
संच्चिदानंद
शेकटकर, प्रधान संपादक
जबलपुर (जय लोक)। ज्योतिष पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पहुंच चुके हैं। अब उनका तीन दिनों तक लखनऊ में मुकाम रहेगा। इस प्रवास के दौरान शंकराचार्य जी गौ माता को लेकर धर्म युद्ध का ऐलान करने वाले हैं। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के प्रेरणा स्रोत सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी तथा करपात्री जी के गुरु भाई शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती हैं। भारतीय इतिहास में स्वामी करपात्री जी तथा स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती इन दोनों का नाम गोरक्षा के अग्रगण्य सेनानियों के रूप में दर्ज हो चुका है।

इन दोनों ही विभूतियां के निर्देशन में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में गौ रक्षा को लेकर एक ऐसा विराट आंदोलन हुआ था जिसमें सैकड़ो संतो को गोलीचालन में अपने प्राणों की आहुति देना पड़ी थी। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने दोनों आराध्य स्वामी करपात्री जी तथा स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती से प्रेरित होकर शंकराचार्य बनने के बाद गौ रक्षा को लेकर एक बड़ा आंदोलन छेड़ चुके हैं और उनके स्वपनों को साकार करने की दिशा में आंदोलनरत हैं। गौ रक्षा के लिए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का आंदोलन एक नया मोड़ ले रहा है।

इस आंदोलन ने सनातन धर्म के संरक्षण की भावना को एक नए स्तर पर पहुंचाया है। वह गाय को न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बल्कि राष्ट्र की आत्मा मानते हुए देश भर में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन अब केवल धार्मिक सीमाओं तक नहीं है बल्कि यह एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुका है। शंकराचार्य जी ने अपने आंदोलन के जरिए न केवल गाय के धार्मिक महत्व को पुनर्जीवित किया है बल्कि उन्होंने देश की राजनीति, कानून और सामाजिक नीति पर भी सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि शंकराचार्य जी के आंदोलन ने गाय को केवल एक पशु नहीं बल्कि राष्ट्र की पहचान का प्रतीक बना दिया है। वाराणसी से लेकर लखनऊ तक की शंकराचार्य जी की यात्रा, जनसभाएं और गौ प्रतिष्ठा धर्म युद्ध जैसे कार्यक्रमों ने समाज में एक नई चेतना जगा दी है। यह आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में हिंदू समुदाय को संगठित करने के साथ ही राजनीति में गौ संरक्षण को एक नया प्रमुख मुद्दा भी बना दिया है। राजनीतिक दलों के लिए भी यह एक चुनौती बन गई है क्योंकि शंकराचार्य जी ने सभी राजनीतिक दलों के साथ ही सीधे सरकारों से सवाल किया है कि गाय का संरक्षण केवल भावनात्मक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी भी है। इसमें भाजपा सहित कई दलों को गौ रक्षा को अपने एजेंडा में शामिल करने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि आंदोलन का असर केवल धार्मिक और राजनीतिक विर्मश तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी पैदा कर रहा है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां लाखों किसान और पशुपालक गायों पर निर्भर हैं। यदि गाय की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी बड़े स्तर पर प्रभाव पड़ सकता है। सरकार को न केवल गांव संरक्षण की बात करना होगी बल्कि वृद्ध गायों की देखभाल, गौशालाओं का विस्तार और किसानों की आर्थिक सहायता जैसे उपाय भी करने होंगे। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का गौ रक्षा का यहां आंदोलन केवल एक धार्मिक आग्रह नहीं बल्कि एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक बदलाव लाने की क्षमता रखता है। इतिहास गवाह है कि जब धार्मिक नेताओं ने ऐसे आंदोलन चलाए हैं तो समाज और राजनीति में नई दिशा मिली है। अब देखना यह है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का यह आंदोलन कैसे संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक संतुलन के साथ आगे बढ़ता है। क्योंकि इस आंदोलन का सफल होना सिर्फ भावनाओं पर निर्भर नहीं बल्कि व्यवहारिक नीतियों और सामाजिक सहमति पर टिका होगा। इतिहास गवाह है कि जब भी धार्मिक नेताओं ने ऐसे आंदोलन का नेतृत्व किया है तब नीतिगत बदलाव आए हैं। लेकिन भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में यह बदलाव संवैधानिक प्रक्रिया, सामाजिक सहमति और व्यावहारिक नीतियों के आधार पर ही संभव होगा।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का गौ रक्षा का यह आंदोलन एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। लेकिन इसकी सफलता धार्मिक भावना, सामाजिक न्याय और राजनीतिक विवेक के संतुलन पर निर्भर करेगी। अंत में शंकराचार्य जी से यही कहना है कि -कोई जागे या न जागे ये मुकद्दर है उसका, आपका फर्ज है आवाज लगाते रहिए।
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Author: Jai Lok






