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जबलपुर लोकसभा चुनाव-2  लोकसभा में पहला सर्वदलीय सासंद बनने का शरद यादव ने रचा इतिहास

शारद चादव ने ही जबलपुर में विपक्ष की

जीत का पहली बार खोला खाता

                                                                 समर शेष है, लोकतंत्र का
1974 में सेठ गोविंद दास जी का निधन हो गया और जबलपुर लोकसभा सीट खाली हो गई। दिसंबर 1974 में उपचुनाव होना था। पर उससे पहले जनवरी, 1974 का जिक्र ज़रूरी है। 1973-74 साल जबलपुर की छात्र-राजनीति की सबसे बड़ी उथल-पुथल के साल थे। जबलपुर विश्वविद्यालय में छात्र-राजनीति के दो धु्रव थे। शरद यादव के नेतृत्व वाला होस्टल-पैनल और श्याम बिलौहा के नेतृत्व वाला सिटी पैनल। जबलपुर बड़ा शहर था, यहाँ पर उच्चस्तरीय अध्ययन के लिए आसपास के जिलों, नगरों, कस्बों और गाँवों से छात्र आया करते थे। विशेष तौर पर नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सिवनी, मंडला, बालाघाट, छिंदवाड़ा जैसे जिलों से कुछ ज्यादा ही छात्रों का आगमन हुआ करता था।
बाहर से आने वाले ज्यादातर छात्र होस्टलों में रहा करते थे। होस्टल में रहने वाले छात्रों को ज़रूरत हुआ करती थी, संरक्षण की। छात्र नेताओं से ही उन्हें संरक्षण मिलता था। बदले में छात्र नेतागण अपनी राजनीति में उनका भरपूर उपयोग किया करते थे।
छात्र राजनीति के पितामह
छात्र राजनीति के पितामह कहे जाते हैं, मदन गोपाल तिवारी। उन्हें मदन तिवारी, मदन भैया और मदन दादा जैसे संबोधनों से ज्यादा जाना जाता है। मदन भाई भी नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा के पास के एक गाँव बम्हौरी से पढऩे के लिए जबलपुर आए थे। उन्होंने गोविंदराम सेकसरिया अर्थ एवं वाणिज्य कॉलेज से बी. कॉम किया और जब एम. कॉम कर रहे थे, तब वे अपने कॉलेज के छात्र संघ के अध्यक्ष और विवि प्रतिनिधि चुने गये थे। और फिर बाद वाले साल में कॉलेज के अध्यक्ष चुने गये। वे वहीं नहीं रुक गये, बल्कि उससे भी आगे बढ़ कर, सन् 1965-66 के सत्र के लिये जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के प्रेसीडेंट भी बने। छात्रों के बीच खासे लोकप्रिय और रुतबेदार होने के कारण मदन भाई का क़द निरंतर ऊंचा होता रहा। यहां तक कि वे अपने अध्यक्षीय काल के बाद विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के चुनाव के लिये, टिकट देने वाली हैसियत में भी पहुंच गये थे। उनकी टिकट का तात्पर्य था, उनके गुट का सम्पूर्ण समर्थन और निश्चित विजय।
मदन भाई की टिकट से ही 1968-69 में रामेश्वर नीखरा भी उन्हीं से टिकट हासिल कर जबलपुर विवि छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे। बाद में रामेश्वर भाई कांग्रेस पार्टी की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राजनेता हुए। आपातकाल के दिनों में वे मप्र युवा काँग्रस के अध्यक्ष रहे। 1980 से 1989 तक होशंगाबाद लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे। राजीव गाँधी के अति विश्वासपात्र होने के चलते काँग्रस सेवादल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बने।
शरद यादव, होशंगाबाद के उसी बाबई से इंजीनियरिंग करने जबलपुर आए थे, जहाँ के महान् कवि माखनलाल चतुवेदज़्ी हैं। शरद यादव को भी अपने लिये टिकट मांगने मदन भाई के अड्डे पर ही जाना पड़ा था। शरद यादव 1969-70 के साल में विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष हुए।  शरद यादव अध्यक्ष हुए और धीरे-धीरे खुद अपना एक समूह बनाकर विवि छात्रसंध के चुनाव लड़ाने और अपने अध्यक्ष बनाने लगे।
छात्र नेता श्याम बिलौहा ने जबलपुर नगर छात्र संघ बनाया और 1972-73 के छात्र संघ चुनाव के लिए जबलपुर विवि के प्रत्येक कॉलेज में अपना प्रत्याशी खड़ा किया। नगर छात्र संघ विवि राजनीति का एक ज्यादा व्यापक और उदार किस्म का तत्कालीन मोर्चा था, आज की भाषा में कहें तो महागठबंधन। जिसमें एआईएसएफ और एनएसयूआई के साथ नौजवानों की वह नयी पौध भी शामिल थी, जिसे अभी अपने लिये कोई विचारधारा ग्रहण करनी थी। नेतृत्व एआईएसएफ  के पास था, क्योंकि श्याम बिलौहा एआईएसएफ  के प्रांताध्यक्ष थे और नगर छात्र संघ के अध्यक्ष भी।
नगर छात्र संघ ने जबलपुर विवि के अंतर्गत आने वाले अधिकतर कॉलेजों पर फतह का झंडा लहरा दिया था। शरद यादव का होस्टल पैनल चंद कॉलेजों में ही जीत पाया था। दोनों छात्र समूहों में उस साल इतनी मुठभेड़ें हुई थीं कि पूरे साल जबलपुर में प्रशासन ने धारा 144 लगा रखी थी। विवि छात्र संघ का चुनाव इस आशंका के साथ न कराने का फैसला लिया गया था, कि चुनाव कराने पर कुछ हत्याएं भी हो सकती हैं। हालांकि हत्याओं वाली बात केवल प्रशासनिक चतुराई ही थी।
वह बंद जो शरद यादव के लिए वरदान बना
फिर आया 23 जनवरी, 1974, जबलपुर के अनुदान प्राप्त अशासकीय शालाओं के अध्यापकों के माध्यमिक शिक्षक संघ अपनी माँगों को लेकर हड़ताल पर था। मालवीय चौक पर अध्यापक धरने और हड़ताल पर बैठे हुए थे। शरद यादव और डॉ. आरके रावत समाजवादी पार्टी के युवा प्रकोष्ठ समाजवादी युवजन सभा में थे। वे भी विचारवादी राजनीति के पक्षधर थे। उन्होंने अपने को छात्रों के समुदाय से आगे बढक़र जनता से जुडऩे के प्रयासों की तरफ  कदम बढ़ा दिए थे। शरद यादव के समूह ने शिक्षकों के समथज़्न में मालवीय चौक पर धरना कार्यक्रम शुरु कर दिया था। इसके जवाब में नगर छात्र संघ ने और बड़ा कदम उठाते हुए 23 जनवरी, 1974 को ‘जबलपुर बंद’ का कॉल दे दिया था।
23 जनवरी का दिन आया। बड़े फुहारे से छात्रों का जुलूस कलेक्ट्रेट के लिए रवाना हुआ। ओमती पुलिस थाने के परिसर में मौजूद एसएएफ  के जवानों ने जुलूस पर पत्थर फेंके। छात्रों ने जवाबी कार्रवाई की। लाठीचार्ज हुआ। भगदड़ मची। सिर फूटे और कफ्र्यू लग गया। सामूहिक गिरफ्तारियाँ हुईं। श्याम बिलोहा, कैलाश सोनकर और संतोष राहुल को मीसा में गिरफ्तार करके एक साल के लिये निरुद्ध कर दिया गया।
शरद यादव और डॉ. रावत समाजवादी युवाजन सभा के सम्मेलन में भाग लेने जबलपुर से बाहर गए हुए थे। वे दो दिन बाद शहर लौटे। वे सिविल लाइंस थाने गये ओर उसके सामने नारेबाजी करते हुए अपने को गिरफ्तार करवा लिया। प्रशासन ने उन पर भी उदारतापूर्वक मीसा लगाया और चैन की बंशी बजायी।
जबलपुर के छात्र नेताओं को मीसा में बंद हुए अभी छह माह ही बीते थे कि सेठ गोविंददास के निधन के कारण जबलपुर लोकसभा का उप चुनाव घोषित हो गया। जबलपुर जिला समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एडवोकेट वल्लभदास जैन ने एक बड़ा राजनैतिक कदम उठाया और रायपुर जेल जाकर शरद यादव की उम्मीदवारी का फॉर्म भरवा लाए। उन्हें समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी घोषित कर दिया। काँग्रेस ने सेठ गोविंददास के पोते रवि मोहन को टिकट दिया।
उन्हीं दिनों जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में इंदिरा गाँधी की सरकार के खिलाफ आँदोलन चल रहा था। उसने पूरे देश में काँग्रेस और उसकी सरकार के विरोध में माहौल बना दिया था। विपक्ष के बड़े नेताओं ने तय किया कि जबलपुर का चुनाव सर्वदलीय प्रत्याशी बनाकर लड़ा जाएगा। शरद यादव सर्वदलीय प्रत्याशी बने और उन्होंने चुनाव में काँग्रेस को जबरदस्त अंतर से पराजित कर दिया था। आपातकाल के बाद सभी विपक्षी दलों को मिलाकर जनता पार्टी बनी थी। लेकिन इसके पहले ही जबलपुर में लोकसभा के उपचुनाव में पहली बार देश में सर्वदलीय प्रत्याशी का प्रयोग हुआ जो सफल हुआ और शरद यादव लोकसभा का उपचुनाव जीतने वाले पहले सांसद बने। इस उपचुनाव में शहर यादव के समर्थन में जनसंघ के नेता  अटल बिहारी वाजपेयी, समाजवादी नेता मधु लिमये, जार्ज फार्नाडिंस और राजनारायण जैसे दिग्गज नेता आमसभाओं को करने आए थे। शरद यादव ने पहली बार कांग्रेस का गढ़ रहे जबलपुर में विपक्षी उम्मीदवार की लोकसभा में जीत का खाता खोलकर एक नया इतिहास रच दिया।

Jai Lok
Author: Jai Lok

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