
(जय लोक)। प्रदेश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार में आज सर्वे आया है जिसमें कहा गया है कि भारत में 30 साल तक की उमर के नौजवान सबसे ज्यादा दुखी हैं। ये सर्वे जीवन के मूल्यांकन, सकारात्मक इमोशन और नकारात्मक इमोशन के आधार पर तैयार किया गया है ये सर्वे। अपना मानना तो ये है कि सर्वे की जरूरत ही क्या थी ये तो बच्चा-बच्चा जान रहा है कि किस देश का युवा सबसे ज्यादा दुखी और परेशान है। अब आप ही बताओ जिसके पास बेरोजगारी हो, रोजगार का दूर-दूर तक पता ना हो वो दुखी नहीं होगा तो क्या ढोल बजा के नाचेगा? हर राजनीतिक दल युवाओं के लिए तरह-तरह की घोषणा कर रहा है चुनाव जो है, कोई बेरोजगारी दूर करने की बात कर रहा है तो कोई लाखों रोजगार एक झटके में देने की बात कर रहा है ऐसे तमाम वायदे भारत का युवा लंबे समय से सुनता और देखता आ रहा है, लेकिन जब भी देखो उसके हाथ में आई शून्य ही मिलती है। बड़ी-बड़ी डिग्री ले लो, बाप महतारी के पैसे खर्च करवाओ उसके बाद भी बेरोजगार बने रहो इससे ज्यादा कष्ट और क्या हो सकता है दुखी इसलिए भी है कि नौकरी नहीं है, नौकरी नहीं है तो ब्याह नहीं हो सकता, हर मां-बाप अपनी लडक़ी के लिए किसी अच्छे खासी नौकरी वाले या रोजगार वाले लडक़े को ढूंढने का प्रयास करता हैं जब ब्याह नहीं होगा तो बाल बच्चे नहीं होंगे, बाल बच्चे नहीं होंगे तो परिवार कैसे आगे बढ़ेगा, परिवार आगे नहीं बढ़ेगा तो समाज कैसे आगे बढ़ेगा और जब समाज आगे नहीं बढ़ेगा तो देश कैसे आगे बढ़ सकता है ये तमाम चीजें हैं जो इस युवा को दुखी किए हुए हैं। धंधा करने की सोचो तो पैसा लगता है बाप रिटायर हो चुका है उससे पैसा मांगने की हिम्मत नहीं क्योंकि उसका पैसा उसकी बुढ़ापे की सबसे बड़ी लाठी है छोटा-मोटा धंधा करना डिग्री की बेइज्जती करना है अब ऐसे में देश का युवा करें तो क्या करें? राजनीति में जाओ तो बरसों लग जाते हैं कहीं ऊपर पहुँचने में क्योंकि नेताओं के बेटी बेटियाँ, भांजे भंजियाँ, भतीजे पहले से लाइन में लगे हैं जिंदगी भर दरी फट्टा उठाते रहो और जब मौका आए तो नेताजी का बेटा टिकट पा ले, अब जब चारों तरफ से दुख ही दुख है तो दुख क्यों नहीं होगा अब यदि इस गाने पर भरोसा कर लिया जाए ‘दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना, जहां नहीं चेना वहां नहीं रहना’ तो भैया कहां चले जाएं जाने के लिए भी तो पैसा चाहिए, पैसा कहां से आता है नौकरी से और रोजगार से जब तक वो नहीं है तब तक कुछ होने वाला नहीं, इसलिए देश के तमाम युवा मिलजुलकर एक ही गीत गा रहे हैं ‘राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है दुख तो अपना साथी है’
सूर्य ग्रहण में भी धंधा
अपने भारत और अमेरिका में यही तो फर्क है अपने यहां सूर्य ग्रहण लगा तो हर आदमी अपने घर के अंदर छिपकर बैठ जाता है कि ग्रहण की किरणें उस पर ना पड़ जाए। बड़े-बूढ़े भी कह गए कि ग्रहण में बाहर नहीं निकलना चाहिए और अगर निकल भी गए तो सूरज की तरफ तो बिल्कुल ही मत देखना और जब ग्रहण खत्म हो तो सूतक से मुक्ति पाने के लिए खूब अच्छे से नहाना धोना, पूरे घर में गंगाजल या नर्मदा जल छिडक़ना ताकि उसका कोई दुष्प्रभाव ना पड़े लेकिन अमेरिका को तो देखो पिछले दिनों पड़े सूर्य ग्रहण को देखने के लिए मेक्सिको और उत्तरी अमेरिका में करीब 50 लाख लोग पहुँच गए जहां यह ग्रहण दिखाई देने वाला था कुल मिलाकर इस ग्रहण में 13000 करोड़ का कारोबार हो गया। जिन विमान की उड़ान ग्रहण के समय होने वाली थी उसमें खिडक़ी वाली सीट ब्लैक में बिकने लगी, विमान कंपनियों ने तीन गुना किराया बढ़ा दिया और लोग खिडक़ी वाली सीट में बैठने के लिए तिगुना पैसा देने तैयार हो गए कि उन्हें सूर्य ग्रहण दिखाई दे जाए। ना तो उन्हें सूतक लगा ना वे घर जाकर नहाए, ना उन्होंने गंगाजल छिडक़ा। वैज्ञानिक लोग तो अमेरिका कनाडा में रहते हैं उन्हें यह सब क्यों नहीं समझ में आता यह भी अपनी समझ से बाहर है अपना तो मानना ये है कि अमेरिका वाले इसलिए अमीर हो गए क्योंकि वो हर चीज में धंधा खोज लेते हैं जो देश सूर्य ग्रहण में 13000 करोड़ का कारोबार कर सकता है वो अब चंद्र ग्रहण में भी धंधा करने की बात सोचेगा ना कहो इसमें भी हजारों करोड़ों का धंधा हो जाए, मानते हैं अमेरिका और उनके निवासियों को।
गिरगिटों ने देश छोड़ दिया
पहले हर जगह आपको पेड़ों पर गिरगिट दिखाई दिख जाते थे कभी वह पीले रंग का रहता था तो कभी पत्तियों के बीच अपना रंग हरा कर लेता था लेकिन बरसों हो गए अपन गिरगिटो को देखने के लिए तरस गए जंगल गए, पेड़ पर चढ़ गए, झाडय़िों में झांका लेकिन एक गिरगिट नजर नहीं आया बाद में काफी खोजबीन के बाद ये पता लगा कि गिरगिटों ने अपना देश ही छोड़ दिया और वे किसी दूसरे देश में शिफ्ट हो गए हैं, क्योंकि उनका मानना है कि राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपना रंग बदलने में उनको भी पीछे छोड़ दिया है इसलिए तमाम गिरगिटों ने एक सभा की और सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि अब देश में हमारी जरूरत नहीं बची, लोग बात कहते थे कि वो तो गिरगिट जैसा रंग बदलता है अब हमारी जगह यह कहा जाएगा कि वो नेता जैसा रंग बदलता है हम तो कम से कम रंग ही बदल रहे थे जिससे किसी को कोई नुकसान नहीं था लेकिन नेता तो अपनी पार्टी बदल रहा है वह पार्टी जिसने उसे सब कुछ दिया लेकिन जैसे ही पार्टी के बुरे दिन आए वह तुरंत कूद कर दूसरी पार्टी में चला गया जिसके अच्छे दिन चल रहे हैं तो जब ऐसे ऐसे लोग इस देश में हो तो फिर हमारी जरूरत ही क्या है? इसलिए ये तमाम गिरगिट एक गीत गाते हुए यहां से पलायन कर गए हैं ‘कर चले हम फिदा जानो तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’
सुपरहिट ऑफ द वीक
श्रीमान जी और श्रीमती जी में जबरदस्त झगड़ा चल रहा था
‘मैं पूरा घर संभालती हूं, बच्चों को संभालती हूं, किचन संभालती हूं तुम आखिर क्या करते हो’ श्रीमती जी ने चिल्ला कर कहा
‘मैं खुद को संभालता हूं तुम्हारी नशीली आंखें देख कर’ श्रीमान जी ने उत्तर दिया
‘आप भी ना, चलो बताओ आज क्या बनाऊं आपकी पसंद का’ और एक ही वाक्य में सारा झगड़ा खत्म हो गया।

Author: Jai Lok







