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कहो तो कह दूँ : बीजेपी हो गई ‘फरीदा जलाल’ और अन्नू बन गए ‘देवानंद’

चैतन्य भट्ट
इस वक्त राजनीति में बड़ा जबरदस्त खेल चल रहा है, किस पार्टी का कौन सा नेता कब  दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए इसका अंदाजा पार्टी वाले तो छोड़ो शायद भगवान भी नहीं लगा पा रहा है। सुबह तक जिस पार्टी की रीति नीति को पानी पी-पी के कोसते थे वो ही नेता शाम को उसी पार्टी की रीति नीति पर कसीदे पढ़ते नजर आते हैं अब मतदाता को भी कोई आश्चर्य नहीं होता कि कौन नेता कहां चला गया, हां इस बात का उसे जरूर रंज रहता है कि हमने जिस पार्टी को वोट दिया था जिसके सिंबल पर हमने नेता को जिताया था वो हमसे धोखाधड़ी करके दूसरी पार्टी में जा बैठा, लेकिन क्योंकि राजनीति का मसला है, इसलिए जनता को भी कोई फर्क नहीं पड़ता, अब देखो ना अपने जबलपुर के महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर भारी मतों से जीत कर शहर के प्रथम नागरिक यानी महापौर बने थे, लेकिन अचानक न जाने क्या हुआ रातों-रात भोपाल पहुंचे और कांग्रेस का हाथ छोडक़र भगवा दुपट्टा गले में डालकर  बीजेपी के गोद में जा बैठे, कल तक जो पार्टी विपक्ष में थी वो अचानक सत्ता में आ गई, कल तक जो एमआईसी मेंबर थे उन्हें अपनी कुर्सी खाली करना पड़ गई, जो कल तक महापौर की खटिया खड़ी करते थे वे महापौर के एम आई सी मेंबर बन जाएंगे। 70 के दशक में एक फिल्म आई थी ‘महल’ जिसमें देवानंद नायक और आशा पारेख नायिका थी फिल्म तो खास नहीं चली लेकिन उसमें फरीदा जलाल का एक गाना सुपर हिट हुआ था जिसके बोल थे ‘आइए, आपका था हमें इंतजार, आना था, आ गए कैसे नहीं आते सरकार’ यानी बीजेपी अब फरीदा जलाल बन गई और अन्नू भैया को देवानंद का पार्ट अदा करना पड़ा। महापौर जी कह रहे हैं कि शहर को महानगर बनाने के लिए उन्होंने कदम उठाया है चलिए अच्छी बात है अगर शहर महानगर बनने की कगार पर है तो महापौर चाहे कांग्रेस में रहे चाहे बीजेपी में शहर वासियों को तो शहर के विकास से मतलब है इसलिए कौन कहां जा रहा है कौन कहां से कहां आ रहा है इससे उसका कोई लेना देना नहीं है, पहले एक कहावत थी ‘एवरीथिंग इज फेयर इन लव एंड वार’ लेकिन अब उसमें एक शब्द और जुड़ गया है ‘एवरीथिंग इज फेयर इन लव वार एंड पॉलिटिक्स’। समय के साथ-साथ कहावतें भी बदलती रहती हैं और अब तो राजनीति में जो कुछ हो रहा है उसमें बहुत सी कहावतें को बदलना पड़ेगा। दरअसल राजनेताओं के लिए सत्ता और कुर्सी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है और क्यों ना हो सत्ता के लिए  तो राजनीति होती है, चुनाव में लाखों रुपए खर्च होते है तब कहीं जाकर कुर्सी मिल पाती है और जब कुर्सी मिल जाती है तो उस कुर्सी को संभालना भी बड़ा कठिन काम होता है, इसलिए जो कुर्सी पर बैठता है वो अपनी पूरी निगाहें अपनी कुर्सी पर ही गाड़े रहता है, क्योंकि उसे मालूम होता है कि विरोधियों की तो छोड़ो उसके आसपास के ही लोग बाग कब उसकी कुर्सी पलटा दे कोई नहीं जानता, सारा जलवा तो उस कुसीज़् के कारण ही होता है जिस दिन कुर्सी गई कोई धेले भर को नहीं पूछता, इधर कांग्रेसी नेता अन्नू भैया की छीछालेदर करने में जुटे हुए हैं। कोई तर्पण कर रहा है तो कोई श्रद्धांजलि सभा, लेकिन अन्नू जी ने जो काम कर लिया है उसको लेकर इन सब से उनको भी कोई फर्क नहीं पडऩे वाला।
पहली से चौथी सीट पर
17 साल तक प्रदेश पर बतौर मुख्यमंत्री राज करने वाले शिवराज सिंह चौहान उर्फ ‘मामा जी’ को क्या-क्या दिन देखना पड़ रहे हैं। क्या जलवा था एक जमाने में, चौतरफा जय-जयकार होती थी, सारे अफसर आगे पीछे घूमते थे, कार्यकर्ताओं की लाइन लगी रहती थी चरण छूने के लिए लेकिन चुनाव क्या हुए और मुख्यमंत्री पद क्या गया सारा जलवा एक ही झटके में बिखर गया। आज ही पता लगा है कि मध्य प्रदेश की विधानसभा में तमाम विधायकों को सीट एलॉट कर दी गई है और जिस पहली पंक्ति में मामा जी बैठा करते थे वे अब चौथी पंक्ति पर 44 नंबर की सीट पर बैठा करेंगे, वक्त कैसे-कैसे दिन दिखाता है ये मामा जी को समझ में आ रहा होगा ,वैसे ऊपर वाले नेताओं को भी समझना चाहिए कि मामा जी ने ऐसा क्या बिगाड़ा था जो उनकी ऐसी हालत कर दी, कहीं तमिलनाडु भेजा जा रहा है तो कहीं केरल में भाषण दे रहे हैं, यानी कुल मिलाकर जिलाबदर की तर्ज पर उनका ‘प्रदेश बदल’ कर दिया गया है 44 नंबर की सीट पर बैठकर मामा जी क्या करते हैं यह देखना होगा, वैसे भी अंक ज्योतिष के हिसाब से 8 नंबर शनि महाराज का होता है और जो सीट उन्हें मिली है 44 नंबर की उसका जोड़ 8 होता है लगता तो ऐसा है कि मामा जी को पार्टी के अलावा शनि महाराज भी अलसेठ  देने के चक्कर में हैं अभी भी समय है विधानसभा अध्यक्ष से कहकर अपना सीट नंबर बदल वालो मामा जी तो शायद कुछ काम बन जाएगा।
कॉकरोच भी तो नॉनवेज  है
एक नई ट्रेन रेल मंत्रालय ने चलाई है जिसका नाम है ‘वंदे भारत’ बड़ी चर्चा है इस ट्रेन की कि भारी स्पीड से चलती है, तमाम तरह की सुविधा इस ट्रेन में यात्रियों को दी जाती हैं, देखने में बड़ी खूबसूरत है ये ट्रेन, समय भी कम लेती है अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए। नाश्ता, चाय, पानी, खाना पीना सब टिकट के साथ मिलता है लेकिन एक भाई साहब इस ट्रेन से भारी खफा हो गए। हुआ यूं कि उन्होंने ‘नॉनवेज’ खाने का ऑर्डर दे दिया और जब पैक बंद खाना उन्होंने खोला तो उसमें एक मरा हुआ ‘कॉकरोच’ दिखाई दे दिया, बस क्या था भाई साहब का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया, तुरंत उन्होंने इसकी शिकायत रेल मंत्रालय से और खाना देने वाली कंपनी से कर दी मंत्रालय ने भी ज्यादा हल्ला ना मचे इसके पहले ही खाना बनाने वाली एजेंसी पर अच्छा खासा जुर्माना ठोक दिया, लेकिन लोग बाग कह रहे हैं कि भाई साहेब ने नॉनवेज खाना बुलवाया था और कॉकरोच भी तो नॉनवेज होता है यदि खाने में काकरोच आ भी गया था तो ऐसा क्या हो गया, निकाल कर फेंक देते शिकायत करने की क्या जरूरत थी, वैसे भी आजकल तो हर घर की रसोई में काकरोचों का मिलना आम बात है फिर वो एजेंसी तो रोज सैकड़ों यात्रियों का खाना तैयार करती है इसमें एकाध मरा हुआ काकरोच आ भी गया तो क्या हो गया। वैसे भी कहते हैं कि काकरोच में जहर नहीं होता हां अगर छिपकली  मिल जाती तो हल्ला मचाना जसटिफाई हो जाता।
सुपर हिट ऑफ  द वीक
‘पत्नियां किसे कहते हैं’ श्रीमान जी से उनके एक मित्र ने पूछा
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Jai Lok
Author: Jai Lok

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