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शास्त्र सम्मत बात करने में परिणामों की परवाह नहीं करते हैं शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंदजी

(जय लोक)। आज सनातन धर्मावलंबियों  के लिए यह एक बड़ा संयोग है कि आज सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज का प्रकटोत्सव है।  वहीं ज्योतिष पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती का भी प्रकटोत्सव है। यह भी संयोग है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरनंद जी को अपने बाल्यकाल से ही धर्म  सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज का सानिध्य प्राप्त हुआ है। स्वामी करपात्री जी के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य के साथ गुजरात जाकर 9 वर्ष की अवस्था में ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की। वे गुजरात से  काशी आ गए और यहां पर स्वामी करपात्री जी के साथ ही शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती का शिष्य बनकर सनातन धर्म की सेवा के कार्य करने लगे।
स्वामी करपात्री जी ने ही धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो, गौ हत्या बंद हो, गौ माता की जय के उद्घोष को जन्म दिया।

 

ज्योतिष पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य एवं द्वारका पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के 2 वर्ष पूर्व ब्रह्मलीन होने पर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती को उनका उत्तराधिकारी नामांकित किया गया। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती की सेवा में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सदैव तत्पर रहे और उनके कई प्रमुख अभियानों को रात दिन एक करके मूर्ति रूप भी देते रहे। जिस तरह शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती शास्त्र सम्मत बात करते थे और किसी भी तरह के परिणाम की चिंता भी नहीं करते थे और कांग्रेसी शंकराचार्य होने जैसे आरोपों को भी वे सह लिया करते थे लेकिन शास्त्र सम्मत बात करने में भी कभी पीछे नहीं हटे। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने राम मंदिर के निर्माण के लिए निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कानूनी लड़ाई लड़ी और इस कानूनी लड़ाई का जिम्मा स्वामी  अविमुक्तेश्वरानंद  जी ने ही संभाला हुआ था। राम जन्मभूमि से संबंधित दस्तावेजों को एकत्र करने में भी उन्होंने बड़ा परिश्रम किया। सर्वोच्च न्यायालय में भी वे शंकराचार्य जी की ओर से पक्षकार रहे और सर्वोच्च न्यायालय में उनकी गवाहियां भी हुईं। राम मंदिर का जब अयोध्या में शिलान्यास हो रहा था तब स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने शिलान्यास के मुहूर्त पर आपत्ति की थी तब वह अकेले ऐसे धर्माचार्य थे जिन्होंने मुहूर्त को लेकर कड़ी आपत्तियां भी लगातार की।

 

अपने गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के पदचिन्हों पर चलते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने भी अयोध्या में नवनिर्मित  राम मंदिर के लोकार्पण का विरोध किया था। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी की मुख्य आपत्ति यह थी कि राम मंदिर का पूर्ण निर्माण नहीं हुआ है और मंदिर का शिखर भी नहीं बनाया गया है बिना शिखर के कोई भी मंदिर पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए उन्होंने अधूरे बने राम मंदिर के लोकार्पण का जमकर विरोध किया और उनके विरोध को लेकर शंकराचार्य जी को भी बड़े विरोध का सामना करना पड़ा। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी हमेशा शास्त्रों के विपरीत होने वाले कामों का विरोध करते आए हैं और इस विरोध में उन्हें पुलिस की यातनाओं को भी सहना पड़ा है। काशी विश्वनाथ के नए कॉरिडोर के निर्माण के लिए जब काशी के प्राचीन मंदिरों को तोड़ा गया और इन मंदिर की मूर्तियों को थानों में ले जाकर बेतरतीब तरीके से रखा गया तब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने देवी देवताओं की मूर्तियों के अपमान को लेकर लड़ाई भी लड़ी। वही जब गंगा में गणेश प्रतिमाओं को विसर्जित करने पर समाजवादी पार्टी की सरकार ने रोक लगाई तब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी ने विरोध किया और उनके विरोध करने पर पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज भी किया था। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने जब गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने का अभियान शुरू किया तब इस अभियान को गति देने में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने सक्रिय भूमिका निभाई। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के प्रयासों से तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया।

 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने केदारनाथ मंदिर से 228 किलो सोना गायब होने का आरोप लगाकर मंदिर के जिम्मेवार लोगों को कटघरे में खड़ा कर दिया और इस सोने के गायब होने पर भी लगातार सवाल उठाते रहे। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती साई पूजा और इस्कान का भी विरोध करते रहे और इस विरोध को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने जारी रखा। धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज तथा जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज ने गौ हत्या के विरोध में लगातार आंदोलन किये। श्रीमती इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री रहीं तब उनके कार्यकाल में  इन दोनों धर्माचार्यों ने एक बहुत बड़ा प्रदर्शन दिल्ली में किया। इस प्रदर्शन में हुए गोली चालन में कई संतों को अपने प्राणों की आहुतियां भी देना पड़ी। धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी और शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के गौ रक्षा के अभियान को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी लगातार गति दे रहे हैं। उन्होंने देश व्यापी आंदोलन भी गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित कराने के लिए छेड़ रखा है। शंकराचार्य ने देश के सभी राज्यों की राजधानियों में जाकर गौ माता के ध्वजों को स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। महाराष्ट्र सरकार से उन्होंने गौ को राज्य माता भी घोषित करा दिया।वही उन्होंने दिल्ली तक पदयात्रा भी की है। अब गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने के लिए वे प्रदेश, जिला और गांव तक संगठन खड़ा करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। अभी मुंबई में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का चातुर्मास चल रहा है जहां वे गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित कराने के लिए दो माह तक एक बड़े यज्ञ का आयोजन करा रहे हैं। आज शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का 56 वां प्रकटोत्सव है। इस अवसर पर उन्हें जय लोक परिवार की ओर से सादर प्रणाम।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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