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सडक़ों पर गड्ढे नहीं होंगे तो कितनों की तो रोजी-रोटी खत्म हो जाएगी…

(जय लोक) । इन दिनों पूरे प्रदेश की सडक़ों के गड्ढों की खबरें पूरे मीडिया में छाई हुई हैं  हर शहर के सडक़ों के गड्ढों की वीडियो, फोटो अखबारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियां बन रही है पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर और सीधी के सांसद के बयान भी मीडिया में प्रमुखता पा रहे हैं। लोगों की शिकायत है कि सडक़ों पर गड्ढे हो रहे हैं और कोई देखने वाला नहीं है इधर पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह जी का कहना है कि भाई सडक़ रहेगी तो गड्ढे तो होंगे ऐसी कोई सडक़ बता दो जिसमें गड्ढे ना होते हों, वैसे एक हिसाब से उनकी बात है तो सही क्योंकि सडक़ों के ये गड्ढे कई लोगों की रोजी रोटी का साधन हैं। सडक़ों पर गड्ढे नहीं होंगे तो ये लोग रोजी रोटी से मुंहताज हो जायेंगे। मसलन गड्ढे नहीं होंगे, सडक़ें सपाट बनी रहेगी तो ठेकेदार का क्या होगा? और जब ठेकेदार को काम नहीं मिलेगा तो फिर अफसरों को कमीशन कैसे मिल पाएगा? जब अफसर कमीशन नहीं पाएगा तो वो ऊपर माल कैसे पंहुचा पाएगा ताकि उसको मलाईदार पोस्टिंग मिल सके, सडक़ पर गड्ढे नहीं रहेंगे तो गिट्टी वाले, रेत वाले, सीमेंट वाले ये तमाम लोग बेरोजगार हो जाएंगे, इनका तो धंधा ही ठप हो जाएगा ये तो बारिश का इंतजार करते ही रहते हैं कि कब बारिश आए और सडक़ों पर गड्ढे हो जाएं और उन्हें फिर से भरने का ठेका मिल जाए। सडक़ों पर गड्ढे होते हैं तो कार में चलने वाला बारिश का पानी उड़ाता हुआ चलता है जो टू व्हीलर पर चलने वालों पर पड़ता है जब वो गंदा पानी उसके कपड़ों पर पड़ता है तो फिर वो शर्ट पैंट धोबी को देना पड़ता है तो उसका भी धंधा चलता है, धोबी से धुल के आता है तो प्रेस करवाना पड़ता है तो प्रेस करने वाले की रोटी चल जाती है।

 

 

सडक़ों की गिट्टियां निकल जाती हैं तो वे वाहनों को पंचर कर देती है और जब टायर पंचर होता है तो पंचर बनाने वाले को भी चार पैसे की आमदनी हो जाती है, बड़े-बड़े गड्ढे में जब पानी भर जाता है तो छोटे-छोटे बच्चों को उसमें नाव चलाने का भी मौका मिलता है यानी ये गड्ढे बच्चों का मनोरंजन करने में भी बहुत योगदान देते हैं। यदि कोई गड्ढों में गिर जाता है तो लोग उसे उठाने दौड़ पड़ते हैं इससे ये भी पता लगता है कि अभी इंसानियत जिंदा है। हजारों लाखों लोगों को अपने ऊपर से गुजारने वाली सडक़ें अगर गड्ढों में तब्दील नहीं होगी तो क्या होगा? बड़े-बड़े ट्रक, ट्राले, बसें, कारे सडक़ों से निकल रहीं हैं टू व्हीलर अलग से उसकी खटिया खड़ी करें पड़े हैं अब ऐसे में बेचारी सडक़ों पर में गड्ढे नहीं होंगे तो क्या होगा? इसलिए अपना तो मानना है कि सडक़ों पर गड्ढा होना लाजमी है क्योंकि ये अनेक लोगों के रोजगार के बहुत बड़े साधन हैं। सरकार तो रोजगार दे नहीं रही कम से कम ये गड्ढे ही लोगों को रोजगार दे रहे हैं ये कोई कम पुण्य का काम है। अपना मानना तो ये भी है कि सडक़ों में होने वाले गड्ढों की शिकायत करने की बजाय इन गड्ढों की पूजा अर्चना करते रहना चाहिए और जोर-जोर से एक ही नारा लगाना चाहिए ‘जय हो गड्ढा देव, जय हो गड्ढा देव’।

 

कैलाश जी की पीड़ा
अभी तक तो अपन ये मानते थे कि मध्य प्रदेश के मंत्री इंदौर निवासी ‘कैलाश विजयवर्गीय’ बहुत ही ताकतवर नेता है उनके एक इशारे पर पूरा प्रशासन घटना टेक हो जाता है। लंबे अरसे से राजनीति में है कई बड़ी-बड़ी पोस्टों पर भी रह चुके हैं लेकिन अब पता लगा कि अफसर शाही के सामने वे भी घुटने टेक चुके हैं उनकी पीड़ा पिछले दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के सामने ही बिलबिलाकर निकल पड़ी। कैलाश जी ने 51 लाख पौधे लगाने का संकल्प ले लिया लेकिन वन विभाग ने उन्हें अभी तक केवल 7 लाख पौधे हैं   इसलिए विजयवर्गीय जी ने मुख्यमंत्री के सामने कहा कि आप अपनी विदेश यात्रा के पहले वन विभाग को आदेश कर दो कि वो हमें पौधे दे दें। अरे हुजूर पहले पता तो लगा लेते कि वन विभाग के पास भी इतने पौधे हैं कि नहीं आपने तो संकल्प ले लिया कि हम 51 लाख पौधे लगाएंगे लेकिन विभाग के पास भी तो पौधे हो तब तो वह आपको देंगे विभाग के पास जब पौधे नहीं होंगे तो आप मुख्यमंत्री से कह दो या प्रधानमंत्री से तो वे भी कहां से दिलवा देंगे। इस वक्त पौधे लगाने का मौसम क्या आया है जो देखा वही पौधे लगाने की बात कर रहा है। जबलपुर में भी महापौर ने घोषणा कर दिए कि वे एक दिन में 11 लाख पौधे लगा देंगे लेकिन एक बात जरूर समझ में आ गई आप मंत्री रहो विधायक रहो सांसद रहो अफसरों के सामने आपकी कोई हैसियत नहीं वरना कैलाश विजयवर्गीय जैसे बड़े नेता को अपना दुख इस तरह से सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाना पड़ता अभी पता चला है कि वन विभाग ने एक प्रेस नोट जारी करके कह दिया है कि हमारे पास पौधे हैं जिसको लेना है पेमेंट करे और पौधे ले ले अब देखना होगा कि कैलाश जी अपनी जेब से कितने पौधे लगाते हैं।

 

हम तो 45 साल के हो गए थे
गुजरात में एक पुल क्या गिर गया हाय तौबा मच गई। किसी ने प्रशासन को दोष दे दिया कि किसी ने शासन को। पुल बेचारा करें तो क्या करें हजारों लोगों को इस पार से उस पार रोज करवाता था। बोझ बढ़ता जा रहा था, नसें कमजोर हो रही थी, मसल्स की कसावट में कमी आ गई थी, हड्डियां भी कमजोर हो रही थी तो गिरना तय था। जबसे कोरोना आया है तब से इंसान पच्चीस और तीस साल की उम्र में भगवान को प्यारे हो रहे हैं तो वो पुल तो 45 बरस का हो गया था यानी बुजुर्ग हो चला था ऐसे में अगर उसको भी अटैक आ गया और बेचारा गिर पड़ा तो उसमें उसका क्या दोष? नीचे बहती हुई नदी को देखकर उसका भी मन होता होगा कि जैसे लोग नदी में नहाते हैं, उछल कूद करते हैं कभी वह भी ऐसा ही नदी में नहा ले और बस एक दिन जब उसकी इच्छा बहुत तीव्र हो गई तो धम्म से नदी में कूद पड़ा। वैसे भी पुल तो है  पुल पुल का एतबार क्या कीजे, ये हम पहले भी कई बार बता चुके हैं और अब भी बता देते हैं।

सुपरहिट ऑफ  द वीक
‘देखो पप्पू इस बार भी अगर तुम परीक्षा में फेल हो गए तो मुझे पापा मत कहना’ श्रीमान जी ने अपने बेटे से कहा
कुछ दिन बाद जब पप्पू का रिजल्ट आया तो श्रीमान जी ने पूछा ‘तुम्हारा रिजल्ट क्या रहा पप्पू’
‘दिमाग मत करो मत खराब करो मिस्टर आप अपने बाप होने का हक खो चुके हो’ श्रीमान जी के बेटे ने उत्तर दिया।

खतरनाक है : अति-आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था !!!

Jai Lok
Author: Jai Lok

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