
जाकौ राखो साईंया
प्रस्तुति – रमेश सैनी
(जयलोक)। यह आठवें दशक की बात है जब जबलपुर में तीन अखबार मुख्य रूप से जनसामान्य में प्रचलित थे। यदि उनकी प्रसार संख्या से आकलन करें तो पहले नंबर पर नवभारत, दूसरे पर नई दुनिया (बाद में नवीन दुनिया) और तीसरे पर युगधर्म। सब अखबारों की अलग अलग राजनीतिक निष्ठा थी। मुझे यह कहने में कुछ भी गुरेज नहीं है कि भले ही उसे समय नवभारत जबलपुर में पहले नंबर था। पर नई दुनिया में पत्रकारों और कवि लेखको की बहुत समृद्ध टीम थी। जो शहर और शहर के बाहर भी नामी गिरामी थे। कुछ कवि थे। कुछ लेखक ,विचारक थे और पत्रकार तो थे ही। इनमें कुछ नाम मुझे याद आ रहे हैं।
निबंधकार शिक्षाविद हरिकृष्ण त्रिपाठी जी, डॉ राजकुमार तिवारी सुमित्र जी , अजित वर्मा जी, ओंकार तिवारी जी और हीरालाल गुप्त जी बाद में अरुण अरुण पांडेय भी नई दुनिया से जुड़े, जो नाट्य लेखक अभिनेता और निर्देशक थे। उन्होंने जबलपुर में नाटक में अनेक पीढ़ी तैयार की थी। अभी कुछ दिन पहले ही उनका निधन हुआ।

अजित वर्मा जी पत्रकारिता के साथ-साथ सामाजिक, धार्मिक आदि कार्यों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व थे। पत्रकारिता से उन्हें इतना प्रेम था कि उनकी नौकरी मध्य प्रदेश शासन के गजेटियर विभाग में लग गई थी। वहॉं पर कुछ दिन काम किया। पर उनका नौकरी में मन नहीं लगा फिर कुछ दिन बाद नौकरी छोडक़र पत्रकारिता में वापस आ गए और पुन: नई दुनिया से जुड़ गए। अजित वर्मा जी एक कर्तव्यनिष्ठ निर्भीक, अन्याय,अनीति अत्याचार, शोषण, सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित एक अंतिम समय तक जूझने वाले चेतना सम्पन्न पत्रकार थे। अजित वर्मा जी अपने समय में अपनी अग्रज,अपनी समकालीन और नवागत पीढ़ी सभी में सदा सम्मानित रहे हैं। उन्हें यह उनकी विनम्रता,सहयोग और समर्पण की भावना से मिला है। अजित वर्मा जी को साहित्य और संगीत से विशेष लगाव था।
आठवीं दशक में सुप्रसिद्ध कवि पत्रकार डॉ. राजकुमार तिवारी सुमित्र जी के निवास स्थान पर मित्र संघ द्वारा हर शनिवार को काव्य संध्या कवि गोष्ठी आयोजित हुआ करती थी। यह गोष्ठी शाम को साढ़े सात बजे से लेकर रात को लगभग दस ग्यारह बजे तक चलती रहती थी और यह सिलसिला अनेक वर्षों तक अनवरत चलता रहा।

यहॉं यह बता जरुरी है कि मित्र संघ याने अजित वर्मा और उनके अभिन्न मित्र और पारिवारिक सदस्य सच्चिदानंद शेकटकर को आफिस के काम के समय को छोडक़र सदैव एक साथ ही देखा जाता था। जिसका निर्वाह सच्चिदानंद शेकटकर जी और उनका परिवार अजित वर्मा जी के जाने के बाद आज भी उसी निष्ठा और समर्पण भाव से कर रहा है।उस समय की यह बहुत प्रसिद्ध जोड़ी थी। और एक को देख लो तो आप यह मान सकते थे कि दूसरा भी आसपास होगा। दो व्यक्तित्व का अद्भुत समुच्चय था। जो आज भी एक उदाहरण के रूप में है।आज हम जब कहीं पर शेकटकर जी को देखते हैं तो अआभास होता है कि भाई अजित वर्मा जी जरुर आसपास ही होंगे। अजित वर्मा जी का संगीत के प्रति लगाव का अद्भुत था ।भूले बिसरे गीतों की श्रृंखला। जिसके लगभग सवा सौ से अधिक आयोजन प्रदेश और प्रदेश के बाहर हुए थे। उस समय यह रिकॉर्ड था।फिलहाल मुझे उन गायकों और कलाकारों के नाम स्मरण नहीं आ रहे हैं। मुझे ऐसा महसूस होता है।

आठवां दशक जबलपुर में साहित्य संगीत का स्वर्ण काल समय रहा है। आठवें दशक के उत्तरार्ध में मेरा पहला व्यंग्य संग्रह ‘मेरे आसपास स्वतंत्रता संग्रामी दर्शनाचार्य गुलाबचंद जैन के प्रकाशन गृह मदन महल जनरल स्टोर से प्रकाशित होकर आया था। इस संग्रह के प्रकाशन में पार्श्व की भी न भूलने वाली स्मृतियॉं है।
मेरे आसपास के प्रकाशन में डॉ राजकुमार तिवारी सुमित्र और डॉक्टर श्रीराम ठाकुर दादा का महत्वपूर्ण योगदान है। जिसे मैं कभी बाद में लिखूॅंगा। एक दिन मैं श्रीराम ठाकुर दादा के साथ ‘मेरे आसपास’ की प्रतियां लेकर नवीन दुनिया कार्यालय में,श्री सुमित्र जी, श्री अजित वर्मा जी,कवि ओंकार तिवारी जी,कवि हीरालाल गुप्ता जी और संपादक मुंदर शर्मा जी को देने के लिए पहुंचा। सबसे पहले हमने डॉ. राजकुमार सुमित्र जी को संकलन की प्रति भेंट की। उसके बाद ओंकार तिवारी जी,और अजित वर्मा जी को उनकी टेबिल पर जाकर संग्रह भेंट किया । संग्रह देखते ही वे अल्हादित हो गए और उन्होंने कहा -अब इसका विमोचन हो जाए।
आप समय और अतिथि तय कर लो और शेष काम मित्र संघ करेगा और जल्दी करो इसमें देर नहीं।’ उसे दौर में किसी लेखक की पुस्तक का प्रकाशन ही बहुत महत्वपूर्ण घटना होती थी। पुस्तक प्रकाशन सरल नहीं था। यह सुनकर हमारी खुशी का पार नहीं रहा । फिर हमने हीरालाल गुप्त जी और मुंदर शर्मा जी को पुस्तक भेंट की। उन्होंने भी पुस्तक की काफी सराहना की। व्यंग्य संग्रह ‘मेरे आस-पास: के विमोचन की रूपरेखा तैयार होने लगी।
मैं श्रीराम ठाकुर दादा और सुमित्र जी के विमर्श के बाद मुख्य अतिथि के रूप में व्यंग्यकार उपन्यासकार शंकर पुण्ताम्बेकर (जलगांव, महाराष्ट्र) और अध्यक्षता के लिए व्यंग्य पुरोधा हरिशंकर परसाई, प्रमुख वक्ता वरिष्ठ निबंधकार,शिक्षाविद और पत्रकार हरिकृष्ण त्रिपाठी और कवि राजकुमार तिवारी सुमित्र की सहमति बनी।नियत तारीख को मित्र संघ के बैनर तले अग्रज अजित वर्मा और सच्चिदानंद शेकटकर के संयोजन में जानकी रमण महाविद्यालय में हमारे व्यंग्य संग्रह मेरे आसपास का विमोचन हुआ।जिसमें शहर के सभी साहित्यकार कवि और व्यंग्यम के व्यंग्यकार साथी श्रीराम ठाकुर दादा,रमेशचंद्र शर्मा निशिकर, महेश शुक्ल, श्रीराम आयंगार रासबिहारी पाण्डेय, श्याम सुंदर सुंल्ल्रेरे, चैतन्य भट्ट, कुंदन सिंह परिहार आनंद बाजपेई, नटवर जोशी आदि सम्मिलित हुए। आठवें दशक के उत्तरार्ध में व्यंग को लेकर काफी विमर्श हो रहे थे कि व्यंग्य विधा है कि नहीं। इस पर सभी व्यंग्यकारों के भिन्न भिन्न मत थे।
इस विमोचन के अवसर पर व्यंग्य पुरोधा श्री हरिशंकर परसाई जी ने व्यंग्य और व्यंग्य विधा पर लगभग आधे घंटे से अधिक बात की। जिसमें व्यंग्य के स्वरूप, व्यंग्य के विषय, और क्या लिखा जा रहा है और क्या लिखा जाना चाहिए।
वह उद्बबोधन याद नहीं रहा और जो थोड़ा बहुत याद है उसको व्यक्त करने में घालमेल हो जाएगा। यह समय का दुर्भाग्य है कि वह समय तकनीक रूप से विकसित नहीं था। इस कारण हम उद्बबोधन को रिकॉर्ड नहीं कर पाए। व्यंग्य और पुस्तक को लेकर यही कुछ बात शंकर पुण्ताम्बेकर जी ने थी। अगर हरिशंकर परसाई जी का उद्बबोधन को रिकॉर्ड कर लेते, तो व्यंग्य आलोचना का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता। आज स्मृति में उन दिनों को याद करते हैं तो शरीर के रुएं खड़े हो जाते हैं। उस विमोचन के समाचार को स्थानीय स्तर से बहुत अच्छा कवरेज मिला था। साथ ही शहर के बाहर भी इसकी चर्चा काफी रही और अनेक अखबारों ने इस समाचार को स्थान दिया। यह सब अजित वर्मा जी के सहयोग से ही संभव हो सका। उस समय को याद करने पर बहुत स्मृतियां साथ नहीं छोड़ती है।वे लोग दिमाग में गहरे तक बसे हुए हैं। भले बहुत से लोग लेखक, व्यंग्यकार इस दुनिया में नहीं है पर उनकी उपस्थिति का आभास होता है।आभास होता है,अजित वर्मा जी का जिन्होंने मेरे लिए साहित्यिक सफर का पहला रास्ता तैयार किया।
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Author: Jai Lok







