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चैनलों के चहेते संजीव चौधरी- शून्य से सौ बनने की मिसाल

 (जयलोक)।  संजीव चौधरी का जन्म 8 जनवरी, 1967 में छायाकार महेंद्र चौधरी के घर पर हुआ। जब संजीव अपने किशोर  वय में पहुँचे ही पहुँचे थे, कि उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि पुश्तैनी  संपदाएं उजड़ चुकी हैं। कर्ज का बोझ पिता पर भारी हो चला है। फोटोग्राफी का जितना काम रोज आता है, उसी से घर चलता है। तो छठवीं कक्षा में पढऩे वाले संजीव ने अपने पिता के काम में हाथ बंटाना आरंभ कर दिया था। वे फोटो उतारने बाहरी दुनिया में खपते और संजीव स्कूल से आकर डार्क रूम के अंधेरे में काली-सफेद फोटो को उजला बनाने के काम में लग जाते। जब उनके दोस्त अपने हाथों में गेंद या बल्ला थामे, संसार के दुखड़ों से बेपरवाह होकर, बचपन के उल्लास का मजा ले रहे थे, तब संजीव ने खेल के मैदान को भूलकर घर की आपदाओं के सामने ताल ठोक रखी थी। फिर एक दिन अचानक ही पता चला कि पिता को कैंसर नाम वाले महारोग ने अपनी चपेट में ले लिया है। डॉक्टरों ने पिता को फौरन से पेशतर  बंबई ले जाकर इलाज कराने की सलाह दे दी थी। पिता अविचलित रहे और कहा, अपनी माँ को रोग के बारे में मत बताना। घर में कुल 285 रुपये थे, उन्हीं को लेकर संजीव पिता का इलाज कराने बंबई रवाना हो गए थे। ऑपरेशन  कराकर जबलपुर लौटे तो सिर पर कर्ज का भारी बोझ भी था। पिता अशक्त  हो चुके थे। घर चलाने की जिम्मेदारी संजीव पर पहले भी थी, पर अब पूरी की पूरी आ गई थी।

संजीव आठवीं कक्षा में पहुंच चुके थे। पिता के कलात्मक शौक को ही अपनी आजीविका का साधन बना लेने के सिवा और कोई चारा न था। माँ समझदार और गंभीर महिला थीं। वे घर की आर्थिक दशा का पता किसी को भी न लगने देती थीं। जो और जितना होता था ,उसी में घर चलाती रहती थीं। संजीव ने प्रोफेशनल तरीके से काम शुरू  किया। कोई ग्राहक आता तो वे उससे कहते कि पैसे अभी देने होंगे और काम करके शाम तक वे उन्हें सौंप देंगे। यह बाजार का ढंग न था, पर बाजार को अपने ढंग से चलाने के हठ के साथ काम न करते तो हालात और भी बुरे होते। ग्राहक से मिले रुपयों से सबसे पहले पिता के लिए दवाएं लायी जातीं, बचे पैसों से घर खर्च का इंतजाम  होता।  संजीव की उतारी पहली तस्वीर नवभारत पत्र के 15 मार्च,1980 के अंक में छपी। तब वे मात्र तेरह साल के थे। उसके दो साल बाद उन दिनों की सबसे लोकप्रिय पत्रिका ‘धर्मयुग’ में 16 मई, 1982 के अंक में ‘आपबीती कहानी: किशोरों  की जबानी’ स्तंभ में संजीव के जीवन की कथा और फोटोग्राफी  कला के बारे में आलेख छपा। संजीव चौधरी ने अपनी कला को निखारने के लिए बंबई जाकर पढ़ाई की। डिजिटल कैमरे  का संचालन, कम्पयूटर का ज्ञान ओर फोटो शॉप का उपयोग करना सीखा। हिंदुस्तान टाइम्स  के जबलपुर ब्यूरो में फोटोग्राफर हुए। एपी, पीटीआई आदि समाचार एजेंसियों के लिए काम किया।  संजीव ने समय के अनुरूप अपने को ढाल लेने का रवैया अपनाया। वोटर आईडी बनाने का नया काम आया और सरकारी लोगों को भी ठीक  से पता न था, कि इसके लिए क्या करना होगा। संजीव ने उन्हें आश्वस्त  किया कि चिंता न करें, सब हो जाएगा। सब हो जाएगा, कह तो दिया था, लेकिन खुद असमंजस में थे कि न जाने कैसे होगा। पर राह बन ही गई ! कैमरे का प्रयोग ही तो करना था। कुछ नए प्रयोग किए और काम बन गया। बड़ा काम था, चार पैसे हाथ में आए। उससे कुछ कर्ज पटाया और कुछ घर चलाने के लिए मां को दिए। ऐसे कठिन वक़्त में पिता के मित्रों ने बहुत मदद की। जबलपुर विकास प्राधिकरण के चेयरमेन डॉ केएल जैन, जबलपुर पत्रकार संघ  के अध्यक्ष अजित वर्मा, नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी सच्चिदानंद शेकटकर और पुरुषोत्तम संघी जैसे नाम वे पूरे आदर के साथ लेते हें। सिविक  सेंटर में जेडीए ने दूकानें बनायी थीं। वे अलाट की जा रही थीं, डॉ जैन ने एक दूकान दिला दी। उन दिनों संजय चौधरी जबलपुर के पुलिस अधीक्षक थे। उन्होंने अपने विभाग का फोटोग्राफी का काम दिलाया। एक साथ पचास हजार रुपयों का भुगतान मिला। बड़ा सहारा बना। उधार भी चुका और घर की दशा ने भी करवट बदली।
फिर जबलपुर में 22 मई, 1997 की रात में भूकंप आया। भोपाल से आज तक के प्रमुख पत्रकार राजेश  बादल ने जबलपुर के पुलिस अधीक्षक को फोन किया कि क्या कोई ऐसा पत्रकार है, जो भूकम्प के फोटो तुरंत भेज सके। पुलिस अधीक्षक ने संजीव चौधरी का नाम लिया। संजीव को सूचना भी उन्होंने ही दी। जब पूरा नगर भयभीत होकर घरों में दुबका हुआ था, तब संजीव ने अपना वीएचएस कैमरा उठाया और तस्वीरें लेने के लिए अपने दोस्त प्रदीप परिहार के संग निकल पड़े। रात को 12 बजे एक टैक्सी से फोटोग्राफ भोपाल रवाना किए।
उनकी तस्वीरें मय रिपोर्ट के, अगले ही दिन रात में आठ बजे टीवी के न्यूज चैनलों जैसे ‘आज तक’, ‘स्टार न्यूज’ और एनडीटीवी पर दिखायी गईं। अगले ही दिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जबलपुर के दौरे पर आए। दूसरे दिन की तस्वीरें संजीव ने उनके माध्यम से भोपाल रवाना की थीं। ऐसे त्वरित और तत्परतापूर्ण काम के कारण ही उनका नाम हुआ। उन दिनों के जाने-माने पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह ने भूकम्प स्टोरी को चैनल पर प्रस्तुत किया था। बाद में दुनिया भर के दूसरे तमाम चैनलों ने आज तक से ही भूकम्प वाली खबर उठायी और दिखायी। कीर्ति मिली। चैनल संपादकों के लाड़ले बने। उसी स्टोरी के चलते ही संजीव प्रणव रॉय और राजकुमार केसवानी के संपर्क में आए। पत्रकार संघ के अध्यक्ष अजित वर्मा ओर सच्चिदानंद शेकटकर  के सहयोग से भूकम्प वाली तस्वीरों की प्रदर्शनी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को दिखायी गई। देश  के दूसरे इलाकों में भी उसे प्रदर्शित  किया गया था।  संजीव की जिस दूसरी स्टोरी ने देश स्तर पर हंगामा मचाया वह बालाघाट की एक पंचायत में हुए महिला के साथ गेंगरेप की स्टोरी  थी। मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रदेश  में जोर-शोर के साथ पंचायती राज व्यवसथा को लागू किया था, इसलिए पंचायत भवन में हुए इस गेंगरेप  स्टोरी का अपना जलजला था। दिल्ली के पत्रकार राजदीप सरदेसाई को संजीव ने सूचना दी। उन्होंने तुरंत उस स्टोरी को अपने चैनल पर चलाया और उनके माध्यम से स्टोरी देश  की सीमाओं से बाहर तक चली गई थी। स्टोरी ने वाह-वाही तो दिलायी , पर दबाव भी आने लगे। सरकार की तरफ से कहा गया कि गेंगरेप की खबर वैसी नहीं है, जैसी बतायी जा रही है। सरकार ने पत्रकारों की एक टीम  को बालाघाट भेजा, ताकि वे स्टोरी  को दूसरे एंगल से प्रचारित करें।
चैनल ने संजीव से कहा कि वे एक बार फिर बालाघाट जाएं। बालाघाट में सब जमा हुए। संजीव ने फिर नये तथ्यों के साथ अपनी स्टोरी की पुष्टि की। अब वे राष्टीय स्तर पर पहचाने जाने लगे। तब चैनल पर एक खबर के चलने पर 4500 रुपये मिला करते थे। इससे संजीव को बहुत राहत मिली।  घर एक बार फिर मजबूत हुआ।  एक और स्टोरी है जिसे वे लंबे अरसे वाले अंतराल से चलाकर एक धारावाहिक न्यूज स्टोरी  की नयी विधा ही खड़ी कर रहे हैं। हुआ यह था कि कान्हा अभयारण्य में तीन बाघ शावकों  की मां मर गई।शावक  अपनी माता से ही शिकार  करना सीखते हैं, माता के अभाव में वे शिकार करना नहीं सीख पाए थे, तो वे खुद ही कहीं आखेट न हो जाएं, इसलिए वनविभाग के अफसरों ने उन्हें पिंजरे में बंद करवा दिया था। उन्हें वहीं भोजन दिया जाता था। इस घटना की सूचना संजीव को बालाघाट के अतुल वैद्य और अभय कोचर ने दी। संजीव गए और स्टोरी तैयार की। एनडीटीवी ने खबर चलायी। सरकार ने इस बारे में चुप्पी साध ली।
बाघ शावक को दो साल बाद एनक्लोजर में छोड़ दिया गया। उनमें से दो मादा और एक नर शावक था। मादा बाघ शावक तो आखेट करना सीख गए थे, पर नर शावक नहीं सीख पाया था। उन्हें पन्ना के जंगल में छोड़ दिया गया। अब तक छह साल का अरसा बीत चुका था। संजीव ने पन्ना जाकर शावकों  की जीवन लीला पर अगली स्टोरी की। पन्ना में उनके 18 बच्चे हुए और बाघों की आबादी में उल्लेखनीय इजाफा हुआ।  इन स्टोरीज पर 2011 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संजीव चौधरी को 50 हजार रुपयों वाला अमृता देवी विश्नोई  वन्यजीव रक्षा पुरस्कार प्रदान किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने रूम टू रीड कार्यक्रम के तहत उस स्टोरी पर ‘तीन बच्चे’ शीर्षक से कार्टॅन बुक छापी और एक लाख किताबें बच्चों में बांटी। संजीव के लिए यह गौरव की बात बनी।
संजीव अपने परिवार के पुराने वैभव को फिर से लौटा लाए हैं। गाड़ी, बंगला और सभी जरूरी उपकरण उनके परिवार के पास हैं। इनके साथ शोहरत भी। संजीव अपने दम पर शून्य  से सौ बनने की मिसाल हैं।
प्रणाम संजीव चौधरी!
    प्रणाम जबलपुर!!

Jai Lok
Author: Jai Lok

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