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प्रलय से भी अपने भक्तों की रक्षा करने वाले : श्री महालयेश्वर महादेव

डॉ. नवीन आनंद जोशी

(जयलोक)। एक बार कैलाश की दिव्य निस्तब्धता में माता पार्वती के मन में एक गहन जिज्ञासा जागृत हुई। उन्होंने करबद्ध होकर भगवान शिव से पूछा—हे प्रभु! यह संपूर्ण सृष्टि, जो हम देखते और अनुभव करते हैं — क्या यह सब आप ही से उत्पन्न हुआ है? और क्या अंतत: यह सब आप में ही समाहित हो जाता है?
भोलेनाथ मंद मुस्कान के साथ बोले—देवि! महाकाल वन में मेरे जिस स्वरूप की प्रतिष्ठा है, उसे महालयेश्वर कहा जाता है। यह शिवलिंग केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है।इसी से ब्रह्मा की सृजन शक्ति प्रकट होती है, विष्णु की पालन शक्ति संचालित होती है, और समस्त देवी-देवताओं की दिव्य शक्तियाँ अभिव्यक्त होती हैं। सृष्टि का उद्गम और लय भगवान शिव आगे कहते हैं—पंचमहाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश;मनुष्य की बुद्धि, प्रज्ञा, धृति, स्मृति, ख्याति, लज्जा और सरस्वती जैसी दिव्य शक्तियाँ —ये सभी इसी महालयेश्वर शिवलिंग से उत्पन्न होती हैं।और जब काल की गति अपने चरम पर पहुँचती है, जब प्रलय आता है — तब यह समस्त सृष्टि, बिना किसी अपवाद के, पुन: इसी शिवतत्व में विलीन हो जाती है।यह कथन केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का गूढ़ सत्य है—जिससे सृष्टि उत्पन्न होती है, वही उसका अंतिम आश्रय भी होता है।शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि महाप्रलय के समय भी भगवान शिव अपने भक्तों को कभी त्यागते नहीं।वे स्वयं मत्स्य रूपी नाव के माध्यम से अपने शरणागतों को सुरक्षित काशी — मोक्ष की नगरी — तक पहुँचाते हैं।इस प्रसंग में एक गहरा आध्यात्मिक संदेश निहित है—यदि मनुष्य का आचरण शुद्ध हो, श्रद्धा अटूट हो और वह शिव की शरण में रहे,तो काल, मृत्यु और प्रलय भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। त्रिलोक विजय का वरदानपुराणों में स्पष्ट उल्लेख है कि—जो भक्त श्रद्धा औरविधि-विधान से श्री महालयेश्वर महादेव का पूजन करता है, वह त्रिलोक विजयी बनता है।यह विजय बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होती है—भय पर विजय मृत्यु के भय पर विजयऔर जीवन की अनिश्चितताओं पर विजय होती हैं।श्री महालयेश्वर महादेव मंदिर उज्जयिनी में महाकाल वन क्षेत्र के अंतर्गत, मगरमुहा गली में स्थित है, जो शहीद भगतसिंह उद्यान के समीप है।यह स्थान भले ही बाह्य रूप से सरल और शांत प्रतीत होता हो, परंतु इसकी आध्यात्मिक ऊर्जा अत्यंत प्रखर और दिव्य है।विशेष रूप से—श्रावण मास,भाद्रपद मास,पितृ पक्ष। इन अवसरों पर यहाँ श्रद्धालुओं का अपार सैलाब उमड़ता है। प्रतिदिन भी बड़ी संख्या में भक्त यहाँ आकर जलाभिषेक, पूजन और ध्यान करते हैं।आज का युग भागदौड़, अस्थिरता और मानसिक अशांति से भरा हुआ है।

ऐसे समय में महालयेश्वर महादेव का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है—शिव ही प्रारंभ हैं, शिव ही अंत हैं — और शिव ही वह आश्रय हैं जहाँ हर भय समाप्त हो जाता है। हमारी जिम्मेदारी महाकाल के भक्तों का यह कर्तव्य है कि वे इस दिव्य परंपरा और ज्ञान को आने वाली पीढिय़ों तक पहुँचाएँ।जब पितर प्रसन्न होंगे और संतान संस्कारवान बनेगी, तभी यह सनातन धारा अविरल बनी रहेगी।महालयेश्वर महादेव केवल एक मंदिर या शिव ि लंग नहीं, बल्किसृष्टि के उद्गम, संरक्षण और लय का जीवंत प्रतीक हैं।उनकी शरण में जाने वाला भक्त न केवल जीवन के संकटों से मुक्त होता है,बल्कि प्रलय जैसी महाविपत्ति में भी सुरक्षित रहता है। नम: शिवाय।हर हर महादेव। क्रमश: यात्रा जारी।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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