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जबलपुर लोकसभा चुनाव-3 देश के प्रथम सर्वदलीय प्रतिपक्षी प्रत्याशी-शरद यादव

समर शेष है, लोकतंत्र का

राजेंद्र चंद्रकांत राय
(जय लोक)। जबलपुर जिले की समाजवादी पार्टी में उन दिनों गिने-चुने लोग ही थे। बद्रीनाथ गुप्ता समाजवादी पार्टी के दूसरे धड़े के अध्यक्ष थे। वे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में थे और बाद में समाजवादी हो गए थे। वे भले, सरल और मीठी वाणी वाले सज्जन-पुरुष थे। 1973 के जबलपुर नगर निगम चुनाव में उन्होंने नेहरु वार्ड से चुनाव लड़ा था और कांग्रेस के उम्मीदवार ललित श्रीवास्तव से पराजित हो गए थे। शरद यादव ने उनके पक्ष में चुनाव प्रचार किया था।
पहली समाजवादी पार्टी में जिलाध्यक्ष एडवोकेट वल्लभदास जैन
दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने तय कर लिया था कि वे शरद यादव को लोकसभा चुनाव लड़ाएंगे। उनके सहित सभी जानते थे कि समाजवादी पार्टी की राजनैतिक ताकत एक पार्षद तक जिताने की नहीं है, ऐसे में लोकसभा चुनाव जीतना हथेली पर सरसों उगाने के समान ही था। पर चुनाव हमेशा जीतने के लिए ही नहीं लड़े जाते, चुनाव के जरिये अपना निशान, विचार और पहुँच को जनता तक ले जाने का बड़ा मक़सद भी हुआ करता है। चुनाव के माध्यम से ही पार्टी के साथ नये कार्यकर्ता जुड़ते हैं। पार्टी का विस्तार होता है।
शरद यादव जबलपुर विवि के छात्र संघ अध्यक्ष रह चुके थे। 1973-74 के विवि चुनाव में श्याम बिलौहा वाले नगर छात्र संघ ने अधिकतर कॉलेज जीत लिए थे और शरद यादव का जलजला सिमट कर रह गया था। बावजूद इसके शरद यादव का एक ग्लैमर तो था ही। उनके नाम से जबलपुर का हर वह नौजवान जो कॉलेज में पढ़ता था, वाकिफ था। शरद यादव पर 23 जनवरी, 1974 के जबलपुर बंद आंदोलन के बाद मिसा (मेंटेनेन्स आफ इन्टरनल सिक्यूरिटी एक्ट) लगा दिया गया था और उन्हें एक साल के लिए रायपुर कारागार पहुँचा दिया गया था। गिरफ्तारी और मिसा लगने के कारण शरद यादव फिर से सुखिऱ्यों में आ गए थे। सुखिऱ्यों में तो स्टूडेंट फेडरेशन के प्रदेशाध्यक्ष श्याम बिलौहा भी थे। वे मिसा लगने से भी पहले 1973 की छात्र गतिविधियों के कारण सुखिऱ्यों में आ चुके थे, पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें उतनी तवज्जो न दी थी, जितनी समाजवादी पार्टी ने शरद यादव को दी थी।
चुनाव का नामांकन फॉर्म भरते ही मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री प्रकाशचंद सेठी ने शरद यादव को एक साल पूरा होने से एक महीने पहले ही रिहा कर दिया। रिहाई के पीछे दो कारण थे। पहला यह कि जेल से चुनाव लडऩे पर कांग्रेस सरकार पर यह तोहमत लगेगी कि उसने लोकतांत्रिक तकाजों को ताक पर धर दिया है। आज तो विपक्ष के नेताओं को चुनाव के समय जेल भेज देने और लोकतांत्रिक तकाजों के धुर्रे उड़ा डालने का समय चल रहा है। दूसरा कारण यह था कि जेल से चुनाव लडऩे पर शरद यादव और भी ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर लेंगे।
शरद यादव रिहा हुए और जबलपुर आने के लिए उन्होंने जीप पर सवारी करने का राजनैतिक निश्चय किया। जबलपुर के तीनों समाचार पत्रों, नवभारत, नवीन दुनिया और युगधर्म में उनकी रिहाई और सडक़ मार्ग से जबलपुर आने की ख़बर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। बताया गया था कि वे दोपहर बारह बजे तक जबलपुर पहुँचेंगे। उनको लेकर लडक़ों में भारी उत्साह था। उस दिन सुबह दस बजे से ही जबलपुर मोटर स्टेड पर, यानी जिसे अब मॉडल रोड कहा जाता है, उस पर लडक़े जमा होने लगे थे। ग्यारह बजे तक पूरी सडक़ लडक़ों से भर गई थी। कांग्रेस विचारधारा से जुड़े कुछ शिक्ष्क नेताओं को भी उस दिन वहाँ पर देखा गया था। सूचना आई कि शरद यादव का जगह-जगह पर स्वागत हो रहा है, इसलिए वे दो बजे तक आ पाएँगे। इस सूचना से भी भीड़ कम न हुई, बढ़ती गई। शरद यादव के पुराने साथी-लडक़े ढेर सारी मालाएं लेकर आ गए थे। वे सबको एक-एक माला बाँट रहे थे। यही है राजनैतिक आचरण। अपने नेता को कैसे सम्मानीय बना देना, कैसे आसमान पर पहुँचा देना और कैसे उसे साधारण मनुष्य से असाधारण बना देना, यह कारीगरी समर्थकों को आनी चाहिए।
शरद यादव चार बजे शाम को पहुँचे थे। हजारों लडक़ों, लोगों और वयोवृद्धों ने उन्हें घेर लिया था। मालाओं से उन्हें लाद दिया गया था। गुलाल के टीकों से पूरा मुँह रंग दिया गया था। स्वागत के बाद उन्हें पूरे जबलपुर शहर में घुमाया गया था, इस तरह उनका चुनाव प्रचार उसी दिन से शुरु हो गया था। इसी जुलूस ने उनके सर्वदलीय प्रत्याशी होने की संभावनाओं को सबसे ज्यादा बना दिया था।
वह 1974 का दिसंबर महीना था। 1976 में वैसे भी आम चुनाव होने वाले थे। विपक्ष हार-हारकर पस्त हो गया था। भारतीय जनसंघ ही जरा ताकत दिखा पाता था, बाकी दल या तो चुनाव में उतरते ही न थे या उतरने पर दो-चार हजार वोटों तक सिमट कर रह जाते थे। ऐसे में साल-डेढ़ साल के बचे हुए अरसे के लिए कोई दल चुनाव लडऩे की मानसिक स्थिति में न था। तब समाजवादी दल ने ही सर्वदलीय विपक्षी प्रत्याशी का प्रस्ताव रखा। समाचार पत्रों में छपा। दिल्ली के विपक्षी नेताओं ने भी तब तक इंदिरा गाँधी का मुकाबला करने के लिए सर्वदलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडऩे का मन बना लिया था। यह एक प्रयोग ही था।
जबलपुर में दोनों समाजवादी दल, भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल और कांग्रेस के इंदिरा विरोधी धड़े संगठन काँग्रेस ने सर्वदलीय उम्मीदवार तय करने की गरज से बद्रीनाथ गुप्ता के सुपर मार्केट के सामने वाले कार्यालय पर बैठक रखी। इनमें से कुछ दल तो केवल एक-दो व्यक्तियों वाले दल ही थे, परंतु थे तो वे दल ही, लिहाजा विपक्षी दलों की तादाद में इजाफा करने में उनकी अपनी भूमिका थी।
समाजवादी पार्टी की ओर से शरद यादव और नगर निगम के निर्दलीय चेयरमेन शरत् तिवारी सर्वदलीय उम्मीदवारी के आकांक्षी थे। बैठक में कशमकश रही। कुछ तय न हो सका। अगले दिन जनसंघ ने अपनी निजी बैठक में अपने को पीछे कर लिया और शरत् तिवारी उसी शाम को जब कमानिया गेट से गुजर रहे थे, तो चौराहे पर खड़े शरद यादव और उनके मित्रों ने उन्हें रोक लिया। शरद यादव ने इसरार किया और शरत् तिवारी ने वहीं पर घोषित कर दिया कि वे अपना नाम वापस ले रहे हैं और शरद यादव को अपना समर्थन देते हैं। शरत् तिवारी ने वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों को कमानिया पर मिलने वाला सुप्रसिद्ध केसरिया दूध पिलाकर उनके सर्वदलीय प्रत्याशी हो जाने का जश्न भी आयोजित कर दिया था।
अब केवल औपचारिकता ही रह गई थी, जो अगले दिन प्रतिपक्षी राजनैतिक दलों की बैठक में पूरी कर ली गई। शरद यादव सर्वदलीय उम्मीदवार होंगे, यह समाचार अगले दिन बैनर हैडिंग के साथ छपा। लडक़ों में धूम मच गई।
काँग्रेस ने सेठ गोविंददास के पोते रवि मोहन को अपना प्रत्याशी घोषित किया। वे जगमोनदास के पुत्र थे और देवास में सिगरेट के फिल्टर बनाने वाली कंपनी के मालिक। वे जबलपुर के उसी शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के स्नातक थे, जिससे स्वयं शरद यादव स्नातक थे। दोनों ही इंजीनियरिंग कॉलेज के गोल्ड मैडलिस्ट थे। रवि मोहन के पास अपने पूर्वजों का वैभव और चमचमाता राजनैतिक उत्तराधिकार तो था, परंतु जरा सा भी सार्वजनिक जीवन न था। उन्हें उनके परिजनों के अलावा कोई न जानता था। शरद यादव निरंतर सडक़ों पर रहे। कैरियरिस्ट हो जाने की बजाय संघर्षकामी बने रहे, इसलिए उनकी पहचान व्यापक थी।
शरद यादव सर्वदलीय प्रत्याशी हो गए तो प्रकाशचंद सेठी ने उनके स्वाभाविक विरोधी श्याम बिलौहा को, यह सोचकर  भी रिहा कर दिया कि वे शरद यादव का विरोध करेंगे और उससे काँग्रेस को फायदा होगा। दो दिनों के अंतर से कैलाश सोनकर और डॉ आरके रावत भी छोड़ दिए गए। डॉ रावत को तो शरद यादव के साथ जाना ही था, श्याम बिलौहा के साथी कैलाश सोनकर भी शरद यादव के पक्ष में चले गए।
शरद यादव के साथ लडक़ों-नौजवानों का जो विशाल जमघट हो गया था, उसके बरक्स कुछ कम किंतु फिर भी नोटिस लिए जाने के काबिल युवा-भीड़ अगर किसी के पास थी, तो वे थे श्याम बिलौहा। उनकी अपनी कम्युनिस्ट पार्टी ने न तो चुनाव लड़ा और न ही उन्हें ही कोई महत्व दिया। काँग्रेस तो देश और प्रदेश में सत्ता के शीर्ष पर थी। 1971 के भारत-पाक युद्ध में मिली विजय ने उसे लोकसभा चुनाव में आशातीत सफलता दे दी थी। कुल 518 सीटों के लिए चुनाव हुए थे, उसमें उसे 352 सीटें मिली थीं। सीपीआईएम को 25, भारतीय जनसंघ को 22 और काँग्रेस संगठन को 16 स्थान ही हासिल हुए थे। इस तरह इंदिरा गाँधी के पास दो-तिहाई से ज्यादा और लगभग 70 प्रतिशत सीटें थीं। यह संख्या किसी के भी राजनैतिक-अहंकार को बढ़ा देने के लिए पर्याप्त थी।
जबलपुर की एक सीट के आने-जाने से काँग्रेस का कुछ भी बनना-बिगडऩा न था। उसने और उसके प्रत्याशी ने चुनाव लडऩे की गंभीरता को किनारे कर चुनाव लड़ा और बुरी तरह खेत रही। संविंद सरकार के मुख्यमंत्री रह चुके गोविंद नारायण सिंह कांग्रेस के चुनाव संचालक बने और अपने सामंती तौर-तरीकों से ही रणनीति बनाते रहे।
शरद यादव भारतीय लोकदल के चुनाव चिन्ह हलधर पर चुनाव लड़े और देश के पहले सर्वदलीय प्रत्याशी के तौर पर इतिहास का हिस्सा हो गए। जनसंघ ने ही उनका पूरा चुनाव लड़ा था। तुलाराम चौक पर उसका दफ्तर हुआ करता था, उसे ही चुनाव कार्यालय में तब्दील कर दिया गया था। सागर से आकर रघु ठाकुर ने कार्यालय की पूर्णकालिक जिम्मेदारी सम्हाल ली थी। संघ और जनसंघ के वरिष्ठ नेता मनोहर राव सहस्रबुद्धे ने शरद यादव को जबलपुर के सैकड़ों गाँवों का दौरा कराया था। संघ और जनसंघ के निष्ठावान लोगों से मुलाक़ात करायी थी। इस तरह सहस्रबुद्धे ने जनसंघ को उसके सीमित दायरे से निकाल कर अन्य दलों और नौजवान-पीढ़ी के संपर्क में लाने का महत्वपूर्ण और बुनियादी काम कर दिया था। यही आगे चलकर बाबूराव परांजपे के काम आया।
उनके पक्ष में आमसभाएं करने के लिए सभी दलों के सितारे राजनेता जबलपुर आए थे। अटलबिहारी बाजपेई, जार्ज फर्नांडिस, अशोक मेहता, मधु लिमये, लाड़ली मोहन निगम, मृणाल गोरे, गेवा अवाड़ी, पुरुषोत्तम कौशिक, यूनुस देहलवी जैसे नेताओं को सुनने के लिए मालवीय चैक पर हजारों की भीड़ लगा करती थी। जिस दिन अटलबिहारी बाजपेई की सभा थी उस दिन पूरे शहर में स्पीकर लगाए गए थे और इको होने के कारण बाजपेई जी को रुक-रुककर बोलना पड़ा था। वेसे भी वे पॉज लेकर बोलने वाली भाषण कला के महारथी थे। अटल जी ने उस दिन कहा था, ‘हमने अपने झंडे-डंडे समेट कर रख दिए हैं। हम सब एक हैं।’
1977 के आम चुनाव और 1978 के विधान सभा चुनाव में उनकी यही नीति जीत का मंत्र बनी।  शरद यादव उस चुनाव में भारी अंतर से जीते थे।
अगली बार शरद यादव के संपूर्ण राजनैतिक व्यक्तित्व पर विस्तृत रपट पढिय़ेगा।

Jai Lok
Author: Jai Lok

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