
परितोष वर्मा
जबलपुर (जयलोक)। आज सुबह समाचार पत्रों के माध्यम से पर्यावरण की दृष्टि से और किसी भी शहर के पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए सुखद समाचार सामने आया। उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने साफ किया है कि इंदौर शहर में अब जिला कलेक्टर की ओर से नियुक्त ट्री ऑफिसर की अनुमति के बिना कोई भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। इंदौर शहर के लिए तो बहुत अच्छा निर्णय हुआ है लेकिन फिर हम जबलपुर वासियों के मन में यह ख्याल आया आखिर जबलपुर के पेड़ों ने ऐसा क्या गुनाह किया है। जो इन्हें इस प्रकार से काटने उजाडऩे के लिए लावारिस छोड़ रखा है। जबलपुर के ग्रामीण अंचल तो छोडि़ए शहर से लगे बहुत से इलाकों में विगत कुछ समय से बिना अनुमति या फिर विकास कार्यों के नाम पर दशकों पुराने जीवित पेड़ों को काटने के कार्य प्रकाश में आ चुके हैं।
न्यायालय में दायर याचिका में इस बात का उल्लेख किया गया था कि मध्य प्रदेश वृक्ष परीक्षण नगरीय क्षेत्र अधिनियम 2001 के तहत ट्री ऑफिसर की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। इसके बावजूद भी इंदौर में जिला प्रशासन ने वन अधिकारी को ट्री ऑफिसर बनाया है। न्यायालय ने सरकार को यह भी याद दिलाया कि 18 दिसंबर 2024 को राज्य सरकार को ट्री ऑफिसर नियुक्त करने के निर्देश दिए गए थे लेकिन अभी तक उसका परिपालन नहीं हुआ है ना ही अभी तक कोई अधिसूचना जारी हुई है इस पर कोर्ट ने अपनी नाराजगी भी व्यक्त की।
न्यायालय में चल रहे इस प्रकरण से जबलपुर के पर्यावरण प्रेमियों में भी जिले में मौजूद दशकों पुराने और कुछ तो सैकड़ो वर्ष पुराने पेड़ों को बचाने की नई उम्मीद जगी है। जबलपुर में भी पेड़ काटने के संबंध में रह रहकर सामने आने वाली मनमानियों को रोकने के लिए यह व्यवस्था सकारात्मक और कारगर साबित हो सकती है।

हमारे पूर्वजों की दी सौगात है हम एक पेड़ काटकर 10 लगाएंगे तो भी दो पीढिय़ों को इसका लाभ नहीं मिलेगा
सामान्य रूप से इस बात की भी चर्चा होती है कि आज जबलपुर को अगर पर्यावरण के मामले में हरियाली की सौगात मिली है सैकड़ो वर्ष पुराने पेड़ हमें अपनी छांव और फल दे रहे हैं तो यह हमारे पूर्वजों के सत्कर्म हैं जिनका लाभ हमें मिल रहा है। हमारे पूर्वजों के लगाये 100-150 साल पुराने पेड़ भी हमें अपने आशीष की छाव दे रहे हैं। पर्यावरण का संतुलन बना रहे हैं और इसमें ऐसे पेड़ भी हैं जो 30-40 साल पहले लगाए गए थे। आज एक सामान्य नियम बता दिया जाता है कि अगर विकास कार्य के नाम पर एक पेड़ काटा जाएगा तो उसके बदले 10 पेड़ लगाए जाएंगे। पहली बात तो 10 पेड़ों की जगह कनेर, गूलर जैसे झाडिय़ां वाले पेड़ लगाकर ठेकेदार कंपनियां सरकारी नियम को शुद्ध रूप से ठेंगा दिखाने का काम करती हैं। दूसरी महत्वपूर्ण और तार्किक एक बात यह भी है कि आज से 150 साल पहले 100 साल पहले, 50 साल पहले या 30 साल पहले हमारे पूर्वजों, बड़े बुजुर्गों ने जो पेड़ लगाए थे वह आज बड़े होकर इस लायक हैं कि हमें सांस भी दे रहे हैं, छावं भी दे रहे हैं, फल भी दे रहे हैं, प्रदूषण को दूर भी कर रहे हैं। लेकिन इन मोटे तने के छावंदार पेड़ों की हत्या कर उसके बदले हम 10 पौधे लगाने की रणनीति पर चल रहे हैं। एक तो यह पौधे सामान्य रूप से कभी पेड़ नहीं बन पाते और जब तक बनेंगे तब तक वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को भी इसका लाभ नहीं मिलेगा। और भविष्य के सालों में पर्यावरण प्रदूषण की स्थिति बहुत ही संकटग्रस्त हो जाएगी। निर्णय सरकार को और हमें भी लेना है कि विकास के नाम पर पेड़ों को बचाना है या पेड़ों को महत्व देते हुए विकास कार्यों की योजना बनानी है।

नगर निगम पाँच पेड़ लगवाने की शर्त का पालन नहीं करवाता
नगर निगम द्वारा शहर में भवन निर्माण के लिए जो नक्शे स्वीकृत किए जाते हैं उसमें एक शर्त यह भी होती है कि भवन स्वामी को पांच पेड़ लगाना पड़ेंगे। लेकिन नगर निगम का यह नियम सिर्फ कागजों तक सीमित है। नगर निगम की ओर से कभी भी इस बात की जांच नहीं की जाती है कि जिस व्यक्ति का नक्शा मंजूर हुआ है उसने पांच पेड़ लगाए हैं या नहीं। इस मामले में नगर निगम ढीला बना हुआ है। नगर निगम यदि सख्ती से नए बनने वाले भवन में पांच पेड़ लगाने का पालन करवाने लगे तो शहर के पर्यावरण में पर्याप्त सुधार नजर आएगा।

Author: Jai Lok







