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यारों के यार हाजी ख्वाजा खान ने कैलाश सोनकर को करवाई थी सी एम पद की दावेदारी, पढ़े लिखे मुस्लिम परिवार ने स्थानीय राजनीति में बना लिया था प्रभावी दखल, 1977 से जनसंघ की विचारधारा पर चले

जबलपुर (जयलोक)। संस्कारधानी की उपाधि सिर्फ जबलपुर को कहने के लिए नहीं मिली है। बल्कि इस संस्कारधानी में धार्मिक सौहार्द और दोस्ती के प्रेम के ऐसे कई अनूठे किस्से हैं जिन्होंने मजहब या धर्म की बेडिय़ों को पीछे छोड़ दिया। दोस्त बने तो ऐसे बने की परिवारों को भी अपनाया और जिम्मेदारी ऐसी उठाईं की 40-50 साल तक एक दूसरे के घरों के राशन पानी तक का ध्यान रखा। राजनीतिक रूप से विचारधारा में मतभेद जरूर रहा लेकिन कभी मनभेद नहीं आया। दोस्ती ऐसी कि अपने समय के चर्चित राजनीतिज्ञ कैलाश सोनकर को पहले पार्षद का चुनाव हाजी ख्वाजा खान ने हर साधन संसाधन के साथ लड़वाया और विजय दिलवाई। इसके बाद हाजी ख्वाजा खान का ही सपना था कि वह विधायक का चुनाव लड़ें इसके लिए उन्हें खुले तन मन धन से समर्थन दिया चुनाव में बेहतर रणनीति के साथ मैदान में उतरे और 1977 में जनसंघ के दीपक की रोशनी में हाजी ख्वाजा खान की मेहनत सफल हुई और कैलाश सोनकर विधायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। कैलाश सोनकर चंूकि प्रथम पंक्ति का चेहरा बने और सार्वजनिक जीवन में बहुत ही चर्चित और बहुत ही यार बाज खुले दिल के मददगार व्यक्तित्व के धनी थे।

जिनके बारे में आज भी चर्चा होती है। उन्हें इस प्रथम पंक्ति तक पहुंचाने में हाजी ख्वाजा खान जो की पेशे से जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में फील्ड ऑफिसर के पद पर सेवाएं देते थे उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। अपने वालिद के किस्से और कमाये हुए संबंधों को बड़े गर्व के साथ साझा करते हुए भाजपा के युवा नेता जमा खान, पूर्व विधायक कैलाश सोनकर के पुत्र भोला सोनकर, पुत्री मोना सोनकर ने उनके पिताओं के बीच में बने दिल के संबंधों के कई आकर्षक और प्रेरणादाई किसे सुनाए। नई पीढ़ी के इन जज्बातों को जानकर ऐसा लगा जैसे सिर्फ नाम और उपनाम का फर्क है बाकी ख्वाजा खान और कैलाश सोनकर की दोस्ती आज भी उनके बच्चों में जीवंत नजर आ रही है। यह वह किस्से थे जिससे हिंदू मुस्लिम का कोई मतलब नहीं था।

यह वह किस्से थे जो मानवीय संबंधों पर निर्मित थे और जिनका पारिवारिक दिल से जुड़ाव था जिन्होंने अपने जीवन काल से लेकर मृत्यु उपरांत तक एक दूसरे के प्रति भावनाओं और संबंधों का निर्वहन किया। हाजी ख्वाजा खान 1989 में  पहली बार हज करके आए थे जो अपने आप में बहुत ही बड़ी बात थी । उसके बाद वह 2009 में भी हज यात्रा का सबब पूरा कर पाए थे।

बच्चों को पढ़ाया बी ई, बहु को करवा रहे थे पीएचडी –

शिक्षित व्यक्ति ही शिक्षा का सही महत्व समझता है समाज के प्रति योगदान और उद्देश्य निर्माण में उनकी भूमिका का उद्देश्य समझता है। स्वर्गीय हाजी ख्वाजा खान ने इस बात को पहले ही समझ लिया था। मुस्लिम परिवारों में शिक्षा का स्तर कम पाया जाता है। लेकिन आज से 40 साल पहले से इन्होंने शिक्षा का महत्व समझा और अपने सभी बच्चों को इंजीनियर बनने से लेकर उच्च शिक्षा दिलवाई। लड़कियों को भी उच्च शिक्षा दिलवाई। अपनी पुत्रवधू को वर्तमान में भी वे जीवित रहते हुए एम टेक करवा चुके थे पीएचडी करवा रहे थे। यह अुनकरणीय कार्य था क्योंकि इस दौर में मुस्लिम परिवारों में विशेष कर लड़कियों को इतनी उच्च शिक्षा नहीं दिलवाई जाती थी।
हाजी ख्वाजा खान किस कदर संस्कारी ढांचे के रंग में रचे बसे थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि उनके जितने मुस्लिम दोस्त थे उससे कहीं अधिक या यह कहें कि अधिकांश हिंदू समाज के दोस्त थे। उनकी गहरी दोस्ती में कभी फर्क नहीं आया चाहे बादल कितने भी काले हुए हों और कितनी भी राजनीतिक, धार्मिक फिजाएं बदली हों।
उनके खास दोस्तों में आर के पांडे, राकेश श्रीवास्तव रजक बाबू, मनीष श्रीवास्तव भी शामिल थे। जिन्होंने 35-40 साल का सफर कंधे से कंधा मिलाकर पूरा किया। कैलाश सोनकर और इन हाजी ख्वाजा खान के किस्सों में एक महत्वपूर्ण किस्सा यह भी शामिल है कि जब 1977 के चुनाव में वह विधायक बने उसके बाद 1979 के समय हाजी ख्वाजा खान  ने 40 विधायकों का समर्थन अपने मित्र कैलाश सोनकर पक्ष में करवाया था और मुख्यमंत्री की दावेदारी पेश कर दी थी। राजनीतिक घटनाक्रम बदले और कुछ समय बाद ही विधानसभा भंग हो गई और यह दावेदारी पूरी नहीं हो पाई। पढ़े-लिखे मुस्लिम परिवार ने 50 साल पहले स्थानीय राजनीति में अपनी पैठ बनाना प्रारंभ किया। हाजी ख्वाजा खान ने पनागर के पठानी मोहल्ले से लेकर जबलपुर के नए मोहल्ले तक के अपने सफर में हिंदू मुस्लिम दोनों ही समाज के लोगों को भली-भांति जोडऩे का कार्य किया। कैलाश सोनकर जब विधायक का चुनाव जीते उसके बाद उन्होंने हाजी ख्वाजा खान के परिवार को जबलपुर लाकर बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। हाजी ख्वाजा खान के सभी मित्र उन्हें उस दिलेर शख्स के रूप में याद करते हैं जिसने कभी परिस्थितियों और मुसीबत के आगे घुटने नहीं टेके। मित्रों को अपने परिजनों को यही सिखाया कि हारना कमजोरों का काम है मुश्किल वक्त आए तो और मजबूती से उसका मुकाबला करना चाहिए।
हाजी ख्वाजा खान कैलाश सोनकर और उनके अन्य सभी मित्रों ने चार दशकों से जबलपुर में धार्मिक सौहार्द की कई नजीरें पेश की हैं। यह वह लोग हैं जो असली मानवीय मूल्य का निर्वहन करते हैं। यह वह लोग हैं जो शरीर छोडक़र आसमान में घर जरूर बना लेते हैं लेकिन इनका वजूद इनके मानवीय मूल्य और संबंध निर्वहन की ईमानदारी इन लोगों को मनों में जीवित रखती है।

एक साइकिल से बांटते थे कांग्रेस और जनसंघ के पर्चे –

पुराने किस्सों की याद जब ताजा होती है तो बहुत से उदाहरण पेश करने वाली बातें भी सामने आती हैं। राजनीति में विशेष रूप से दलों के बीच में विचारधारा का फर्क होता है।
विचारधारा के आधार पर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता बनते हैं। लेकिन दो विभिन्न विचारधारा के लोग अगर एक ही साइकिल पर अपने-अपने दल की विचारधारा से प्रभावित होकर परिचय बनाते हैं तो यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक उदाहरण पेश करने वाली बात होती है। ऐसा ही कार्य हाजी ख्वाजा खान और उनके मित्र राजेंद्र पटेल के द्वारा किया जाता था राजेंद्र पटेल कांग्रेस विचारधारा से प्रभावित थे और हाजी ख्वाजा खान जनसंघ के विचारधारा से प्रभावित थे लेकिन दोनों मित्र एक ही साइकिल में साथ निकलते थे और लोगों के बीच में अपने-अपने विचारों को प्रभावित करने वाले पर्चों का वितरण करते थे।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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