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जबलपुर लोकसभा चुनाव-4 : प्रधानमंत्री बनाने और हटाने वाले शरद यादव महानायक बने

                                                        समर शेष है, लोकतंत्र का

राजेंद्र चंद्रकांत राय
जबलपुर (जयलोक)। शरद यादव का जन्म 1 जुलाई 1947 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई गाँव में नंदकिशोर यादव और सुमित्रा यादव के घर जन्में थे। जबलपुर पढऩे आए शरद यादव छात्र राजनीति से जुड़े और जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने। इन्हीं दिनों वे राम मनोहर लोहिया के समाजवादी विचारों से प्रभावित हुए। वे 27 साल की उम्र में पहली बार 1974 में सेठ गोविंददास की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में जबलपुर से लोकसभा के लिए चुने गए थे।  1975 में आपात्काल लगा और तमाम विपक्षी नेताओं के साथ शरद यादव को भी जेल भेज दिया गया था। बहुत से नेता भूमिगत हो गए थे, उनमें जॉर्ज फार्नांडिस भी शामिल थे। इसी बीच चुनाव के लिए सामान्य परिस्थितियाँ न होने का कारण बताते हुए कांग्रेस सरकार ने लोकसभा का कार्यकाल पांच वर्ष की बजाय और एक साल के लिए बढ़ा लिया था। ऐसे में नैतिकता के आधार पर समाजवादी पार्टी के मधु लिमये और शरद यादव ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनका मानना था कि जनता ने उन्हें पाँच सालों के लिए ही चुना था, ऐसे में उस अवधि से ज्यादा समय सदस्यता भोगना अलोकतांत्रिक है।
1977 के आम चुनाव घोषित हुए। प्रतिपक्षी नेताओं को जेल से रिहा किया गया। सभी विपक्षी दलों ने मिल कर जनता पार्टी बनाई और चुनाव में शामिल हुए। जबलपुर से शरद यादव को जनता पार्टी का प्रत्याशी बनाया गया। कांग्रेस ने कई बार के विधायक और राज्य सरकार में मंत्री पदों पर रह चुके जगदीश नारायण अवस्थी को टिकट दिया था। वे भारी भरकम काया वाले शख्स थे। सदा पान और सुपारी खाते रहते थे। तब एक नारा प्रचलित हुआ था-
अवस्थी जी की क्या पहचान, पेट में बच्चा, मुँह में पान।
केंद्र और राज्य सरकार की सभी खुफिया ऐंजेसियों ने सरकार को बताया था कि कांग्रेस ही जीतेगी, पर परिणाम उसके खिलाफ आये। पूरे देश में जनता पार्टी को विजय मिली। उसने बहुमत पाया और सरकार बनाई। जबलपुर में शरद यादव को 1,94,516 और अवस्थी जी को 1,18,625 मत मिले थे। इस तरह शरद यादव दूसरी बार जबलपुर से सांसद चुने गए थे। उन्हें 1978 में युवा लोक दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। अनेक तरह की विचारधाराओं वाले दलों से बनी जनता पार्टी 1979 में विभाजित हो गई। शरद यादव चरणसिंह के गुट में चले गए।
1980 में चरणसिंह की सरकार गिर गई और आम चुनाव हुए। इस चुनाव में शरद यादव तीसरी बार जबलपुर से जनता दल के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में उतरे, परंतु इस बार उनकी जमानत तक जब्त हो गई। कांग्रेस के महापौर मुंदर शर्मा को चुनाव में 1, 72, 408, जनता पार्टी के राजमोहन गाँधी को 94, 882 वोट मिले थे।  इस हार के बाद शरद यादव ने कभी भी जबलपुर का रुख नहीं किया और वे दूसरे राज्यों से जाकर चुनाव लडऩे लगे। शरद यादव राष्ट्रीय नेता बन चुके थे। शरद यादव ने ऐसी राजनैतिक हैसियत बनाई कि वे प्रधानमंत्री बनाने और हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे। उन्हें कभी चरण सिंह, तो कभी लालू यादव ने अपने राज्यों से चुनाव लड़ाया और जितवाकर लोकसभा में भेजा। वे कुल सात बार लोकसभा के लिए चुने गए। उन्होंने राजीव गाँधी के खिलाफ  1981 में अमेठी से भी चुनाव लड़ा था और हार गए थे। उन्होंने 1984 का आम चुनाव लोकदल के उम्मीदवार के रूप में बदायूँ से लड़ा, और कांग्रेस के सलीम इकबाल शेरवानी से हार गये। वे 1986 में पहली बार राज्यसभा से संसद सदस्य के रूप में चुने गए। शरद यादव 1989 में जनता दल से बदायूँ से लड़े और कांग्रेस के रामनरेश यादव को पराजित किया था।
राजीव गांधी की कांगे्रस चुनाव हार गई थी, ऐसे में शरद यादव भाजपा के बाहरी समर्थन से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में वीपी सिंह का समर्थन करने वाले वामपंथी विपक्षी गठबंधन के प्रमुख खिलाडिय़ों में से एक के रूप में उभरे थे। उन्होंने वीपी सिंह सरकार में कपड़ा मंत्री के रूप में अपना पहला केंद्रीय कैबिनेट पद प्राप्त किया था। उन्होंने रामविलास पासवान और लालू यादव के साथ मिलकर मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए वीपी सिंह पर दबाव डाला था। भाजपा के विरोध में चले जाने पर सरकार चली गई और चुनाव हुए।
1991 के आम चुनाव में शरद यादव ने जनता दल से बिहार की  मधेपुरा सीट जीती थी। उन्होंने 1996 के आम चुनाव में समता पार्टी के आनंद मंडल को हराकर अपनी सीट बरकरार रखी। 1998 के आम चुनाव में वे मधेपुरा सीट से राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव से हार गए थे। उन्होंने 1999 के आम चुनाव में एक बार फिर से लालू प्रसाद के खिलाफ  मधेपुरा से ही चुनाव लड़ा और इस बार लालू यादव को उनके ही प्रदेश में हरा दिया।
देवगौड़ा ने जनता दल से अलग होकर अपना जनता दल (सेक्युलर) बना लिया था और शरद यादव के नेतृत्व वाली पार्टी के शेष हिस्से को जनता दल (यूनाइटेड) कहा गया। 2003 में यादव गुट का लोक शक्ति और समता पार्टी में विलय हो गया और आधिकारिक तौर पर जनता दल (यूनाइटेड) बन गया। शरद यादव जेडीयू के पहले अध्यक्ष बने और 2016 तक पद पर बने रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में, शरद यादव को नागरिक उड्डयन मंत्री के रूप में कैबिनेट सीट मिली, बाद में उनके विभाग भी बदले गए। 2004 के आम चुनाव में वे लालू प्रसाद यादव के खिलाफ  मधेपुरा सीट से लड़े और हारे। 2009 के आम चुनाव में वे मधेपुरा से फिर जीते थे लेकिन 2014 और 2019 में मधेपुरा से पराजित हो गए थे। देवगोड़ा और आईके गुजराल जैसे नेताओं को प्रधानमंत्री बनाने में शरद यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शरद यादव का 75 वर्ष की आयु में 12 जनवरी 2023 को गुरुग्राम में निधन हो गया।
वे जबलपुर से राजनीति में शामिल हुए और पूरे देश में उन्होंने यश प्राप्त किया। यही जबलपुर के लिए गौरव की बात है।

Jai Lok
Author: Jai Lok

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