Download Our App

Home » Uncategorized » पर्यूषण पर्व का आठवाँ दिन-उत्तम त्याग धर्म

पर्यूषण पर्व का आठवाँ दिन-उत्तम त्याग धर्म

जबलपुर (जयलोक)। डी. एन. जैन महाविद्यालय परिसर में आयोजित दिगम्बर जैन समाज के दशलक्षण पर्व के आठवें दिन आचार्यश्री समयसागर महाराज ने उत्तम त्याग धर्म पर अपना मंगल प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में त्याग किसका करना है और क्या ग्रहण करना है, यही सबसे बड़ा प्रश्न है। जब तक मन में अशांति और लालसा बनी रहती है, तब तक त्याग का सही निर्णय करना कठिन हो जाता है। जो व्यक्ति भोग-विलास और विषयों में आनंद खोजता है, उसके लिए त्याग का मार्ग सरल नहीं होता।

गुरुदेव ने समझाया कि आत्मा शुद्ध है और उसी में आनंद है। बाहर की वस्तुएँ, जो केवल इंद्रियों को भाती हैं, वे कभी स्थायी सुख नहीं दे सकतीं। एक ही वस्तु, दृष्टि के भेद से, कभी मोक्ष का साधन बन सकती है तो कभी बंधन का कारण। इसलिए धर्म हमें भोग की ओर नहीं, बल्कि त्याग की ओर ले जाता है।
उन्होंने कहा कि त्याग का अर्थ केवल बाहर की वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है, बल्कि भीतर के ‘मेरा-तेरा’ भाव को समाप्त करना है। जब तक यह भाव बना रहता है, उत्तम त्याग संभव नहीं है। बाहरी परिग्रह (धन, संपत्ति, वस्तुएँ) का त्याग किए बिना अंतरंग परिग्रह (राग-द्वेष, अहंकार) का त्याग भी कठिन है।

आचार्यश्री ने उदाहरण देकर कहा- ‘दूसरों पर शासन मत करो, अपनी आत्मा पर अनुशासन करो। यही सच्चा त्याग है।’ उन्होंने समझाया कि परिग्रह से कभी विकास नहीं होता, बल्कि विनाश होता है। सच्चा मोक्ष केवल त्याग से ही प्राप्त होता है।
धर्मसभा के प्रारंभ में श्रावक श्रेष्ठी सुभाष जैन (मुंबई), आदित्य जैन, अजय क्षमा एवं संजीव चौधरी, रायसेठ चंद्र कुमार, सुधीर जैन ने आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के तैलचित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित किया और आचार्यश्री समयसागर महाराज का पाद प्रक्षालन किया। कार्यक्रम का संचालन विनय भैया  और अमित पड़रिया ने किया।

 

 

ग्राम परतला में किसान की हत्या, खेत में मिला शव

Jai Lok
Author: Jai Lok

RELATED LATEST NEWS

Home » Uncategorized » पर्यूषण पर्व का आठवाँ दिन-उत्तम त्याग धर्म