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बाइडेन अगर नेता है तो ‘डिमेंशिया’ होना तो जरूरी है न…कहो तो कह दूँ

चैतन्य भट्ट
एक खबर आई है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन का ‘डिमेंशिया’ का टेस्ट होने वाला है, डिमेंशिया एक ऐसी बीमारी है जिसे हम भूलने की बीमारी कहते हैं। बताया जाता है कि वे अपनी ही पार्टी के लोगों के नाम भूल जाते हैं इसलिए उनका डिमेंशिया टेस्ट करवाना जरूरी हो गया है, अपना मानना तो ये है कि जो भी नेता होता है उसको डिमेंशिया की बीमारी उसी वक्त लग जाती है जब वो नेतागिरी में प्रवेश करता है और फिर आजकल तो हर एक को डिमेंशिया की बीमारी हो गई है, सरकारें तमाम योजनाओं का भूमि पूजन करती हैं, बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है उसके बाद वो भूल जाती है कि उसने क्या घोषणाएं की थी और कहां का भूमि पूजन किया था, नेता तो इससे और आगे बढक़र हो गए हैं जब चुनाव होता है तो मतदाता के दरवाजे पर जाकर तमाम तरह के वायदे करते हैं कि बस एक बार आप चुनाव जिता दो, मैं ऐसा कर दूंगा, मैं वैसा कर दूंगा लेकिन जैसे ही वे चुनाव जीतते हैं उनकी डिमेंशिया की बीमारी अपने पूरे शबाब पर आ जाती है और वे भूल जाते हैं कि उन्होंने मतदाताओं से क्या वादे किए थे। इधर जनता को तो भूलने की बीमारी बहुत पुरानी है सरकारों के, नेताओं के जो वादे होते हैं उनको भूलने में उसे समय नहीं लगता वो ये भी भूल जाता है कि उसने जिस पार्टी के उम्मीदवार को वोट दिया था उस पार्टी का नेता आजकल कौन सी पार्टी में आमद रफ्त कर रहा है। सरकारी अफसर का भी यही हाल है आप लाख एप्लीकेशन देते रहो उसे याद नहीं रहता कि किसकी समस्या क्या है। आजकल तो हालत ये है कि बेटा अपने उस मां बाप को भूल जाता है जिसने उसको पढ़ा लिखा कर इतना बड़ा किया, वो अपनी बीवी के साथ उनको भूलकर कब मां-बाप से अलग हो जाता है ये भी उसे याद नहीं रहता, यानी चोतरफा ही डिमेंशिया की बीमारी फैल रही है, लोग बात तो कहते थे कि कोरोना बहुत खतरनाक है एक से दूसरे को लग जाता है लेकिन अपने को तो लगता है कि कोरोना से ज्यादा भयानक बीमारी डिमेंशिया की है जिसका कोई इलाज नहीं बचा है। अपने हिसाब से तो स्टूडेंट भी डिमेंशिया के मरीज हो गए हैं जो पढ़ते हैं वो एग्जाम के टाइम भूल जाते हैं जितने सवालों के उत्तर रात भर रट्टा मार-मारकर याद करके आते हैं पेपर आते ही सारे सवालों के उत्तर न जाने कहां गायब हो जाते हैं, अब आप खुद ही समझ लो कि जब हर तरफ  डिमेंशिया के मरीज है तो फिर बेचारे अकेले बाइडेन की ही डिमेंशिया की जांच काहे के लिए हो रही है और फिर अपने बाइडेन साहब की उम्र भी तो देखो कहते हैं ना कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है सोचने समझने की शक्ति कम होती जाती है यही उनके साथ हो रहा है अब आप उसको डिमेंशिया का नाम क्यों ना दे दो।
ऐसे आते हैं बुरे दिन
एक जमाने में जिस कांग्रेस पार्टी का पूरे देश में बोलबाला था पिछले लंबे समय से उसके बहुत बुरे दिन चल रहे हैं एक कहावत है कि जब बुरे दिन आते हैं तो चारों तरफ से आते हैं, पार्टी के बड़े-बड़े नेता पार्टी को छोडक़र दूसरी पार्टी की गोद में जाने के लिए तैयार हैं जबकि इस पार्टी ने ही उन्हें पता नहीं क्या-क्या दिया है लेकिन जब बुरा वक्त आता है तो परछाई भी साथ छोड़ देती है ऐसा ही कुछ कांग्रेस के साथ भी हो रहा है वैसे ही बेचारी पार्टी गरीबी में अपनी रोजी-रोटी चला रही है उस पर से आयकर विभाग ने उसके खाते फ्रीज कर दिए हाल ये हो गया कि बिजली का बिल, कर्मचारियों की तनख्वाह, पार्टी का खर्चा निकालना मुश्किल हो रहा है जो लोग राजनीतिक पार्टियों को चंदा देते हैं उन्होंने भी कांग्रेस से मुंह मोड़ लिया है और अपनी पूरी थैली भारतीय जनता पार्टी की तरफ  खोल कर रख दी है। बिना पैसे के तो एक घर भी नहीं चल पाता इतनी बड़ी पार्टी चले तो चले कैसे? इधर ये हाल है कि जिन नेताओं पर पार्टी को भरोसा था वे भी उसे ठेंगा दिखाकर ऐन वक्त पर भाग खड़े हो रहे हैं। वक्त वक्त की बात है एक जमाना वो भी था जब लोग कांग्रेस में आने के लिए तरसते थे अब हाल ये है कि पार्टी का हर छोटा बड़ा नेता ये सोच रहा है कि कितनी जल्दी इस पार्टी से पीछा छूटे क्योंकि अब पार्टी के पास कुछ बचा नहीं है, अभी पिछले चुनाव में बड़ी आशा थी कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सरकार बन जाएगी लेकिन ऐसा हो ना सका और अब पार्टी पर यश चोपड़ा की फिल्म कभी कभी का ये डायलॉग पूरी तरह से फिट बैठ रहा है जिसमें अमिताभ बच्चन कहते है ‘अब ये आलम है कि तू नहीं, तेरा गम, तेरी जुस्तजू भी नहीं, गुजर रही है कुछ इस तरह जिंदगी मेरी, जैसे उसे किसी के सहारे की आरजू भी नहीं’
वे पैदल क्या चले
हाल ही में जबलपुर में हमेशा की तरह नर्मदा जयंती की धूम रही, नर्मदा तो वैसे भी प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाती है सो जाहिर है कि जबलपुर में नर्मदा जयंती का अपना एक अलग जलवा है, लाखों लोगों की भीड़ मां नर्मदा के दर्शन के लिए घाटों पर पहुंचती है और इस बार भी पंहुची, लेकिन इस बार नर्मदा जयंती की अखबारों में जो खबरें छपी थी उसमें एक बड़ी खास बात बतलाई गई थी कि जिले के कलेक्टर और एसपी के साथ-साथ अन्य अधिकारियों ने भी पैदल मार्च किया। बड़ी-बड़ी हेडिंग में यह बताया गया कि देखिए अफसरों ने पैदल-पैदल चलकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया और तो और अपने मंत्री जी भी अपनी गाड़ी में न जाकर पैदल घाट पहुंच गए। अरे भैया वे भी तो इंसान है उन्हें भी तो भगवान ने दो पैर दिए हैं अगर थोड़ा बहुत पैदल चल भी लिए तो ऐसा क्या महान काम कर दिया कि अखबार वालों ने उनकी ऐसी तारीफों के पुल बांध दिए। दरअसल चाहे अफसर हो या नेता या मंत्री, वे हमेशा सरकारी गाड़ी में चलते आए हैं। जनता के लिए भले ही बेरिकेड्स लगा दिए जाएं लेकिन पीली बत्ती वाली गाड़ी के लिए तमाम तरह की जो रुकावटें हैं वे हटा दी जाती है क्योंकि वे अफसर जो है और अफसर तो आजकल भगवान से भी बढक़र हो गए हैं भगवान से भी अगर किसी काम के लिए प्रार्थना कर लो तो वो रहम खा कर आपकी इच्छा पूरी कर देता लेकिन अफसर, आप उसके दरवाजे पर दस्तक देते रहो उसको कोई फर्क नहीं पड़ता तो जब ऐसे अफफसर पैदल चलेंगे तो खबर तो बनेगी ही सो अखबार वालों ने भी खबर बना ही दी। चलो इसी बहाने उन अफसरों, नेताओं और मंत्रियों की थोड़ी बहुत एक्सरसाइज हो गई होगी, अपनी तो उनको सलाह है कि थोड़ा बहुत पैदल भी चला करो अन्यथा कब घुटने दगा दे जाएं, कोई नहीं जानता फिर लगाते रहना आर्थो का तेल कोई फायदा नहीं होने वाला।
सुपर हिट ऑफ  द वीक
श्रीमान जी और श्रीमती जी के बीच एक घंटे से झगड़ा चल रहा था उसको निबटाने का एक तरीका श्रीमान जी को सूझा और उन्होंने कहा
‘तुम बेहद खूबसूरत हो इसका मतलब ये तो नहीं कि कुछ भी बोलोगी’
और इस वाक्य के चंद मिनटों बाद ही श्रीमान जी को चाय के साथ बिस्किट भी मिल गए…

Jai Lok
Author: Jai Lok

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