
ओम प्रकाश श्रीवास्तव
आईएएस अधिकारी तथा
धर्म और अध्यात्म के साधक

इन्द्रियाँ केवल बाहरी चीजों का अनुभव करती हैं तथा बताती हैं कि उसका शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध कैसी है जो हम स्वयं हैं वह इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता। जिसका इन्द्रियों से ज्ञान होता है उसी का चिन्तन होता है। जिसे न देखा हो, न सुना हो उसका चिन्तन कैसे हो सकता है
अगले श्लोक में भगवान् आत्मा की तीन और विशेषताएँ बताते हुए शोक न करने का उपदेश देते हैं – ‘’यह अव्यक्त है, यह अचिन्त्य है, इसे अविकारी कहते हैं। अत: ऐसा जानकर तुझे शोक नहीं करना चाहिए (गीता 2.25)। यहाँ ‘अव्यक्त’ का अर्थ है जो व्यक्त (प्रकट) न हो। जिसे हम पाँच ज्ञानेन्द्रियों से जान पाते हैं वही हमारे लिए व्यक्त होता है। आत्मा सुनने, स्पर्श करने, देखने, चखने व सूँघने में नहीं आता अत: आत्मा इन्द्रियों की जानने की क्षमता से परे (इन्द्रियातीत) है अत: अव्यक्त है। जैसे बीज में वृक्ष समाया है परंतु बीज को काटें तो वह वृक्ष दिखाई नहीं देगा। इसे हम कहेंगे कि बीज में वृक्ष अव्यक्त है। इन्द्रियों से उसी का ज्ञान हो सकता है जो हमसे अलग हो। देखने के लिए तीन चीजें होना चाहिए – दृष्टा (जो देखता है), देखने की शक्ति तथा दृश्य (जिसे देखा जाता है)। यह आत्मतत्त्व सभी अभिव्यक्तियों का अधिष्ठान है। अत: शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ इसी पर आधारित हैं वे उसको कैसे जान सकती हैं इन्द्रियाँ केवल बाहरी चीजों का अनुभव करती हैं तथा बताती हैं कि उसका शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध कैसी है जो हम स्वयं हैं वह इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता।
जिसका इन्द्रियों से ज्ञान होता है उसी का चिन्तन होता है। जिसे न देखा हो, न सुना हो उसका चिन्तन कैसे हो सकता है न तो उसे वाणी से व्यक्त किया जा सकता है और न ही उसका विचार किया जा सकता है। आत्मा भी ऐसी ही है इसलिए उसे ‘अचिन्त्य’ कहा गया है। जगत् सीमाबद्ध है व उसमें विभिन्न अवयव हैं। अवयव एक दूसरे में बदलते हैं इसलिए जगत् प्रत्येक क्षण परिवर्तित हो रहा है। यही विकार कहलाता है। प्रकृति निरंतर क्रियाशील है और बदलती रहती है अत: उसे विकारी कहते हैं। विकार प्रकृति का गुण है आत्मा का नहीं। आत्म तत्त्व एकरस है उसमें कोई अवयव नहीं है इसलिए उसके परिवर्तित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए उसे ‘अविकारी’ कहा गया है। मोह से उत्पन्न शोक व पाप के भय के स्थाई इलाज हेतु एकमात्र रामबाण दवा है – आत्मज्ञान। इसलिए अभी तक भगवान् बता रहे थे कि जिन परिवर्तनों का शरीर या देह पर प्रभाव पड़ता है वे आत्मा को स्पर्श भी नहीं कर सकते। अर्जुन का शोक शरीर को लेकर है जो नाशवान् हैं। मूल तत्त्व तो आत्मा है जिसकी ओर भगवान् संकेत कर रहे हैं। यहाँ यह ध्यान रखना है कि जगत् के पीछे के चैतन्य तत्त्व को आत्मा की संज्ञा दी गई है । वास्तव में आत्मा कोई वैसी वस्तु नहीं है जैसी हम जगत् में इन्द्रियों से अनुभव करते हैं। इसलिए तरीका यह है कि हम आत्मा के ज्ञान का पठन, श्रवण करें, तर्क द्वारा अपनी बुद्धि में दृढ़ करें। चिन्तन करें कि मैं आत्मतत्त्व हूँ जो देह में स्थित हूँ परंतु देह से पृथक् हूँ। यह बोध जितना दृढ़ होगा हम देह और मन की पकड़ से उतने ही मुक्त होते जाएँगे। बदलते संसार के बीच हमें अपनी नित्यता की अनुभूति करना है। प्रत्येक व्यक्ति प्रारंभ में बालक था, फिर युवा हुआ, फिर बृद्ध हुआ- इस पर विचार करें तो पाएँगे कि तीनों अवस्थाओं में ‘मैं’ था। मैं ही बालक था, ‘मैं’ ही युवा था और ‘मैं’ ही बृद्ध हूँ। यह ‘मैं’ नहीं बदलता, यह नित्य है। आँखों के सामने कई रूप आते-जाते रहते हैं पर आँखें तो वही रहती हैं। कई बार आखों से भी दिखना बंद हो जाता है पर उनके पीछे का मन तो वही रहता है। मन में भी विकार आते हैं पर उस मन को प्रकाशित करनेवाला आत्मचैतन्य तो वही रहता है। यही आत्मचैतन्य हम हैं जो कभी नहीं बदलता।आत्मतत्त्व की प्रतीति कठिन नहीं है क्योंकि यह तो हमारा स्वरूप है केवल हमें इसका ज्ञान नहीं है। परंतु सामान्य संसारी मनुष्यों के लिए इसकी प्रतीति होना कठिन लगता है क्योंकि उनके अंतर में संसार की वासना के कारण चित्त मैला है, संसार के द्वंद्वों से विचलित है। पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब अपने सही स्वरूप में तभी बनेगा जब पानी साफ और स्थिर होगा। चित्त के स्वच्छ और शांत न होने के कारण कुछ मनुष्य ऐसे भी हैं जो देहात्मवादी हैं। वे शरीर और संसार में इतने में उलझे हैं कि उनसे परे जाकर कुछ सोच ही नहीं सकते। उन्हें जो इन्द्रियों से अनुभव होता है उसे ही वे सत्य मानते हैं। चार्वाक और लोकायत जैसे भौतिकवादी दर्शन शरीर से भिन्न कोई आत्मा नहीं मानते। ऐसे व्यक्ति अपनी इन्द्रियों की अनुभूति को ही प्रमाण मानते हैं । इन्द्रियों का यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि संसार में वस्तुएँ निरंतर उत्पन्न हो रही हैं और विनष्ट हो रही हैं। वे इस इन्द्रियजन्य अनुभव को ही सत्य मानते हैं परंतु इसके पीछे के परम सत्य ‘आत्मा’ के अस्तित्त्व को नकारते हैं। उनकी मान्यता है कि आत्मा है ही नहीं, देह और उसमें स्थित चेतना भौतिक परिस्थितियों का परिणाम है और यह चेतना देह के साथ ही जन्मती व मरती है । इसीलिए जिस किसी प्रकार संभव हो वे संसार में भोग विलास करना चाहते हैं। इसी दर्शन के आचार्य चार्वाक ने कहा है कि उधार लेकर घी पिओ क्योंकि देह के भस्म हो जाने के बाद पुनर्जन्म कहाँ है गीता तो सभी मनुष्यों के उद्धार के लिए है, वह माया में भटक रहे ऐसे व्यक्तियों को कैसे छोड़ सकती है। अर्जुन के मन में मोह था और वह भी देह के संबंधों की भाषा बोल रहा था, इसलिए गीता के प्रारंभ में भगवान् ने अर्जुन को फटकारा था, उसे नपुंसक तक कह दिया था, फिर आत्मा का ज्ञान दिया और अब भगवान् तर्क की दिशा बदलते हुए और ऐसे व्यक्तियों द्वारा दिये जाने वाले लौकिक तर्कों को लेकर बात करते हैं। वह कहते हैं – ‘हे महाबाहो ! अथवा यदि तू इसे नित्य जन्मने वाला और नित्य मरने वाला मानता है तो भी, तुझे इसका शोक नहीं करना चाहिए (गीता 2.26)’। सत्य तो यही है कि आत्मा न जन्म लेता है न मरता है फिर भी कुछ समय के लिए मान लें कि देह के साथ ही यह जन्मता मरता है तब तो यह उसका सहज और अनिवार्य धर्म हो गया। इसे टाला नहीं जा सकता। फिर अनिवार्य के लिए शोक कैसा भगवान् का उद्देश्य अर्जुन का दु:ख दूर करना था जो उसे अपने स्वजनों की मृत्यु की आशंका से हो रहा था। इसलिए वे इस लौकिक तर्क को लेकर उसे उसी के दाव से खत्म कर रहे हैं। अत: भगवान् का भाव यह है कि आत्मा को नित्य मानो (जैसा कि भगवान् अभी तक समझा रहे थे और जो सिद्धांत रूप से सत्य भी है) या अनित्य मानो (जैसा देहात्मवादी, भौतिकवादी नास्तिकों का विचार है ) दोनों ही स्थितियों में मृत्यु शोक का कारण नहीं है। (क्रमश:)

Author: Jai Lok







