
आज विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर विशेष
डॉ. शैलेश शुक्ला
बाल श्रम एक ऐसी वैश्विक समस्या है जो बच्चों के शैक्षणिक, मानसिक, सामाजिक और नैतिक विकास को बाधित करती है। आज भी दुनिया के कई हिस्सों में लाखों बच्चे विद्यालयों के बजाय कारखानों, होटलों, खेतों, खदानों और घरों में श्रम कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ढ्ढरुह्र) के अनुसार, वर्ष 2020 तक विश्व में लगभग 16 करोड़ बच्चे बाल श्रम में संलग्न थे, जिनमें से 50त्न से अधिक खतरनाक परिस्थितियों में कार्यरत थे। भारत सहित कई विकासशील देशों में गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता और बाल संरक्षण कानूनों की अनुपालनहीनता इसके मूल कारण हैं। ऐसे में, विश्व बाल श्रम निषेध दिवस प्रतिवर्ष 12 जून को मनाया जाता है, ताकि इस गंभीर समस्या के प्रति वैश्विक जागरूकता फैलाई जा सके और समाज को यह याद दिलाया जा सके कि हर बच्चा एक खुला आसमान चाहता है, न कि बोझ से झुकी पीठ।विश्व बाल श्रम निषेध दिवस की शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ढ्ढरुह्र) ने वर्ष 2002 में की थी। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य समाज, सरकार, नीति-निर्माताओं, शिक्षकों, माता-पिता और श्रमिक संगठनों के बीच बाल श्रम के विरुद्ध चेतना जागृत करना और ऐसे नीतिगत प्रयासों को बढ़ावा देना है जो बालकों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित बचपन प्रदान कर सकें। हर वर्ष इस दिवस की एक थीम होती है, जो उस समय के सामाजिक संदर्भ में बाल श्रम की विशेष समस्या को रेखांकित करती है। उदाहरणत: 2021 की थीम थी — ्रष्ह्ल ठ्ठश2 : श्वठ्ठस्र ष्द्धद्बद्यस्र द्यड्डड्ढशह्वह्म्! यानी अब कार्य करें : बाल श्रम समाप्त करें! यह दिन केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न संगठनों द्वारा कार्यशालाएं, बाल अधिकार रैलियां, नुक्कड़ नाटक और सोशल मीडिया अभियानों का आयोजन भी किया जाता है। इसका उद्देश्य है समाज के हर वर्ग को यह याद दिलाना कि एक बच्चा किताबों और खिलौनों का हकदार है, न कि औजारों और बोझों का।
बाल श्रम की समस्या को केवल आर्थिक कठिनाई से जोडऩा पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और सांस्कृतिक पक्षों को भी समझना आवश्यक है। सबसे बड़ा कारण निर्धनता है, जहाँ माता-पिता बच्चों को परिवार की आय में मददगार मानते हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बालक खेतों में, ईंट भट्टों में या घरेलू उद्योगों में झोंक दिए जाते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण कारण शिक्षा का अभाव है, जहाँ अभिभावक न तो स्कूलों के महत्व को समझते हैं और न ही विद्यालयों की पहुंच पर्याप्त होती है। इसके अलावा कई क्षेत्रों में सांस्कृतिक रूप से भी बच्चों से श्रम कराना सामान्य मान लिया गया है — जैसे पारिवारिक व्यवसायों में बालकों को जल्दी से जल्दी प्रशिक्षित करना। कुछ क्षेत्रों में बालिकाओं से घरेलू काम कराना, बाल विवाह करवाना और स्कूल से दूर रखना एक परंपरा मानी जाती है। बाल श्रम को बढ़ावा देने वाला एक और कारण है कमजोर कानून और उनका ढुलमुल अनुपालन। जब तक सरकारें, समाज और स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर इन बहुआयामी कारणों का समाधान नहीं करेंगी, बाल श्रम की समाप्ति एक चुनौती बनी रहेगी।
बाल श्रम बच्चों के भविष्य पर घातक प्रभाव डालता है। ऐसे बच्चे विद्यालयों से वंचित रह जाते हैं और उनके जीवन से सीखने, सोचने और खेलने के अवसर छिन जाते हैं। मानसिक विकास बाधित होता है और आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है। बालकों के शारीरिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है — खतरनाक उद्योगों में लंबे समय तक काम करने से उन्हें फेफड़े, त्वचा, हड्डियों और आंखों से संबंधित बीमारियां घेर लेती हैं। मानसिक और भावनात्मक उत्पीडऩ के कारण कई बच्चे अवसाद, भय और आत्मग्लानि का शिकार हो जाते हैं। बाल श्रम अक्सर बाल तस्करी, बाल वेश्यावृत्ति और बाल अपराधों की ओर भी ले जाता है, जिससे सामाजिक अपराध की जड़ें और गहरी होती हैं। इसके अतिरिक्त, जब कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता और श्रम में लग जाता है, तो वह आने वाले वर्षों में एक अशिक्षित और कम-कुशल श्रमिक बनता है, जिससे देश की उत्पादकता और मानव संसाधन का स्तर भी प्रभावित होता है।
भारत में बाल श्रम की समस्या काफी पुरानी और गहन है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 5 से 14 वर्ष के लगभग 1 करोड़ बच्चे बाल श्रम में संलग्न थे, जिनमें अधिकांश कृषि, निर्माण, वस्त्र उद्योग, घरेलू कार्य और होटलों में कार्यरत थे। कोविड-19 महामारी के बाद यह स्थिति और भी गंभीर हो गई है। कई राज्यों में स्कूली बच्चों की संख्या घटी है और बाल श्रमिकों की संख्या में वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य इस समस्या से अधिक प्रभावित हैं। हालांकि भारत सरकार ने बाल श्रम निषेध अधिनियम 1986 और 2016 में इसके संशोधित संस्करण के माध्यम से 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से किसी भी प्रकार के श्रम को अपराध घोषित किया है, फिर भी जमीनी स्तर पर इसका पूर्ण पालन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। कानूनों के साथ-साथ सामाजिक मानसिकता में बदलाव और सतत निगरानी आवश्यक है।
बाल श्रम की समाप्ति हेतु कई अंतरराष्ट्रीय संगठन सक्रिय हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ढ्ढरुह्र) ने रूद्बठ्ठद्बद्वह्वद्व ्रद्दद्ग ष्टशठ्ठ1द्गठ्ठह्लद्बशठ्ठ (ष्ट138) और ङ्खशह्म्ह्यह्ल स्नशह्म्द्वह्य शद्घ ष्टद्धद्बद्यस्र रुड्डड्ढशह्वह्म् ष्टशठ्ठ1द्गठ्ठह्लद्बशठ्ठ (ष्ट182) जैसे संधियों के माध्यम से सदस्य देशों को यह बाध्य किया है कि वे बाल श्रम के लिए न्यूनतम आयु तय करें और खतरनाक कार्यों में बच्चों की नियुक्ति पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएं। यूनिसेफ भी शिक्षा, बाल अधिकारों और आपातकालीन राहत कार्यक्रमों के माध्यम से बाल श्रम रोकने में मदद करता है। इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्य (स्ष्ठत्र-8.7) के अंतर्गत यह लक्ष्य रखा गया है कि वर्ष 2025 तक दुनिया से बाल श्रम की सबसे बुरी प्रवृत्तियाँ समाप्त कर दी जाएं। कई देशों ने श्वस्रह्वष्ड्डह्लद्बशठ्ठ द्घशह्म् ्रद्यद्य, क्रद्बद्दद्धह्ल ह्लश रुद्गड्डह्म्ठ्ठ जैसी मुहिमों को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया है। इन सब प्रयासों से यह स्पष्ट है कि बाल श्रम कोई स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक वैश्विक चुनौती है, जिसके लिए समवेत प्रयास अनिवार्य हैं।बाल श्रम के उन्मूलन में शिक्षा सबसे प्रभावी हथियार है। जब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण, नि:शुल्क और सुलभ शिक्षा मिलेगी, तब ही वे काम करने की बजाय पढऩे को प्राथमिकता देंगे। सरकारी योजनाओं जैसे ‘समग्र शिक्षा अभियान’, ‘मिड डे मील योजना’, ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ’ और ‘सर्व शिक्षा अभियान’ ने कुछ हद तक बच्चों को विद्यालयों की ओर आकर्षित किया है, किंतु इनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता और निरंतरता की आवश्यकता है। इसके साथ ही, समाज को भी जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है कि बाल श्रम कोई संस्कार या जिम्मेदारी नहीं, बल्कि शोषण है। अगर माता-पिता, शिक्षक और पंचायतें मिलकर यह सुनिश्चित करें कि हर बच्चा विद्यालय में हो, तो यह लड़ाई आधी जीती जा सकती है। जागरूकता अभियानों के माध्यम से यह बताया जाना चाहिए कि शिक्षित बच्चा भविष्य में परिवार को कहीं अधिक बेहतर सहायता कर सकता है बनिस्बत एक कम उम्र के मजदूर के रूप में।भारत सरकार ने बाल श्रम की रोकथाम हेतु अनेक नीतियाँ और कानून बनाए हैं, जिनका उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित, शिक्षाप्रद और सम्मानजनक जीवन देना है।
सबसे प्रमुख कानून है — बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम 1986, जिसे वर्ष 2016 में संशोधित कर इसका नाम बदलकर बाल और किशोर श्रमिक (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम 1986 कर दिया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी प्रकार के श्रम में लगाना पूर्णत: निषिद्ध है और 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक कार्यों में नियुक्त करना अपराध है। इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान का अनुच्छेद 24 कहता है कि 14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को खतरनाक उद्योगों या कारखानों में काम पर नहीं लगाया जा सकता।
भारत सरकार ने राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (हृष्टरुक्क) की भी शुरुआत की है, जिसके अंतर्गत उन बच्चों की पहचान की जाती है जो श्रम में संलग्न हैं और उन्हें विशेष विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं तथा परामर्श प्रदान किया जाता है। इस परियोजना के तहत 100 से अधिक जिलों में पुनर्वास केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। पेंसिल पोर्टल (क्कद्यड्डह्लद्घशह्म्द्व द्घशह्म् श्वद्घद्घद्गष्ह्लद्ब1द्ग श्वठ्ठद्घशह्म्ष्द्गद्वद्गठ्ठह् ल द्घशह्म् हृश ष्टद्धद्बद्यस्र रुड्डड्ढशह्वह्म्) एक डिजिटल पहल है, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति बाल श्रम की घटना की रिपोर्ट कर सकता है। इसके अलावा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बच्चों के अधिकारों की निगरानी करता है। हालांकि ये सभी योजनाएं सराहनीय हैं, लेकिन इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि स्थानीय प्रशासन, समाज और नागरिक इनका कितनी ईमानदारी से अनुपालन करते हैं।बाल श्रम उन्मूलन में सरकारी प्रयासों के साथ-साथ गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इनमें से सबसे उल्लेखनीय नाम है कैलाश सत्यार्थी द्वारा स्थापित बचपन बचाओ आंदोलन । यह संगठन 1980 के दशक से सक्रिय है और अब तक दो लाख से अधिक बाल मजदूरों को मुक्त कर चुका है। कैलाश सत्यार्थी को 2014 में नोबेल शांति पुरस्कार भी मिला, जिससे इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त हुई।बचपन बचाओ आंदोलन न केवल बालकों को बंधुआ मजदूरी, बाल तस्करी और बाल यौन शोषण से मुक्त कराता है, बल्कि उन्हें पुनर्वास केंद्रों में लाकर शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक पुनर्संयोजन की सुविधा भी देता है। यह संगठन भारत के विभिन्न राज्यों में समुदाय जागरूकता कार्यक्रम, बाल पंचायतें, स्कूली कार्यशालाएं और ग्राम स्तर पर निगरानी तंत्र का विकास करता है।
Author: Jai Lok







