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हिंदू धर्म की रक्षा के लिए परिवर्तन एवं परिवद्र्धन आवश्यक है

जगतगुरू शंकराचार्य सदानंद जी सरस्वती से जयलोक का साक्षात्कार

कैप्शन :-शंकराचार्य जी से साक्षात्कार करते हुए जयलोक के संपादक परितोष वर्मा

जबलपुर (जयलोक)। द्वारकापीठ के जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी सरस्वती से वर्तमान समय में हिंदू धर्म के सामने मौजूद चुनौतियाँ और उनसे निपटने के उपायों पर दैनिक जयलोक की ओर से संपादक परितोष वर्मा ने लंबा साक्षात्कार किया। शंकराचार्य जी से किए गए प्रश्नों का उन्होंंने शास्त्र सम्मत तरीके से उत्तर भी दिया। उनके उत्तरों का मुख्य सार यही था कि देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार हिंदू धर्म में भी परिवर्तन एवं परिवर्धन किया जाना आवश्यक है।
जयलोक – वर्तमान समय में हिन्दू लोग धाड़ ईसाई, मुसलमान बनते जा रहे हैं, इसके पीछे आप प्रमुख वजह क्या-क्या मानते हैं?
शंकराचार्य जी – क्योंकि हिन्दू धर्म की बातेंं इतनी पुरानी, सतयुगी तथा दकियानूसी एवं कठिन और जटिल हैं जिससे आज कल की पीढ़ी परेशान हो गई है यही नहीं कुछ नियम तो ऐसे हैं जो बुद्धि से परे हैं अत: जिस प्रकार से प्राचीन काल में ऋषियों ने नवीन स्मृति बनाई तथा कलिवज्र्य प्रकरण आदि बनाकर जनता को धर्म में बनाये रखा उसी प्रकार इस समय भी हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिए इसका पुराना ढांचा बदलकर देशकाल के अनुसार इसे भी जमाने के अनुसार उपस्थित करना चाहिए। अत: परिवर्तन एवं परिवद्र्धन अत्यावश्यक है। इस प्रकार का सुधार कर देने से हिन्दू धर्म में एक स्फूर्ति आ जायेगी और सारे विश्व में इसी धर्म का प्रचार हो जायेगा, छोटी-छोटी बातों के लिए इस विशाल भावना का त्याग करना ठीक नहीं है।

वस्तुत: यह योजना तो सारे विश्व में धर्म नाम की कोई वस्तु शेष ही नहीं रखेगी केवल मानव, पशुओं की भांति भौतिकता के अन्धकारमय कूप में गिर जायेगा सत्य तो यह है कि इस प्रकार के सुधार का अर्थ यह माना जाये
कि आपका यह कार्य धर्म का महाविनाशकारी तथा हिन्दू धर्म का प्रलयंकारी डिंडिमघोष है जिसे नादिर शाह, चंगेज खाँ, औरंगजेब तथा मिस्टर मेकाले नहीं कर सके उसे आप करते जा रहे हैं।
यह योजना नास्तिक एवं चार्वाकों की योजना को भी मात करने वाली है और वास्तव में सभी को क्रिस्चियन धर्म में बलाद ठकेलने का प्रयास है। आपके विचारों से यह पता चल रहा है कि आपका मस्तिष्क पारवत्य भौतिकवाद की भयंकरभूत भयावह गति से भिड़ गया है।
जयलोक – तो फिर धर्म में परिवर्तन क्या हो ही नहीं सकता और यदि होगा तो फिर किस प्रकार से?
शंकराचार्य जी – 1) धर्म का परिवर्तन वहीं कर सकता है जो कि धर्मशास्त्रों में वर्णित निषेधरूपी यागादि कर्मों के फलों को वर्तमान समय के लिये अन्यथा सिद्ध कर दें।
2.) अनन्तानन्त विश्व के अनन्त प्राणियों के अनन्त कर्म और उनके फलों का सर्वथा ज्ञाता हो और वह भी अनुभव कर ले कि अब प्राचीन कर्मों और फलों का परिवर्तन हो विश्व के लिये कल्याणकारी होगा।
3.) परिवर्तन करने वाला पुरुष सर्वत्र तथा सर्वशक्तिमान होना चाहिये। क्योंकि संसार के सभी प्राणियों को समस्त घटनायें जानकर उसमें परिवर्तन करना फिर उनको मनवाना तभी सम्भव हो सकेगा।
4.) स्मृतियां सभी वेदमूलक है। और वेद साक्षात् सर्वज्ञ परमेश्वर का उपदेश हैं  उसे वही बदल सकता है जो ईश्वर हो या ईश्वर से बड़ा हो अथवा वह प्राचीन ईश्वर को निर्बल राजा की भांति बदल दे या मार दे।
(5.) यह उपरोक्त सभी बातें न तो पूर्व में ही कभी हो सकी और न वर्तमान तथा भविष्य में सम्भव हैं तो फिर परिवर्तन कैसे किया जायेगा।
जयलोक – राजा तो सशक्त होने के कारण पुराने विधानों की भाँति धर्म का भी परिवर्तन कर सकता है, क्योंकि राजा भी तो ईश्वर के समान दिव्यशक्ति सम्भव होता है, महाभारत में कहा भी है राजा कालस्य कारणम्।
शंकरचार्य जी – यह भी आपकी धारणा भ्रान्त है वस्तुत: राजा तो केवल धर्मशास्त्रानुसान प्रजा को सुदृढ ध्रम मार्ग पर लगाने के लिए ईश्वर की प्रतिभूति मात्र है। धर्म परिवर्तन तथा नवीन धर्म निर्माण उसका कार्य नहीं है। वह चाहे तो धर्म भावना की वृद्धि द्वारा कलयुग को भी सतयुग बना दे।

वेद में कहा है
तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्म:।
अर्थात- ‘धर्म’ राजाओं का भी राजा होता है।
जयलोक – कुछ भी हो परन्तु अब इतना कठिन धर्म नहीं चलेगा। उसका कोई न कोई मार्ग बनाना ही होगा जिससे जनता को आश्वासन प्राप्त हो!
शंकराचार्य जी – वस्तुत: धर्म कोई कू्रर वस्तु नहीं है प्रत्युत वह तो बड़ा ही दयालु एवं कारुणिक भी है। वह सभी को कल्याण का मार्ग दिखलाने के लिए सैकड़ों माता या पिता से भी बढक़र बत्सलतर माता-पितृशतादपि। जैसे की कहा है- शास्त्रं हि वत्सलतरं माता-पितृशतादीप।
धर्म में सरलता इतनी कर दी गई है कि निर्बल रोगी और बालक एवं वृद्ध के लिए स्नान, पूजन, भोजन आदि में अनेक प्रतिबन्ध शिथिल कर दिये हैं तथा आपातकाल में जीविका के लिये बड़ी नम्रता कर दी है। निर्धनों के लिये तो यहाँ तक कहा है कि श्राद्ध के समय पितरों को जाते हैं। प्रसूता और रोगी का मार्जन मात्र से स्नान हो जाता है, काष्ठ तथा पत्तों से भी गरीब का होम सम्पत्र हो जाता है, केवल गायत्री, जप, सूर्याघ्र्य मात्र से ही ब्राह्मणादि द्विजों का कल्याण हो जाता है। शूद्रों के लिये तो यहाँ तक सरलता है कि मंदिर का शिखर दर्शन मात्र भी स्वर्ग का कारण है अधिक क्या कहें केवल ‘राम नाम’ में ही अमोघ शक्ति है।
जयलोक – जो लोग पाश्चात्य भौतिक शिक्षा के शिकार हो गये हैं और कामचार, कामवाद, कामभक्ष को ही धर्म स्वीकार करते हैं उनको कैसे वश में किया जायेगा?
शंकराचार्य जी – उनके लिये सप्ताह में एक दिन किसी भी धर्म स्थान पर तपस्वी विद्वान तथा तार्किक पुरुष धर्म की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालें, श्री करपात्री जी के ग्रंथ ‘रामराज्य और माक्र्सवाद’ तथा ‘ईश्वरसिद्धि आदि एवं माधवाचार्य कृत ‘क्यों’ आदि ग्रंथों पर प्रचार किया जावे, योग, वेदान्त, श्रीमद्भागवद्, महाभारत, गीता आदि पर विचार किया जावे।
सबसे अधिक आवश्यक यह है कि सभी स्कूलों में प्रारम्भ से विश्वविद्यालयों तक धार्मिक शिक्षा का प्रबन्ध किया जाये उन स्कूल, कॉलेजों में धर्मनिष्ठ प्रकाण्ड वक्ताओं के प्रवचन करायें जायें। यही व्यवस्था मजदूरों तथा व्यापारी संस्थाओं एवं वकील, जज, पुलिस, रेलवे, सेना आदि के कर्मचारियों में की जावें तो यह भौतिकवाद का भूत भगाया जा सकता है। परन्तु इनके भय से धर्म में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। क्योंकि धर्म इतनी निर्बल वस्तु नहीं है कि जो इन नास्तिक तथा आलसी एवं विषयों तथा लम्पट पुरुषों के भय से रोज नया रंग बदलता रहे। धर्म का नाश करके धर्म की रक्षा नहीं होती। धर्म एवं हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षित:।                     जारी…2

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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