्था में ही पूतना, शकटासुर, तृणवर्त जैसे राक्षसों का वध, यशोदा को मुँह में विश्व दर्शन करा देना, कालियानाग का दमन आदि दिव्यटता के सूचक है। श्रीकृष्ण की इन लीलाओं का विवरण श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णुमपुराण, गर्गसंहिता, स्क्न्द पुराण आदि में मिलता है।
अन्य मजहब, रिलीजन में उनका ईश्वर सृष्टि का निर्माण उसी प्रकार करता है जैसे कुम्हार घड़ा बनाता है। वहाँ ईश्व,र अलग है, निर्मित सृष्टि अलग है। सारे शुभ कार्य ईश्वर के हिस्से में हैं और अशुभ कार्य शैतान के। परंतु सनातन धर्म का ब्रह्म स्वयं ही जगत के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसलिए जगत् की जितनी भी रचनाएँ हैं, रूप हैं उन सब में वह है। वह सत् भी है और असत् भी (गीता 9.9)। वह जगत का पिता है (गीता 14.4), जगत को धारण करता है (गीता 9.17) तो विनाश करने वाली मृत्य भी (गीता 10.34)। वह धर्मसम्मत काम हैं (गीता 7.11) तो छल करने वालों में जुआ है भी (10.36)। कहने का तात्पर्य यह कि अच्छा-बुरा, शुभ-अशुभ, सत्-असत् सभी कुछ ईश्वर ही है। श्रीमद्भागवत श्रीकृष्ण् के जीवन और लीलाओं का मुख्य ग्रंथ है। इसमें यशोदा को पड़ोसनें उलाहना देती हैं – ‘अरी यशोदा ! तेरा कान्हा बड़ा नटखट हो गया है। यह चोरी के बड़े-बड़े उपाय करके हमारे दही-दूध चुराकर खा जाता है। केवल खाता तो भी एक बात थी यह तो सारा दही-दूध वानरों को बाँट देता है (10.8.29)’। ऐसा करके भी ढिठाई की बातें करता है – ‘उलटे हमें ही चोर बनाता है (10.8.31)’।

यशोदा एक बार कान्हा को छोडक़र घरेलू काम में चली जाती हैं। लौटने पर देखती हैं कि – ‘श्रीकृष्ण एक उलटे ऊखल पर खड़े और छींके पर का माखन लेकर खूब लुटा रहे हैं। उन्हें यह भी डर है कि कहीं मेरी चोरी न खुल जाए इसलिए चौकन्ने होकर चारों ओर ताकते जाते हैं (10.9.8)’। श्रीगर्गसंहिता में भी माखनचोरी और नटखटपने का वर्णन है – ‘श्रीहरि अपनी बाललीला से गोप-गोपियों को आनन्द प्रदान करते हुए सखाओं के साथ घरों में जा-जाकर माखन और घृत की चोरी करने लगे (श्रीगर्गसंहिता,गोलोकखंड 17.17-18)’। श्रीकृष्ण सहस्रनामावली में चितचोरं, गोपीभावचोरं, प्रेमचोरं, पापचोरं, चोराग्रगण्यो गोपालं और दधिस्तेरयकृत (दही की चोरी करनेवाले) जैसे नाम दिये गये हैं। 17 वीं सदी के बंगाल के प्रसिद्ध भक्त कवि विल्बंमंगल ठाकुर स्तुति करते हैं-व्रजे प्रसिद्धं नवनीत चौरं, गोपांगनानां च दुकूलचौरं । अनेक जन्मा र्जित पाप चौरं, चौराग्रगण्यंौ पुरुषं नमामि।। ‘ब्रज में प्रसिद्ध माखनचोर, गोपियों के वस्त्रों के चोर, अनेक जन्मों के पापों को चुरानेवाले, चोरों में प्रथम पुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ’। यहाँ श्रीकृष्ण को चोर कहना उनका अपमान नहीं है। इन बाल-लीलाओं को निकाल देंगे तो कृष्णि भक्ति में कौन सा रस बचेगा? श्रीकृष्ण 11 वर्ष की अवस्थाण में व्रज छोडक़र मथुरा चले गये थे। अत: यह लीलाएँ उनकी शिशु अवस्था की हैं। शिशु तो निष्छलता से कुछ भी उठा लेते हैं। उनमें चोरी का भाव नहीं होता परंतु हम प्रेम से उन्हें चोर कह देते हैं। कोई बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए माँ को नोचता है, काटता है, छोटे-छोटे हाथों से मारता है, चीजों को छीनता है तो उसे प्रेम से डाकू कह देते हैं। इनका भाव बच्चे को चोर या डाकू सिद्ध करना नहीं है। कुछ लोग शुष्क् तर्क देते हैं कि कंस के पास दही-दूध को जाने से रोकने के लिए चोरी और मटकी फोड़ का नाटक किया गया।

किसी भी प्रमाणिक ग्रंथ में ऐसा नहीं कहा है। यह ऐसा भौतिकवादी तर्क है जो अवतार की महत्ता व दिव्यता को भुलाकर उसे एक वामपंथी क्रांतिकारी सिद्ध करना चाहते हैं। बच्चे शैतानी करते हैं और बचने के लिए झूठ भी बोलते हैं तो वे झूठे थोड़े ही हो जाते हैं। सूरदास तो बालरूप के भक्त हैं। उनके कन्है या तो झूठ बोलते हैं – मैया मैं नहिं माखन खायो। और जब माँ मुँह खुलवाती हैं तो उसमें विश्वैरूप के दर्शन हो जाते हैं। अहा! बाललीला और दिव्यता का क्या अद्भुत संयोग है यह। वे मचलते हैं -मैया, मैं तो चंद्र खिलौना लैहों। सूरदास का पद है जिसमें गोपियाँ कहती हैं – उर में माखनचोर गड़े। अब कैसे हू निकसत नहिं ऊधो। तिरछे ह्वै जु अड़े। उनका माखनचोर रूप ही सबसे मोहक है। यह माखन चोर तो ग्रंथों से निकलकर लोकमानस में रम चुका है। कृष्णम गोपियों के साथ रास रचाते हैं। रसखान एक ओर तो श्रीकृष्ण की दिव्यता का गान करते हैं – सेस गनेस महेस दिनेस सरेसहु जाहि निरंतर गावै। जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बतावें। वहीं दूसरी ओर उनकी लीला का गायन करते हैं – ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पर नाच नचावैं।

गोपियों की भक्ति की उच्चकता और पवित्रता को समझने के लिए श्रीमद्भागवत् के गोपीगीत को पढऩा चाहिए। भक्ति का तत्व् समझना है तो नारद भक्तिसूत्र का अध्य्यन करें। यदि हमें माखनचोर से आपत्ति है तो फिर इसी तर्क पर रास का प्रसंग भी बदलना पड़ेगा। अपने तर्कों के आधार पर तो हमें रुक्मिणी का हरण, भारतीय न्याीय संहिता का अपराध लगेगा। कंस के भय से ब्रज में छिपने की बात भी स्वीकार्य नहीं होगी। उन्हें रणछोड़दास भी नहीं कह सकेंगे। भला हमारा भगवान् रणछोड़ कैसे हो सकता है ? फिर हमें सूरदास, रसखान, मीराबाई आदि सभी को खारिज करना पड़ेगा। श्रीमद्भागवतपुराण, श्रीगर्गसंहिता, स्कंनदपुराण आदि में संशोधन करना पड़ेगा। क्योंकि यह सब हमारी ओछी बुद्धि द्वारा मानी हुई मर्यादा के खाँचे में फिट नहीं बैठते। श्रीकृष्ण के जीवन का सर्वोत्ताम भाष्यं तो गीता है परंतु वह उच्ची आध्यात्मिक ग्रंथ होने के कारण उसे समझना आम जनता के लिए थोड़ा मुश्किल होता है। इसलिए भक्ती सरल मार्ग अपनाते हैं और श्रीकृष्णा की बाल-लीलाओं के माध्यम से उनके दिव्यत्व की अनुभूति तक पहुँचते हैं। किसी अवतार की दिव्य् लीलाओं को समझने के लिए केवल बुद्धि और तर्क पर्याप्त नहीं हैं, हृदय और भगवद्मयी चेतना की भी आवश्यकता होती है। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि जब विदुर ने उद्धवजी से श्रीकृष्ण के बारे में पूछा तो – ‘वह उनकी लीलाओं का स्मरण कर तीव्र भक्तियोग में डूबकर आनन्दंमग्न हो गये। शरीर रोमांचित हो गया। नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। वे दो घड़ी तक कुछ भी न कह सके (3.2.4-5)’। उद्धव ने जब गोपियों को ज्ञान देना चाहा तो जबाव मिला – ऊधो मन न भये दस-बीस। एक हतो सो गयो श्याबम संग को आराधे ईश। ऐसी दशा होगी, ऐसा समर्पण होगा तब लीलाएँ समझ में आती हैं। भक्त अपने भगवान् को उस स्वरूप में उपासते हैं जो उन्हें सर्वाधिक प्रिय होता है। इसलिए श्रीकृष्ण् का नटखट ‘माखनचोर’ बालरूप लोक को ज्यादा अपना-सा लगता है और यह लोकआस्था बदली नहीं जा सकती।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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