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एम्बुलेंस माफिया और स्वास्थ्य के दलालों का गठजोड़ चिकित्सा व्यवस्था पर हावी

जबलपुर के बाईपास में स्थित अस्पतालों

की लगातार सामने आ रही शिकायतें

@परितोष वर्मा, जबलपुर (जयलोक)। एक बार फिर एंबुलेंस माफिया और स्वास्थ्य के दलालों के गाठजोड़ की करतूतों के पाप का पिटारा खुल गया है। पिछले एक दशक के अंदर जबलपुर में स्थापित हुए कई ऐसे नए अस्पताल हैं जो अपनी उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं के दम पर नहीं बल्कि स्वास्थ्य के माफिया का हिस्सा बनकर अपना कारोबार चला रहे हैं। चिकित्सा का पेशा मानवता की सेवा से जुड़ा कार्य है निश्चित रूप से इसके संचालन के लिए अस्पताल संचालकों को पैसे की आवश्यकता रहती है। इसीलिए वाजिब दामों पर इलाज उपलब्ध कराने वाले और मरीजों को स्वास्थ्य लाभ पहुँचाने वाले अस्पतालों की छवि और रिकॉर्ड अलग होता है। जबकि स्वास्थ्य माफिया का हिस्सा बन मरीज को केवल दुधारू ग्राहक के रूप में देखने वाले अस्पतालों की स्थिति अलग होती है। संस्कारधानी के चिकित्सा जगत में एक बार फिर इन अस्पतालों के बीच में पहचान की जंग छिड़ गई है। ऐसे अस्पताल जो स्वास्थ्य के दलालों के साथ एंबुलेंस माफिया के साथ मिलकर बहुत बड़ा रैकेट चला रहे हैं उनको बेनकाब करने की माँग जोर पकड़ रही है।
सवाल इस बात का है कि आखिर संस्कारधानी में ऐसे कौन से अस्पताल हैं जो केवल कमाई के उद्देश्य से संचालित हो रहे हैं और गंभीर बीमारी, भीषण दुर्घटना का शिकार लोगों को केवल पैसा देने वाली मुर्गी के रूप में या अस्पताल रूपी दुकान के ग्राहक के रूप में देख रहे हैं और एंबुलेंस माफिया की मदद से इन मरीज रूपी ग्राहकों को मोटा कमीशन देकर अपने अस्पताल में लाने का लालच देकर घिनोना खेल खेल रहे है। यहां तक कि ऐसे अस्पतालों का मौलिक स्तर इतना गिर चुका है कि वह एंबुलेंस के मालिकों को अपने अस्पताल में ज्यादा से ज्यादा मरीज भर्ती करवाने के बदले गोवा, बैंकॉक और यहां तक कि मसाज पार्लर में भेजने जैसी दलाली की सेवाएं भी उपलब्ध करवा रहे हैं। अब ऐसे अस्पतालों का बेनकाब होना बहुत जरूरी है और इनका पंजीयन भी निरस्त करना शासन की जिम्मेदारी है। जबलपुर के बाईपास क्षेत्र में संचालित हो रहे कुछ अस्पतालों की ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। जो केवल मरीजों को पैसे उगाही का जरिया समझ रहे। ऐसे अस्पताल संचालक और इनका मैनेजमेंट इतने निचले स्तर तक जा चुका है जहां मरीजों को भर्ती करने के बाद इलाज के नाम पर उनके जीवनयापन की जमीन गिरवी रखने के लिए हर व्यवस्था तत्काल उनके यहां उपलब्ध रहती है। जैसे अस्पताल में ही बैक ऑफिस में उसका एक अलग ही काउंटर खोल कर रखा गया हो। मामला यहीं नहीं रुकता कुछ अस्पताल संचालकों ने तो दलाल तैनात कर रखे हैं जो मरीज के लाचार होने का फायदा उठाकर उन्हें बैंक ऋण तक दिलवाने का काम कुछ ही घंटों में कर देते हैं और उनके नाते रिश्तेदारों का नाम नंबर तक ले लेते हैं। मरीज जब ठीक होने के बाद बैंक का ऋण नहीं चुका पाता तो यह असामाजिक तत्व उनके रिश्तेदारों तक को फोन करके पैसे चुकाने के लिए गाली गलौज कर उन्हें धमकाने से नहीं चूकते। यह बहुत ही घिनौना खेल है जो सिर्फ  पैसे की भूख मिटाने के लिए तेजी से पनप चुके स्वास्थ्य के दलाल और चिकित्सा माफिया द्वारा खेला जा रहा है।

अच्छे अस्पतालों की भी छवि हो रही धूमिल

इस चिकित्सा माफिया के गठजोड़ के कारण जबलपुर के अच्छे निजी अस्पतालों की भी साख खराब हो रही है और उनकी छवि धूमिल हो रही है। दशकों से जबलपुर में हजारों लाखों लोगों का इलाज कर चुके निजी अस्पताल आज भी अपनी छवि के कारण ही संचालित हो पा रहे हैं। अस्पताल का संचालन करना काजल की कोठरी में कार्य करने जैसा ही है जिसका मरीज ठीक हो जाता है वह गुणगान करता है और जिसका मरीज ठीक नहीं हो पाता वो आरोपों की झड़ी लगा देता है। ऐसा नहीं है कि जिले में संचालित हो रहे सरकारी अस्पताल अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं है। निर्धन और बेसहारा लोगों के लिए यही सरकारी अस्पताल इलाज के दौरान आस्था रूपी मंदिर बन जाते हैं। लेकिन यह बात भी सत्य है कि सरकारी अस्पतालों में मरीज के साथ होने वाला व्यवहार और कामकाज का सरकारी रवैया इतना जटिल बना हुआ है कि अपने मरीज का इलाज करवाने में उसके परिजन ही दुखी होकर हौसला तोड़ देते हैं।

अन्य जिले भी शामिल

इस घिनौने खेल में न सिर्फ  संस्कारधानी के एंबुलेंस संचालक और कुछ अस्पताल शामिल हैं बल्कि संभाग के अन्य जिलों के साथ-साथ आसपास के जिलों से मरीज को गंभीर अवस्था में चिकित्सा के लिए जबलपुर लाने वाले कुछ एंबुलेंस संचालक भी शामिल है। कई बार यह बात भी सामने आई है कि रीवा, सतना, डिंडोरी, मंडला से गंभीर स्थिति में आ चुके मरीजों को जबलपुर के शासकीय अस्पताल या अन्य स्थापित निजी अस्पताल के लिए रेफर किया जाता है लेकिन पैसे की भूख मिटाने बैठे कुछ अस्पतालों के दलालों द्वारा एंबुलेंस वालों को सेट कर कमीशन देकर जबरदस्ती अपने यहां भर्ती करवा लिया जाता है। ऐसे मामलों की ढेरों शिकायतें जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रशासन के सामने आ चुकी हैं, लेकिन इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ना ही चिकित्सा जगत के इस माफिया के खिलाफ  मजबूत कदम उठाए गए हैं।

18 को इन मुद्दों पर  होनी है बड़ी बैठक

आगामी 18 फरवरी को शहर के चिकित्सकों द्वारा इन सभी मुद्दों को लेकर एक वृहद स्तर पर बैठक आहूत की जा रही है। इस बैठक में नगर के जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, अस्पतालों के संचालकों के साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जा रहा है ताकि चिकित्सा माफिया के चंगुल से संस्कारधानी और आसपास के दर्जनों जिलों के लोगों को बचाया जा सके।

Jai Lok
Author: Jai Lok

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