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लड़ेंगे वो, क़ीमत हम चुकाएंगे: युद्ध की छाया में भारतीयों की जेब और भारत अर्थव्यवस्था दोनों संकट में

अमित चतुर्वेदी

(जयलोक)। दुनिया इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि उसका असर हर देश की अर्थव्यवस्था, समाज और आम आदमी की जेब तक पहुंच चुका है। रूस-यूक्रेन युद्ध तो चार साल से लगातार जारी है, जिसने वैश्विक व्यवस्था को पहले ही हिला दिया था, और अब मध्य पूर्व में ईरान-इसराइल-अमेरिका के बीच छिड़ा ताजा संघर्ष ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। यह केवल गोलियों और मिसाइलों की लड़ाई नहीं है, बल्कि ऊर्जा संसाधनों, व्यापार मार्गों और वैश्विक वर्चस्व की लड़ाई है, जिसमें लगभग हर देश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हो गया है।
युद्ध का सबसे त्वरित और गहरा असर वैश्विक आपूर्ति प्रणाली पर पड़ा है। तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल ने दुनिया भर में महंगाई को बढ़ावा दिया है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए 85-90त्न आयात पर निर्भर हैं, के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। कच्चे तेल की कीमतें बढऩे से परिवहन महंगा होता है, उत्पादन लागत बढ़ती है और अंतत: हर वस्तु का दाम ऊपर चला जाता है। बाजार में छोटी-छोटी चीजें भी पहले से कहीं अधिक महंगी हो गई हैं।

पिछले तीन हफ्तों में ईरान-इसराइल-अमेरिका संघर्ष के कारण भारत में शेयर बाजार से अनुमानित 25-34 लाख करोड़ रुपये तक की निवेशक संपत्ति मिट चुकी है। यह नुकसान मुख्य रूप से तेल की कीमतों में उछाल, बाजार की अस्थिरता और निवेशकों के भय से हुआ है। युद्ध में शामिल देशों, अमेरिका, इसराइल और ईरान पर अभी तक अरबों डॉलर का खर्च आ चुका है, जैसे अमेरिका पर पहले कुछ दिनों में ही 11 बिलियन डॉलर से अधिक और इसराइल पर साप्ताहिक 3 बिलियन डॉलर के आसपास। लेकिन युद्ध की असली आर्थिक कीमत युद्ध खत्म होने के बाद सामने आएगी, और वह कई गुना बढ़ सकती है। यह पूरी दुनिया की जनता चुकाएगी, क्योंकि ये देश तेल, गैस और निर्यात होने वाली अन्य वस्तुओं पर करों और कीमतों में बढ़ोतरी करके इस खर्च की भरपाई करेंगे। लड़ेंगे वो और कीमत चुकाएंगे हम, यह कड़वी सच्चाई आज स्पष्ट हो रही है। घर से दिहाड़ी कमाने निकला एक मजदूर जब नाश्ते के समय समोसे की कीमत 10 की बजाय 15 रुपये चुका रहा है, या फिर लोन लेकर 800 स्क्वायर फीट के प्लॉट में मकान बना रहा एक निम्न मध्यम वर्गीय भारतीय 40 रुपये स्क्वायर फीट वाली टाइल्स की कीमत 60 रुपये चुका रहा है, तो वह ये कीमत इनके विक्रेताओं के माध्यम से युद्धोन्मादी देशों के शासकों को ही चुका रहा होता है।

यह केवल आर्थिक गणित का मामला नहीं है। भारत में कीमतों का बढऩा अक्सर स्थायी हो जाता है। एक बार लागत बढऩे के बहाने दाम चढ़ा दिए जाएं, तो उन्हें नीचे लाना मुश्किल होता है। इस प्रक्रिया में सबसे अधिक दबाव मध्यम और निम्न वर्ग पर पड़ता है, जो पहले से ही सीमित आय में जीवनयापन कर रहे हैं।

कमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी और काला बाजारी ने संकट को और जटिल बना दिया है। छोटे दुकानदार, रेस्तरां संचालक और निर्माण क्षेत्र के लोग अपनी लागत नियंत्रित नहीं कर पा रहे। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है। समोसे की कीमत बढऩा सिर्फ एक नाश्ते का महंगा होना नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ते दबाव का संकेत है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इन युद्धों के बाद एक नई व्यवस्था न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के उभरने की चर्चा तेज है। पुराने शक्ति संतुलन बदल रहे हैं, नए गठबंधन बन रहे हैं और शक्ति का केंद्र एशिया की ओर खिसक रहा है। रूस-यूक्रेन का लंबा संघर्ष और अब ईरान-इसराइल-अमेरिका का ताजा युद्ध मिलकर दुनिया के पुराने समीकरणों को तोड़ रहे हैं।

इस नई व्यवस्था में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत न किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल है और न ही अलग-थलग। उसकी संतुलित विदेश नीति उसे विश्वसनीय साझेदार बनाती है। बड़ा उपभोक्ता बाजार और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था वैश्विक निवेश को आकर्षित कर रही है। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
पिछले कुछ वर्षों में शेयर बाजार में नए निवेशकों की भागीदारी बढ़ी थी, खासकर निम्न-मध्यम वर्ग से। कोरोना के बाद उन्होंने अपनी बचत को बेहतर भविष्य की उम्मीद में लगाया। लेकिन युद्धजनित अस्थिरता ने उनके भरोसे को झकझोर दिया है। कई लोग आज घाटे में हैं, जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव गहरा है। जब आम आदमी को लगता है कि उसकी मेहनत का पैसा सुरक्षित नहीं, तो उपभोग और निवेश दोनों प्रभावित होते हैं, जो आर्थिक विकास को धीमा करता है।

भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को झेलते हुए स्थिर बनी हुई है, लेकिन यह स्थिरता नाजुक है। यदि युद्ध लंबा खिंचा और ऊर्जा कीमतें ऊंची रहीं, तो महंगाई नियंत्रित करना कठिन होगा। वैश्विक मांग में कमी से निर्यात भी प्रभावित हो सकता है।
फिर भी अवसर मौजूद हैं। वैश्विक कंपनियां आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविध बनाने की कोशिश कर रही हैं। भारत इस बदलाव का लाभ उठा सकता है, बशर्ते नीतियां, बुनियादी ढांचा और कौशल विकास को मजबूत किया जाए।

अंतत: यह समय संकट का भी है और पुनर्संरचना का भी। युद्ध के बाद दुनिया पहले जैसी नहीं रहेगी। आर्थिक और राजनीतिक समीकरण बदलेंगे, और हर देश को अपना स्थान नए सिरे से तय करना होगा। भारत के लिए यह निर्णायक क्षण है, सही निर्णय नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं, गलत कदम लंबे संघर्ष की ओर धकेल सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण है कि नीतियां केवल आंकड़ों पर नहीं, बल्कि आम आदमी के अनुभवों और पीड़ा को ध्यान में रखकर बनाई जाएं।

क्योंकि किसी भी अर्थव्यवस्था की असली ताकत उसके नागरिक होते हैं। यदि वे दबाव में हैं, तो कोई विकास स्थायी नहीं हो सकता। आज का समय चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यदि हम इन युद्धों से सबक लेकर आत्मनिर्भरता को मजबूत करें, नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन और ग्रीन हाइड्रोजन) में तेज निवेश बढ़ाकर आयातित ईंधन पर निर्भरता घटाएं, और आम आदमी के हितों को प्राथमिकता दें, तो भारत नई विश्व व्यवस्था में अपनी मजबूत जगह बना सकता है।
(लेखक स्वतंत्र विचारक हैं। )

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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