
चैतन्य भट्ट
(जय लोक)। साठ के दशक में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ‘श्रीधर’ की एक बड़ी ही सफल फिल्म आई थी ‘दिल एक मंदिर’ उस फिल्म का एक गीत बेहद मशहूर हुआ था जिसके बोल थे ‘याद न जाए बीते दिनों की दिल क्यूं बुलाए उन्हें’। हाल ही में एक सर्वे हुआ है जिसमें यह बताया गया है कि साठ फीसदी लोगों ने यह माना है कि सन 1975 का समय बहुत अच्छा था। वैसे भी वर्तमान से बेहतर हमेशा अतीत रहा है वर्तमान के जो संघर्ष हैं, परेशानियां हैं वे अतीत में भी रही होगीं इसके बावजूद हर व्यक्ति को अपना अतीत बेहतर लगता है और क्यों न लगे आज जितनी झंझटें हैं उस वक्त नहीं थी। आबादी कम थी, तनख्वाह भी कम थी उसके बाद भी आराम से खर्च चलता था, ना मोबाइल की झंझट थी ना रिचार्ज का लफड़ा, ना कार में पेट्रोल की परेशानी, बेहतरीन साइकिल से लोगबाग चला करते थे न जाम लगता था ना सडक़ों पर ऐसी रेलमपेल मची रहती थी। सिनेमाघर में तीन रुपया बीस पैसे में बालकनी की टिकट आ जाती थी जो अब ढाई सौ और तीन सौ रूपये में मिलती है ट्रेन का किराया भी कम था, बसें भी सरकारी थी अस्पताल भी सरकारी थे पंजी जेब से खर्च नहीं होती थी और इलाज हो जाता था। अब तो किसी अस्पताल में चले जाओ लाख डेढ़ लाख से उतरना तय है। स्कूल भी सरकारी हुआ करते थे जिनमें नाम मात्र की फीस लगती थी अब अगर एक बच्चे को पढ़ाना है तो हर साल लाख रुपए जेब से चले जाते हैं। शादी ब्याह भी घर के सामने पंडाल लगाकर हो जाते थे। लोगबाग जमीन में बैठकर पंगत में खाना खा लेते थे। अब होटल में रिसेप्शन करना पड़ता है पाँच सौ से लेकर हजार रुपया प्लेट खर्चा आता है, सजावट का पैसा अलग, रूम चार्ज अलग कुल मिलाकर जो शादी उस जमाने में दस बीस हजार में हो जाती थी वो लाखों में पहुँच चुकी है ना पिज्ज़ा था ना बर्गर। आलू बंडा समोसा और स्कूलों के पास बिकने वाली ‘उबली बेर’। अब आदमी पुराने दिनों को याद करके खुश ना हो तो क्या करें जिससे भी सर्वे वालों ने पूछा होगा उनका यही जवाब होगा कि सचमुच वो दिन कितने अच्छे थे। ना कंप्यूटर का चक्कर था, ना यूपीआई से पैसे जाते थे इसलिए वे दिन लोगों को आज की तुलना में ज्यादा बेहतर लगते हैं। लोग-बाग सरकारी नल और कुएं पानी से खींचकर प्यास बुझा लेते थे अब बीस रुपए में एक लीटर की ‘बिसलेरी’ आती है समय के साथ-साथ सब कुछ बदलता जा रहा है यही कारण है कि लोगों को वे पुराने दिन और पुराना वक्त ज्यादा बेहतर लगता है। इसलिए शायद गीतकार ने वो गीत लिखा होगा।

इतना सच भी ना बोलें
अमूमन तो ये माना जाता है कि जो नेता बन जाता है वो सच बहुत कम बोलता है झूठ के दम पर वह नेता बनता है और इस दम पर फिर अपनी राजनीति चलाता है लेकिन अपने ‘कैलाश विजयवर्गीय’ ने तो ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ को भी मात कर दिया। एक बड़ी बैठक में साफ -साफ कह दिया कि जो राजनीतिक ‘कमिटमेंट’ किए गए हैं उसके कारण प्रदेश का बजट बुरी तरह गड़बड़ा गया है शायद विजयवर्गीय जी ये भूल गए के उनकी सत्ता इन्हीं कमिटमेंट जिसमें सबसे महत्वपूर्ण ‘लाडली बहना’ के कारण आई है। अगर शिवराज सिंह चौहान लाडली बहना योजना ना लाते और हर महिला के अकाउंट में सीधे नोट ना डालते तो हो सकता है कि आपकी सरकार ना बनती और जब सरकार न बनती तो आप मंत्री कैसे बनते? वैसे विजयवर्गीय जी की एक आदत तो है कि वे अक्सर सच बोल जाते हैं अब ये सच किस पर अटैक करता है ये तो वही जाने लेकिन एक बात तो है कि एक नेता तो ऐसा है जिसने खुलेआम यह बता दिया कि प्रदेश की आर्थिक हालात डांवाडोल हो चुकी है और उसके पीछे पार्टी द्वारा की गई घोषणाएं हैं लेकिन विजयवर्गीय जी आप यह जान लो की सरकार कौन सा अपनी जेब से पैसा दे रही है जनता का पैसा है लुटाते चलो, अपनी जेब से देना होता तो सौ बार सोचते जब अपनी जेब से कुछ जाना ही नहीं है तो काहे की चिंता और फिर और कर्ज तो मिल ही रहा है बजट से ज्यादा कर्ज हो गया उससे क्या फर्क पड़ता है। लेकिन एक बात अपन विजयवर्गीय जी को बता देते हैं कि बहुत ज्यादा सच बोलना भी राजनीति में ठीक बात नहीं है इसलिए ज्यादा सच न बोलें तो ज्यादा बेहतर होगा ।

मच्छर दुखी कुत्ते खुश
एक रिपोर्ट में ये बताया गया है कि मलेरिया के रोगी अस्सी फीसदी कम हो गए हैं यानी अब मच्छरों में वो दम नहीं रही कि इंसान को काट ले और वो मलेरिया से पीडि़त हो जाए, कहा तो यह भी जा रहा है कि दो सालों में मलेरिया जड़ से खत्म कर दिया जाएगा, अब बेचारे मच्छर करें तो करें क्या, वैसे भी मच्छरों का एक ही काम था लोगों को काटो, कानों में भिनभिनाओ और सीधा मलेरिया तक पहुंचा दो लेकिन अब लगता है उन्हें अपना बोरिया बिस्तर समेट के कहीं और जाना पड़ेगा, इधर कुत्ते भारी खुश है क्योंकि रेबीज के जो इंजेक्शन आए हैं वे नकली हैं यानी अगर कुत्ते ने आपको काटा है और आपने शायद ये सोचकर रेबीज का इंजेक्शन लगवा लिया कि अब मेरा कुछ नहीं होगा तो भूल जाओ इसलिए कुत्तों में भारी खुशी है कि हमारा काटा हुआ बच नहीं पाएगा। अपने को तो लगता है कि लोग बाग अब रेबीज का इंजेक्शन ना लगवा कर झाडफ़ूंक करवाने में ज्यादा यकीन रखेंगे क्योंकि जब रेबीज के इंजेक्शन नकली आ रहे हैं और उससे कोई फायदा नहीं है तो काहे को पैसा खर्च करो। झाडफ़ूंक करवा लो उसमें भी नहीं बचना है और इसमें भी नहीं बचना है। बहरहाल कुछ और कंपनियों के रेबीज इंजेक्शन की जाँच शुरू हो गई है देखना ये होगा कि और कितनी कंपनियों के रेबीज के इंजेक्शन नकली निकलते हैं।

सुपरहिट ऑफ द वीक
श्रीमान जी खूना-खच्चर होकर घर पहुंचे श्रीमती जी ने पूछा
‘क्या हो गया’
‘एक आदमी ने मुझे डंडों से मारा’
‘तो आपके हाथ में कुछ नहीं था क्या’ श्रीमती जी ने पूछा
‘था उस आदमी की बीबी का हाथ’ श्रीमान जी ने उत्तर दिया।
Author: Jai Lok







